श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

वासना न रहे

अध्याय 8 / 9 · सफलता के आध्यात्मिक सूत्र
अध्याय 8 / 9

वासना न रहे

सफलता को निःसंदेह प्राप्त कराने वाली अंतिम बात जो महत्ता में किसी से कम नहीं है, वह है पवित्रता । यह सत्य है कि संकल्प या खयाल प्रारब्ध का दूसरा नाम है । मनुष्य जो कुछ खयाल करता है, वही हो जाता है । किंतु यदि आप गंदी बातें विचारने लगें और पतित बनानेवाले दुराचारों का पोषण करने लगें, तो इन स्वार्थमय इच्छाओं की पूर्ति के साथ-साथ हृदय को चूर्ण कर देनेवाली पीड़ा और अति वेदनाकारी कष्ट को भी सहने के लिए अपने मन को तैयार रखो । हाथ और पैर तो गरम रहें अथवा काम करते रहें, किंतु अपना मस्तिष्क शांत और एकाग्र रखो । अपने विचारों को सदा स्वस्थ अर्थात वास्तविक स्वरूप में केंद्रित रखो और परिस्थितियों की कुछ परवाह न करो ।

मानव जाति का हित करने का विचार आपको हैरान न करने पाए । संसार इतना दीन क्यों हो कि वह निरंतर तुम्हारे ध्यान की भिक्षा करता रहे । शरीर को अपनी ही मुक्ति के लिए काम करते रहने दो । मूर्ख लोग व्यर्थ ही प्रकाश के लिए प्रार्थना और काम करते रहते हैं । तुम्हें प्रकाश चाहने की भी क्या आवश्यकता है । प्रकाश के लिए लालसा तुम्हें अंधकार में रखती है । एक क्षण के लिए सब इच्छाओं को दूर फेंक दो । ॐ (प्रणव) की रट लगाओ । न आसक्ति हो, न घृणा, पूर्ण समता हो । तब देखो, तुम्हारा समग्र शरीर प्रकाश स्वरूप हो जाता है या नहीं ।

कार्य के सब सांसारिक उद्देश्यों को दूर कर दो । इच्छारूपी प्रेतों को उतार दो अर्थात भगा दो । अपने सब कामों को पवित्र बना दो । आसक्ति या लगन के रोग से अपने को छुड़ा लो । एक पदार्थ में आसक्ति आपको सर्वव्यापक से पृथक कर देती है । स्वार्थमय पाशविक उद्देश्य ही आपके व्यवसाय और जीवन को लौकिक बना देते हैं । कार्य में अज्ञातरूप से जो त्याग निहित है, उसका मजा चखने के लिए तुम परिश्रम करो । शरीर या परिछिन्न आत्मा से परे रहते हुए (क्योंकि कार्य तुम्हें ईश्वर के साथ अभिन्न रखता है) अपना काम करो । निष्काम कर्म सर्वोच्च त्याग या उपासना का दूसरा नाम है । काम करने में तुम्हारा कोई उद्देश्य क्यों हो ? मूर्ख अभागे विश्वास करते हैं कि स्वयं काम की अपेक्षा उद्देश्य पूरे होकर अधिक सुख देते हैं । वे अंधे जानते ही नहीं कि स्वयं काम से बढ़कर अधिक सुख किसी भी परिणाम में नहीं मिल सकता ।

व्याकुल करनेवाले शोक भी बदले में आपको जबरदस्ती भुगतने पड़ेंगे । शोक तुम्हारी आत्मा पर आक्रमण करेगा । मूर्ख समझता है कि वह इंद्रियों के सुख लूटता है, किंतु यह नहीं जानता कि अस्वच्छ विचार या कार्य के बदले में उसकी जीवन-शक्ति ही मोल ले जाती है अर्थात बिक जाती है अथवा नष्ट हो जाती है । स्वार्थमय उद्देश्यों के लिए जब तुम कर्म का दुरुपयोग करते हो, तब कर्म का कानून इसका बदला लेता है और तुम्हें निरर्थक तथा असफल बना देता है ।

ईश्वर पर अपनी मर्जी मत चलाओ । शारीरिक आवश्यकताओं के संबंध में ईश्वर की इच्छा पूर्ण होने दो । सांसारिक आवश्यकताओं में ईश्वर की मर्जी को अपनी मर्जी बना लो । समझो, जानो कि तुम वही परमशक्ति हो, जिसकी इच्छा ने परिस्थितियों के वर्तमान रूप की रचना की है । अपनी गरीबी को अपनी ही करतूत समझकर उसे सानंद भोगो । किंतु यदि विषयवासना तुम्हें पथभ्रष्ट कर दे और कामुकता के दलदल में तुम अपने को फंसा हुआ पाओ, तो अपनी ईश्वर भावना अथवा आत्मानुभूति को पाने और बनाए रखने के लिए अपनी प्रबल इच्छाशक्ति का प्रतिपादन करो और उससे बड़े यत्न से काम लो ।

इस देश में कामुकता (Cupidity) प्रेम के पवित्र नाम से दशाई जाती है । कैसा पाखंड है ? लोग शुद्ध जीवन व्यतीत नहीं करते । असाधारण स्नेह और साधारण वासनाएं उनके दैनिक जीवन को खंड-खंड में बांट देती है । शायद ही कभी कोई युवक अपने भाव प्रकट करने में लाग-लपेट न रखता हो । युवक का एक अंश तो उसकी प्रेयसी के पास रहता है और दूसरा किसी दूसरे पदार्थ में लगा रहता है ।

अपने कार्य को प्यार करो, जहां तुम्हारा आनंद कर्म के वस्त्र पहने रहता है, तुम अपनी सफलता सदा अपने साथ रख सकते हो । इस तरह विशाल विश्व तुम्हारा पवित्र मंदिर और तुम्हारा समग्र जीवन एक निरंतर स्तोत्र हो जाता है ।

फल की तुम्हें क्या चिंता है ? वेतन या तनख्वाह के लिए हैरानी तुम्हारे पास न फटके । यदि कोई उच्च पद तुम्हें नहीं मिला, तो पदवी को व्यर्थ अभिमान तुम्हें सड़कों पर झाड़ू देने से न रोके । तुम्हारे हाथ के सामने जो काम आ पड़े, उसे करने से न हिचको । परिपाटी के विरुद्ध कार्य को त्याग देना यह कोई आत्म-सम्मान नहीं है ।

सच्चा आत्म-सम्मान अपने निज स्वरूप या स्वयं में स्थित आत्मा का सम्मान है । शारीरिक सम्मान नेकी का प्रतिकूल ध्रुव है तथा बिल्कुल नरक का सीधा रास्ता है । जब तुम किसी भी श्रम के लिए अपना हाथ बढ़ाने को तैयार हो, तो अतिश्रेष्ठ पद और अत्यंत प्रतिष्ठित व्यवसाय तुम्हारा हार्दिक स्वागत करने को अपने हाथ फैलाएगा । यही प्रकृति का नियम है ।

परिश्रम में निवास करनेवाले ईश्वर से यदि तुम झिझकते और उलझते नहीं, तो ईश्वर से अधिक शिष्टता कौन दिखा सकता है । तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध भी प्रकाश तुम्हारे द्वारा प्रकाशित होगा । मानव जाति की निंदा या स्तुति में विश्वास न करो । ये बातें केवल तुम्हें पथभ्रष्ट करती हैं या धोखे में डालती हैं । तुम्हारा स्वर्ग तुम्हारे अंदर है । बाह्य में अर्थात कहने मात्र के आनंद के पदार्थों में सुख लूटने के लिए जब आप झुकते हैं, तब तुम स्वयं को तथा पदार्थों को अपवित्र या अशुद्ध बनानेवाले होते हो । बाहरी सुखों से कह दो, 'Get behind me Saitan ill take nothing at thy hands.' शैतान ! मेरे पीछे हट, मैं तेरे हाथों से कुछ नहीं लेने का । संपूर्ण आनंद का स्रोत क्या तुम नहीं हो ?

भारतीय कोयल या फाख्ता को देवदारु के वृक्ष पर बैठा दो वह सहजभाव से मधुर गीत गाने लगेगी । अपने चित्त को अपने असली घर में बैठने दो और तुम आश्चर्यचकित होओगे यह देखकर कि उसमें से स्वाभाविक रूप से, बिना किसी प्रयास के मीठे स्वर निकलने लगेंगे । तुम्हारा ईश्वरत्व ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जिसे पूरा होना है । आत्मानुभाव ऐसी चीज नहीं है, जो प्राप्त करनी है, ईश्वर-दर्शन पाने के लिए तुम्हें कुछ करना नहीं है, अपने इर्द-गिर्द इच्छाओं का घटाटोप डाले रखने के रूप में तुमने अब तक जो काम कर रखा है, उसका निराकरण मात्र करना है ।

स्वच्छ और अमृत समान मीठे जल पर काई जम गई है, जिसके कारण जल दिख नहीं रहा । काई को हटाओ और अमृत समान मीठे जल को पीकर अमर हो जाओ । परमात्मा को प्राप्त नहीं करना है, वह तो विराजमान है । सिर्फ उस पर्दे को हटाना है, जिसकी वजह से उसके दर्शन नहीं हो पा रहे, जो है । ईश्वर और प्रेम एक ही वस्तु के दो नाम हैं । इसे आप स्वयं समझने का प्रयास करो ।

डरो मत, वहम मुक्त होओ । तुम्हारे प्रतीत होनेवाले बंधन भी तुम पर अपनी स्वतंत्रता से पड़े हुए हैं । तुम्हारे आमंत्रण के बिना तुम्हें कोई हानि नहीं हो सकती । तुम्हें कोई तलवार नहीं काट सकती, जब तक तुम न समझो कि वह काटती है । अपनी बेड़ियों और हथकड़ियों को गहने के समान प्यार करने की कोई आवश्यकता नहीं है । बेमतलब की आसक्तियों को झिटककर दूर करो, समस्त कुटिलता को त्याग दो, मानो उसका कभी अस्तित्व था ही नहीं ।

छोटा-सा बुलबुला फूटने पर वह समूचा समुद्र हो जाता है । तुम समग्र रूप हो, अनंत रूप हो, सर्वरूप हो । अपनी वास्तविक ज्योति में चमको । हे पूर्ण ब्रह्म ! तेरे लिए न तो कोई कर्तव्य है, न काम, तुझे कुछ नहीं करना है, संपूर्ण प्रकृति दबी सांस से तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही है । तुम्हारी उपासना और पूजा करने का सौभाग्य पाकर संसार अपने आपको धन्यवाद देता है । प्राकृतिक शक्तियों का प्रणाम और वंदना तुम स्वीकार करने की कृपा करा ।