पद १३६
(१)
जिव जबते हरितें बिलगान्यो। तबतें देह गेह निज जान्यो ॥
मायाबस स्वरुप बिसरायो। तेहि भ्रमतें दारुन दुख पायो ॥
पायो जो दारुन दुसह दुख, सुख-लेस सपनेहुँ नहिं मिल्यो।
भव-सूल,सोक अनेक जेहि, तेहि पंथ तू हठि हठि चल्यो ॥
बहु जोनि जनम,जरा,बिपति, मतिमंद! हरि जान्यो नहीं।
श्रीराम बिनु बिश्राम मूढ़! बिचारु, लखि पायो कहीं ॥
(२)
आनँद-सिंधु-मध्य तव बासा। बिनु जाने कस मरसि पियासा ॥
मृग-भ्रम-बारि सत्य जिय जानी। तहँ तू मगन भयो सुख मानी ॥
तहँ मगन मज्जसि,पान करि,त्रयकाल जल नाहीं जहाँ।
निज सहज अनुभव रूप तव खल! भूलि अब आयो तहाँ ॥
निरमल,निरंजन,निरबिकार,उदार,सुख तैं परिहर्यो।
निःकाज राज बिहाय नृप इव सपन कारागृह पर्यो ॥
(३ )
तैं निज करम-डोरि दृढ़ कीन्हीं। अपने करनि गाँठि गहि दीन्हीं ॥
ताते परबस पर्यो अभागे। ता फल गरभ-बास-दुख आगे ॥
आगे अनेक समूह संसृत उदरगत जान्यो सोऊ।
सिर हेठ,ऊपर चरन, संकट बात नहिं पूछै कोऊ ॥
सोनित-पुरीष जो मूत्र-मल कृमि-कर्दमावृत सोवई।
कोमल सरीर,गँभीर बेदन, सीस धुनि-धुनि रोवई ॥
(४ )
तू निज करम-जालल जहँ घेरो। श्रीहरि संग तज्यो नहिं तेरो ॥
बहुबिधि प्रतिपालन प्रभु कीन्हों। परम कृपालु ग्यान तोहि दीन्हों ॥
तोहि दियो ग्यान-बिबेक,जनम अनेककी तब सुधि भई।
तेहि ईसकी हौं सरन, जाकी बिषम माया गुनमई ॥
जेहि किये जीव-निकाय बस,रसहीन,दिन-दिन अति नई।
सो करौ बेगि सँभारि श्रीपति,बिपति, महँ जेहि मति दई ॥
(५ )
पुनि बहुबिधि गलानि जिय मानी। अब जग जाइ भजौं चक्रपानी ॥
ऐसेहि करि बिचार चुप साधी। प्रसव-पवन प्रेरेउ अपराधी ॥
प्रेर्यो जो परम प्रचंड मारुत,कष्ट नाना तैं सह्यो।
सो ग्यान,ध्यान,बिराग,अनुभव जातना-पावक दह्यो ॥
अति खेद ब्याकुल,अलप बल,छिन एक बोलि न आवई।
तव तीव्र कष्ट न जान कोउ, सब लोग हरषित गावई ॥
(६ )
बाल दसा जेते दुख पाये। अति असीम, नहिं जाहिं गनाये ॥
छुधा-ब्याधि-बाधा भइ भारी। बेदन नहिं जानै महतारी ॥
जननी न जानै पीर सो,केहि हेतु सिसु रोदन करै।
सोइ करै बिबिध उपाय, जातें अधिक तुव छाती जरै ॥
कौमार,सैसव अरु किसोर अपार अघ को कहि सकै।
ब्यतिरेक तोहि निरदय! महाखल! आन कहु को सहि सकै ॥
(७ )
जोबन जुवती सँग रँग रात्यो। तब तू महा मोह-मद मात्यो ॥
ताते तजी धरम-मरजादा। बिसरे तब सब प्रथम बिषादा ॥
बिसरे बिषाद,निकाय-संकट समुझि नहिं फाटत हियो।
फिरि गर्भगत-आवर्त सृंसतिचक्र जेहि होइ सोइ कियो ॥
कृमि-भस्म-बिट-परिनाम तनु, तेहि लागि जग बैरी भयो।
परदार,परधन,द्रोहपर,संसार बाढ़ै नित नयो ॥
(८ )
देखत ही आई बिरुधाई। जो तैं सपनेहुँ नाहिं बुलाई ॥
ताके गुन कछु कहे न जाहीं। सो अब प्रगट देखु तनु माहीं ॥
सो प्रगट तनु जरजर जराबस,ब्याधि,सूल सतावई।
सिर-कंप,इन्द्रिय-सक्ति प्रतिहत,बचन काहु न भावई ॥
गृहपालहूतें अति निरादर,खान-पान न पावई।
ऐसिहु दसा न बिराग तहँ,तृष्णा-तरंग बढ़ावई ॥
(९ )
कहि को सकै महाभव तेरे। जनम एकके कछुक गनेरे ॥
चारि खानि संतत अवगाहीं। अजहुँ न करु बिचार मन माहीं ॥
अजहुँ बिचारु,बिकार तजि, भजु राम जन-सुखदायकं।
भवसिंधु दुस्तर जलरथं, भजु चक्रधर सुरनायकं ॥
बिनु हेतु करुनाकर,उदारे, अपार-माया-तारनं।
कैवल्य-पति,जगपति,रमापति,प्रानपति,गतिकारनं ॥
(१०)
रघुपति-भगति सुलभ,सुखकारी। सो त्रयताप-सोक-भय-हारी ॥
बिनु सतसंग भगति नहिं होई। ते तब मिलै द्रवै जब सोई ॥
जब द्रवै दीनदलयालु राघव, साधु-संगति पाइये।
जेहि दरस-परस-समागमादिक पापरासि नसाइये ॥
जिनके मिले दुख-सुख समान, अमानतादिक गुन भये।
मद-मोह लोभ-बिषाद-क्रोध सुबोधतें सहजहिं गये ॥
(११)
सेवत साधु द्वैत-भय भागै। श्रीरघुबीर-चरन लय लागै ॥
देह-जनित विकार सब त्यागै। तब फिरि निज स्वरूप अनुरागै ॥
अनुराग सो निज रूप जो जगतें बिलच्छन देखिये।
सन्तोष,सम,सीतल,सदा दम, देहवंत न लेखिये ॥
निरमल,निरामय,एकरस,तेहि हरष-सोक न ब्यापई।
त्रैलोक-पावन सो सदा जाकी दसा ऐसी भई ॥
(१२)
जो तेहि पंथ चलै मन लाई। तौ हरि काहे न होहिं सहाई।
जो मारग श्रुति-साधु दिखावै। तेहि पथ चलत सबै सुख पावै ॥
पावै सदा सुख हरि-कृपा,संसार-आसा तजि रहै।
सपनेहुँ नहीं सुख द्वैत-दरसन, बात कोटिक को कहै ॥
द्विज,देव,गुरु,हरि,संत बिनु संसार-पार न पाइये।
यह जानि तुलसीदास त्रासहरन रमापति गाइये ॥