मनुष्य अपने भाग्य का विधाता — भाग 1
आज के संबोधन का विषय है—''मनुष्य अपने भाग्य का विधाता है ।'' अनेक भाषणों में राम ने मनुष्य की उसकी वास्तविक प्रकृति के बारे में व्याख्या की है । सच्चा मनुष्य, वास्तविक मनुष्य, वस्तुतः स्वयमेव दिव्यता है, ईश्वरत्व है, ईश्वर के अतिरिक्त और कुछ नहीं है । वास्तविक मनुष्य वस्तुतः न केवल एक शरीर के भाग्य का निर्माता है, वरन् वह तो इस विस्तृत विश्व और संपूर्ण ब्रह्मांड के भाग्य का विधाता है ।
जिस अर्थ में वेदांती 'सूक्ष्म-शरीर' के शब्द का प्रयोग करते हैं, राम आज के व्याख्यान में लगभग उसी अर्थ में 'मानव' या 'मनुष्य' शब्द का प्रयोग करेगा । आप इस मनुष्य को अभीप्सायुक्त, संकल्पयुक्त, उत्सुकतापूर्ण, लालसापूर्ण और वासनापूर्ण मनुष्य कह सकते हैं । लेकिन इस सीमित तथा संकुचित अर्थ में भी मनुष्य अपने भाग्य का विधाता है । इस प्रश्न के अनेक पहलू हैं । इन सब पहलुओं की इस भाषण में विवेचना नहीं की जा सकती है, इसलिए आज हम सूक्ष्म ब्रह्मांडिक दृष्टिकोण या सूक्ष्म जगत के मानका के अनुसार इस प्रश्न पर विचार करेंगे ।
कदाचित इस बात पर विश्वास करना अपेक्षाकृत सरल है कि जब मनुष्य पैदा होता है, तो वह काफी हद तक अपनी * 24 जनवरी, 1903 को गोल्डेन गेटे हाल, सनफ्रांसिस्को में दिए गए भाषण का हिंदी भावानुवाद परिस्थितियों में परिवर्तन कर सकता है । निश्चित रूप से मनुष्य कतिपय परिस्थितियों के अधीन रहता है, तो भी यह विश्वास करना आसान है कि वह अपनी परिस्थितियों पर बहुत-कुछ नियंत्रण रख सकता है, वह अपनी परिस्थितियों का स्वामी बन सकता है, वह उनसे ऊपर उठ सकता है और तदनुसार अपने अपने को शिक्षित कर सकता है । निर्धनतम बालक से वह अपने आपको देश का सर्वाधिक धनी व्यक्ति बना सकता है । ऐसा अनेक लोगों ने सिद्ध कर प्रत्यक्ष दिखाया है । कंगाल व्यक्तियों और यहां तक कि भिक्षुओं ने भी विश्व में अपनी ख्याति और प्रसिद्धि की पताका फहरायी है । निम्नतम और घृणित परिस्थितियों में पैदा हुए मनुष्यों ने स्वयं को उच्चतम स्तर तक पहुंचाने में सफलता प्राप्त की है । नेपोलियन बोनापार्ट का ही उदाहरण लीजिए, शेक्यपीयर को भी देखिये, लंदन के एक लॉर्ड मेयर, हिलिंगटन का मामला ही लीजिए, चीन के उस एक प्रधान मंत्री के जीवन का उदाहरण लीजिए, जो चीन के निर्धनतम किसान का बेटा था और जिसने घनघोर कठिनाइयों के बीच अध्ययन किया था ।
यह सिद्ध करना सरल है कि इस संसार में जन्म लेने के उपरांत मानव अपने जीवन-काल में परिस्थितियों को परिवर्तित कर सकता है । इसको बिना कठिनाई के सिद्ध किया जा सकता है । लेकिन इस प्रश्न का अधिक दुष्कर और कठोरतम पहलू उस समय उत्पन्न होता है, जब वेदांत जोर देकर प्रतिपादित करता है कि आपने ही अपनी स्वयमेव इच्छा से अपने जन्म का वरण किया है और आपने ही अपने माता-पिता को चुना है, इसके कर्ता-धर्ता आप ही हैं । बालक मनुष्य का पिता है, लेकिन इतना ही नहीं, बालक तो अपने पिता का भी पिता है । इसे सिद्ध करना कठिन है, परंतु वेदांत कहता है कि इस प्रश्न पर आप किसी दृष्टिकोण से विचार करें, तभी सिद्ध होगा कि आप अपने भाग्य के स्वयं विधाता हैं ।
इस प्रकार यदि आप अंधे पैदा होते हैं तो भी आप अपने भाग्य के निर्माता हैं, आपने अपने आपको स्वयं अंधा बनाया है, यदि आप निर्धन माता-पिता की संतान हैं, तो भी आप अपने भाग्य के विधाता हैं, क्योंकि आपने स्वयं को गरीब माता-पिता की संतान होना पसंद किया है और तदनुसार आपने स्वयं को ढाला है, यदि आपका जन्म सर्वाधिक दयनीय और अवांछित परिस्थितियों में हुआ है तो भी आप अपने भाग्य के निर्माता ही रहे हैं । हम आज इस प्रश्न के इसी पहलू पर विचार करेंगे । मनुष्य अपने माता-पिता का चयन किस प्रकार करता है ? दूसरे शब्दों में, हम कुछ सीमा तक जीव के आवागमन के विधान की व्याख्या करेंगे । यद्यपि हम इस प्रश्न पर पूरी तरह विचार नहीं कर सकते, फिर भी उसके एक अंश को लेकर उस पर विचार करेंगे ।
कुछ लोगों की मान्यता है कि जब मनुष्य की मृत्यु होती है, तो वह संपूर्ण रूप से मर जाता है, समूल नष्ट हो जाता है । कुछ लोगों का यह विश्वास है कि जब हम मृत्यु को प्राप्त होते हैं । तो हममें अमरतत्व की जो अपनी अन्तर्निहित, जन्म-जात और प्राकृतिक आकांक्षा निहित रहती है तथा हममें जो अन्तर्निहित भावना और आकांक्षा बनी होती है कि हम अपने नाते-रिश्तेदारों की मृत्यु कभी न देखें और यह कि हम अपने मित्रों की मृत्यु से कभी संतप्त न हों तथा हममें जो अन्य भावनाएं होती हैं, इन सबकी संपूर्ति कैसे हो इसके लिए कुछ धर्मों तथा लोगों ने एक दूसरे काल्पनिक लोक की कल्पना करना आवश्यक समझा । यह दूसरी बात है कि ये धर्म इस काल्पनिक लोक के अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए इस सांसारिक लोक में कोई सकारात्मक प्रमाण न दे सकें । परंतु कुछ लोगों में इसी प्रकार के काल्पनिक लोक की धारणा घर कर गई है और यह हो सकता है कि उनकी इन धारणाओं में कहीं कोई किंचित सच्चाई हो । इस धारणा की सच्चाई के बारे में भी इसी हाल में आयोजित राम के पूर्व व्याख्यान में व्याख्या की गई थी । लेकिन वास्तव में यह धारणा पूरी-तरह सत्य नहीं है ।
मृत्यु के उपरांत आपका स्वर्ग या नरक जाना पूर्ण सत्य नहीं है । हमको तो इसी धरातल पर, इसी भौतिक अस्तित्व के आधार पर इन सब मामलों के सम्यक् सत्य का विश्लेषण करना है । आपको अपने इस आध्यात्मिक संसार के नियमों को, इस भौतिक ठोस संसार के नियमों का अतिक्रमण करने और उनका उल्लंघन करने का कोई अधिकार नहीं है ।
यहां व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसे जमीन में गाड़ दिया गया है और उसकी कब्र पर इस आशय का फातिहा पढ़ा जाता है कि ''मिट्टी, मिट्टी में वापस मिल गई है ।'' आइये, जरा इसका परीक्षण करें । निश्चय ही शरीर मिट्टी में वापस चला गया है, वह उससे मिल गया है । लेकिन शरीर वास्तव में विलुप्ति नहीं होता है, शरीर का केवल रूपांतर हुआ है, उसका परिवर्तन हुआ है । शरीर के भौतिक तत्व एक बदले हुए रूप में विद्यमान हैं, उन तत्त्वों की स्थिति बदल गई है, लेकिन वे तत्व अस्तित्वहीन नहीं हुए हैं । हो सकता है कि आपके मित्र का वही शरीर, जिसे आपने दफनाया है, पुनः कब्र पर गुलाब के सुंदर फूल का रूप लें या फिर कोई दूसरा आकार ले ले । लेकिन वह मौलिक रूप से विनष्ट नहीं हुआ है ।
अब प्रश्न उठता है कि हमें संदेह किस बात में है ? क्या हमें संदेह है कि जो विनष्ट हो गया है, वह आत्मा है ? क्या वह सत्य है या वास्तविक ईश्वर है, नहीं, नहीं कदापि नहीं । उसका कभी नाश नहीं होता है । वास्तविक व्यक्ति, वास्तविक मनुष्य कभी भी विनष्ट नहीं होता है, उसका कभी भी अंत नहीं होता है । तब वह क्या है जिसके बारे में हमें संदेह रहता है ? दूसरे शब्दों में, वह है सूक्ष्म शरीर, मानसिक इच्छाएं, मानसिक भावनाएं और हृदय की वृत्तियां, क्षोभ, आवेग और विचार आदि । इन्हें आप मन की इच्छाएं, उत्कंठाएं या जीव की लालसाएं भी कह सकते हैं । इन सबसे मिलकर सूक्ष्म शरीर का निर्माण होता है ।
सूक्ष्म शरीर क्या है—अब यह प्रश्न है ? जब मृत शरीर को दफना दिया गया तो क्या उसके साथ सारी भावनाएं आदि भी दफन हो गयीं ? नहीं, नहीं । इन्हें दफन नहीं किया जा सकता है । फिर सब इन सबका क्या हुआ ? इन सभी प्रश्नों का संबंध सूक्ष्म शरीर से है जिसका निर्माण आपकी मानसिक ऊर्जा, आंतरिक क्रिया-कलाप या आंतरिक भावनाओं, आवेगों, विचारों, उद्गारों और अभिलाषाओं आदि से हुआ है । इस ऊर्जा से संबंधित आंतरिक भावनाओं, विचारों, उत्कंठाओं और इच्छाओं आदि के प्रतिफल का या—इन सभी के योग और मिश्रण तथा समुच्चय का—इन सबका क्या हुआ ? यह कहना कि यह सब आध्यात्मिक संसार में चला जाता है, आपके दृष्टिकोण से उचित हो सकता है, परंतु यहां जिस आध्यात्मिक संसार की ओर संकेत किया जा रहा है, उसे तो हम भौतिक तथा यांत्रिक नियमों से सिद्ध नहीं कर सकते हैं । हमें तो इसे भौतिक और स्थूल धरातल पर पक्के सबूत के साथ सिद्ध करना है कि आखिरकार इस ऊर्जा का क्या हुआ ? आप उस अनिवार्य, अपरिहार्य और शाश्वत नियम से परिचित हैं, जो कहता है कि इस विश्व में कुछ भी नष्ट नहीं किया जा सकता है । ऊर्जा की निरंतरता, द्रव्य और पदार्थ की अविनाशता और ऊर्जा की संरक्षणता आदि ऐसे नियम हैं जो सिद्ध करते हैं, कि किसी पदार्थ का नाश नहीं किया जा सकता है ।
परंतु यदि शरीर का नाश नहीं होता है और केवल उसकी स्थिति में परिवर्तन ही होता है तथा यदि हमारी दिव्यता नष्ट नहीं होती है, क्योंकि वह नित्य, स्थाई और अविनाशी है तो फिर ये मानसिक इच्छाएं, मानसिक ऊर्जा, आंतरिक जीवन क्यों समाप्त हो जाता है ? किस कारण ये विनष्ट हों ? ऊर्जा के संरक्षण का अपरिहार्य नियम हमें स्पष्ट करता है कि ऊर्जा कभी नष्ट नहीं की जा सकती है । इसलिए हमें यह कहने का कोई अधिकार नहीं है कि इन मानसिक ऊर्जाओं का नाश होता है, इन्हें तो जीवित रहना है, बनी ही रहना है । इन इच्छाओं, इन भावनाओं तथा अन्य मानसिक उत्सर्गों की स्थिति में बदलाव आ सकता है, उनके स्वरूप में परिवर्तन हो सकता है, लेकिन वे जीवित तो हैं ही और उन्हें भी समाप्त नहीं किया जा सकता है । उदाहरण के लिए आप मोमबत्ती को लें और आधे घंटे तक जलाए रखें तो हम देखेंगे कि उसका मोम, उसकी बत्ती और बाकी सभी कुछ समाप्त हो गया है । लेकिन विज्ञान सिद्ध करता है, रसायन विज्ञान प्रदर्शित करता है कि इसका नाश नहीं हुआ है, यह समाप्त नहीं हुआ है । यदि आप एक वक्र जांच-नली लें जिसमें तेजाब (कास्टिक सोडा) और कुछ अन्य आवश्यक रासायनिक हों तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि मोमबत्ती में जो प्रत्यक्ष रूप से विद्यमान था, वह समाप्त हो गया है, परंतु उसकी वास्तविकता अभी भी विद्यमान है और उसे उस वक्र जांच-नली में संरक्षित कर लिया गया है । इसी प्रकार यदि आप पानी से भरा एक छोटा प्याला लें तो आप देखेंगे कि कुछ समय के बाद उसका सारा पानी गायब हो गया, उड़ गया । एक सामान्य व्यक्ति इससे यही समझेगा कि पानी विनष्ट हो गया है, पानी का नाश हो गया है लेकिन भौतिकी विज्ञान हमें बतलाता है कि पानी समाप्त नहीं हुआ है । प्रयोगों से सिद्ध होता है कि वह पानी वायु में विद्यमान है और उसका नाश नहीं किया जा सकता है ।
इसी प्रकार जब मनुष्य की मृत्यु होती है तो उसकी मानसिक ऊर्जाएं, उसकी आकांक्षाएं, उसकी भावनाएं, उसके विचार प्रत्यक्ष रूप से समाप्त हो जाते हैं । और उनकी भी मृत्यु प्रतीत होती है । लेकिन वेदांत आपके सामने इस स्थिति को नष्ट करने के लिए आत्मा के रसायन-विज्ञान के साथ उपस्थिति होता है और आपको प्रयोग करके सिद्ध करता है कि वास्तविक मनुष्य, उसकी आत्मा का नाश नहीं हुआ है और न ही उसको समाप्त किया जा सकता है । यहां प्रश्न यह उठता है कि यदि उसका नाश नहीं होता है तो फिर उसका क्या होता है ? इस प्रश्न को हम उसी प्रकार हल करेंगे जिस प्रकार हम गणितीय समस्याओं को हल करते हैं । इस समस्या को हल करने के प्रयोजन से हमें उसके 'डाटा' अर्थात् आंकड़ों, संबंधित तथ्यों और सामग्रियों पर, साथ ही उसके संदेहात्मक पक्षों, उसकी परिकल्पनाओं और अपेक्षित निष्कर्मों पर गहन चिंतन करना होगा ।
अब हम प्रश्न के सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों पहलुओं पर विचार करते हैं । कभी-कभी प्रश्न की परिकल्पना या उसके आंकड़ों के गंभीर अध्ययन में हम संपूर्ण प्रश्न को सिद्ध करने में सफल हो जाते हैं । परंतु कभी-कभी ऐसे प्रश्न भी होते हैं, जिनके निष्कर्ष तथा उसके संदेहात्मक पहलुओं की विवेचना करनी पड़ती है और उन पर बारंबार गहन, चिंतन करना पड़ता है, जिससे प्रश्न के संदेहात्मक पक्षों को उपलब्ध आंकड़ों से जोड़ा जा सके या प्रश्न के वांछित निष्कर्ष को उसकी निहित परिकल्पना से सम्बद्ध किया जा सके । तो फिर ये आंकड़े और उससे सम्बद्ध परिणामात्मक पक्ष है क्या ? जीवन और मरण । ये हैं आंकड़े और उससे संबद्ध परिणामात्मक पक्ष । जन्म का परिदृश्य 'आंकड़े' के समान है और मृत्यु उसकी परिणामात्मक पक्ष के सदृश्य अथवा ये एक दूसरे के विलोम भी हो सकते हैं । लेकिन वास्तविकता यही है कि दोनों एक हैं, विलग नहीं ।
संसार में प्रतिदिन हजारों-लाखों लोगों का जन्म होता है और हजारों-लाखों की मृत्यु । जो लोग मृत्यु के ग्रास बन जाते हैं और जिनकी मानसिक ऊर्जा या उनकी अभिलाषाएं आदि भी प्रत्यक्षः उनके साथ ही समाप्त हो जाती है, तो इस प्रकार के निष्कर्ष से आप एक ऐसी स्थिति का निर्माण करते हैं, जो विज्ञान के मान्य सिद्धांतों के विरुद्ध है । यदि आपकी मानसिक ऊर्जा समाप्त हो जाती है, तब कुछ न कुछ 'शून्य' में परिवर्तित हो गया होता है । लेकिन आप जानते हैं कि यह असंभव है । कोई भी तत्त्व 'शून्य' या 'कुछ' नहीं में, बदल नहीं सकता है । इस भ्रम का निवारण करने के लिए आपको यह स्वीकार करना होगा कि मृत्यु पर्यंत मानसिक इच्छाएं, मानसिक ऊर्जा और मानसिक क्रियाशीलता 'शून्य' में या 'कुछ नहीं में' प्रवेश नहीं करती हैं । इस 'प्रतिज्ञा' को या इस 'तथ्य' की परिकल्पना को आप पहले स्वीकार करें और इसे 'स्वयंसिद्ध' मानें । इस तथ्य को मानकर ही आपको आगे बढ़ना होगा, तभी अगला प्रश्न यह होगा—उसका फिर क्या होता है ? हमारी मानसिक अभिलाषाओं आदि का क्या होता है ?
इस प्रश्न पर विचार करने के लिए हमें जन्म के परिदृश्य पर चिंतन करना होगा । इस संसार में अनेकानेक लोग पैदा हो रहे हैं जिनके विभिन्न रूप-रंग, आकार-प्रकार हैं, जिनकी अलग-अलग क्षमताएं हैं, जिनकी विभिन्न अभिरुचियां हैं, जिनका बिल्कुल अलग झुकाव और व्यवहार है । किन्हीं लोगों की बिल्कुल भिन्न प्रवृत्तियां हैं तो कुछ की शारीरिक रचनाओं में स्पष्ट अंतर है, किन्हीं-किन्हीं लोगों में मस्तिष्क विभिन्न तरीकों से गढ़े होते हैं, जैसे किसी का हल्का दिमाग होता है तो किसी का गोल-मटोल तो किन्हीं किन्हीं लोगों का सिर लंबा होता है और कुछ का अंडाकार । संसार में लोगों का जन्म भिन्न-भिन्न शक्तियों, क्षमताओं और सामर्थ्य के साथ होता है । यह सब कैसे होता है ? माता-पिता एक हैं पर उनकी संतानों के स्वभाव, उनके रुझान, उनकी प्रवृत्तियां एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत होती हैं । एक ही घर में जहां 'कैन' और 'अवेल' नामक बालक पैदा होते हैं वहीं 'जोसेफ' और उनके अन्य भाई भी उत्पन्न होते हैं । वे एक दूसरे के विपरीत हैं । पर ऐसा क्यों ? विद्यार्थी लोग एक ही कॉलेज में पढ़ते हैं, एक ही छात्रावास में रहते हैं, एक ही अध्यापक से दीक्षित होते हैं, फिर भी उनकी एक-दूसरे से बिल्कुल अलग रुझानें हैं, अलग प्रवृत्तियां होती हैं, उनके विचार और उनकी पसंद बिल्कुल, कभी-कभी विपरीत होती है, किसी को गणित पसंद है तो किसी की रुचि इतिहास में है तो कोई कविता का दीवाना है तो कोई बिल्कुल सुस्त, बुद्धिहीन । क्या लोगों की अभिरुचियों, उनकी पसंद, उनकी क्षमताओं और सामर्थ्य में कोई अंतर है या नहीं ? निश्चित रूप से अंतर स्पष्ट है । आप इससे इनकार नहीं कर सकते हैं । कुछ बालक समय से पूर्व ही प्रौढ़ हो जाते हैं, वे अपने बाल्यकाल में तेज होते हैं, जबकि दूसरे बालक अपने बचपन में सुस्त और आलसी होते हैं । इनकी रुझानों, प्रवृत्तियों और पसंदों में इतना अधिक अंतर होने का क्या कारण है ? वेदांत प्रश्न करता है कि विभिन्न लोगों में स्पष्ट रूप दिखाई देने वाली रुझानों और प्रवृत्ति में भेद-भाव या उनकी रुझानों और क्षमताओं में अंतर के कारण की, व्याख्या आप किस प्रकार करेंगे ? यदि आप यह कहकर इस प्रश्न का समाधान करना चाहते हैं, कि यह तो ईश्वरेच्छा है, यह ईश्वर ने किया है, तो यह कोई उत्तर नहीं है, इसे तो इस प्रश्न का टालना मात्र माना जाएगा और उत्तर देने से विरत होना प्रतीत होगा, जो गैर-दार्शनिक है, दर्शन-विरोधी है, इससे तो आपका अज्ञान उजागर होता है ।
कृपया इस प्रश्न का समाधान विज्ञान-सम्मत मान्य नियमों के आधार कीजिए । यदि आप यह कहते हैं कि यह ईश्वर की इच्छा थी कि ये बालक जन्म से ही अमुक-अमुक इच्छाएं लेकर पैदा हों तो आप यह निष्कर्ष निकालने में विज्ञान के मान्य नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं । व्यावहारिक रूप से आप ईश्वरेच्छा की मान्यता से यही प्रतिपादन कर रहे हैं कि 'शून्य' से अथवा 'कुछ' नहीं से 'कुछ' प्रकट हो रहा है । यह निष्कर्ष असंगत और बेतुका है । इससे सभी सहमत होंगे । इस कठिनाई को दूर करने के उद्देश्य से आपको यह स्वीकार करना होगा कि शिशु अपने जन्म के साथ ही अपने अंदर विभिन्न प्रकार की रुझानों, प्रवृत्तियों और क्षमताओं आदि को दूसरे संसार से लेकर आता है । शिशु अपनी विभिन्न प्रकार की इच्छाएं 'शून्य' या 'कुछ नहीं है' से नहीं लाता है । वरन् इन इच्छाओं का प्रादुर्भाव 'ठोस' अथवा 'किसी दृश्य विशेष' से हुआ है, इनका अस्तित्व 'शून्य' या 'कुछ नहीं' से नहीं आया है, ये इच्छाएं तो पूर्ववर्ती जीवन में विद्यमान रही हैं ।