मंगल-मूरति मारूत नंदनं। सकल-अमंगल-मूल-निकंदनं।।1।।
पवनतनय संतन-हितकारी। हृदय विराजत अवध बिहारी।।2।।
मातु-पिता, गुरू, गनपति, सारद। सिवा-समेत संभु, सुक, नारद।।3।।
चरन बंदि बिनवों सब काहू। देहु रामपद-नेह-निबाहू।।4।।
बंदौं राम-लखन-वैदेही। जो तुलसी के परम सनेही।।5।।