श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद १३६

श्रीराम-स्तुति · पद १३६ / २७९

(१)

जिव जबते हरितें बिलगान्यो। तबतें देह गेह निज जान्यो ॥

मायाबस स्वरुप बिसरायो। तेहि भ्रमतें दारुन दुख पायो ॥

पायो जो दारुन दुसह दुख, सुख-लेस सपनेहुँ नहिं मिल्यो।

भव-सूल,सोक अनेक जेहि, तेहि पंथ तू हठि हठि चल्यो ॥

बहु जोनि जनम,जरा,बिपति, मतिमंद! हरि जान्यो नहीं।

श्रीराम बिनु बिश्राम मूढ़! बिचारु, लखि पायो कहीं ॥

(२)

आनँद-सिंधु-मध्य तव बासा। बिनु जाने कस मरसि पियासा ॥

मृग-भ्रम-बारि सत्य जिय जानी। तहँ तू मगन भयो सुख मानी ॥

तहँ मगन मज्जसि,पान करि,त्रयकाल जल नाहीं जहाँ।

निज सहज अनुभव रूप तव खल! भूलि अब आयो तहाँ ॥

निरमल,निरंजन,निरबिकार,उदार,सुख तैं परिहर्यो।

निःकाज राज बिहाय नृप इव सपन कारागृह पर्यो ॥

(३ )

तैं निज करम-डोरि दृढ़ कीन्हीं। अपने करनि गाँठि गहि दीन्हीं ॥

ताते परबस पर्यो अभागे। ता फल गरभ-बास-दुख आगे ॥

आगे अनेक समूह संसृत उदरगत जान्यो सोऊ।

सिर हेठ,ऊपर चरन, संकट बात नहिं पूछै कोऊ ॥

सोनित-पुरीष जो मूत्र-मल कृमि-कर्दमावृत सोवई।

कोमल सरीर,गँभीर बेदन, सीस धुनि-धुनि रोवई ॥

(४ )

तू निज करम-जालल जहँ घेरो। श्रीहरि संग तज्यो नहिं तेरो ॥

बहुबिधि प्रतिपालन प्रभु कीन्हों। परम कृपालु ग्यान तोहि दीन्हों ॥

तोहि दियो ग्यान-बिबेक,जनम अनेककी तब सुधि भई।

तेहि ईसकी हौं सरन, जाकी बिषम माया गुनमई ॥

जेहि किये जीव-निकाय बस,रसहीन,दिन-दिन अति नई।

सो करौ बेगि सँभारि श्रीपति,बिपति, महँ जेहि मति दई ॥

(५ )

पुनि बहुबिधि गलानि जिय मानी। अब जग जाइ भजौं चक्रपानी ॥

ऐसेहि करि बिचार चुप साधी। प्रसव-पवन प्रेरेउ अपराधी ॥

प्रेर्यो जो परम प्रचंड मारुत,कष्ट नाना तैं सह्यो।

सो ग्यान,ध्यान,बिराग,अनुभव जातना-पावक दह्यो ॥

अति खेद ब्याकुल,अलप बल,छिन एक बोलि न आवई।

तव तीव्र कष्ट न जान कोउ, सब लोग हरषित गावई ॥

(६ )

बाल दसा जेते दुख पाये। अति असीम, नहिं जाहिं गनाये ॥

छुधा-ब्याधि-बाधा भइ भारी। बेदन नहिं जानै महतारी ॥

जननी न जानै पीर सो,केहि हेतु सिसु रोदन करै।

सोइ करै बिबिध उपाय, जातें अधिक तुव छाती जरै ॥

कौमार,सैसव अरु किसोर अपार अघ को कहि सकै।

ब्यतिरेक तोहि निरदय! महाखल! आन कहु को सहि सकै ॥

(७ )

जोबन जुवती सँग रँग रात्यो। तब तू महा मोह-मद मात्यो ॥

ताते तजी धरम-मरजादा। बिसरे तब सब प्रथम बिषादा ॥

बिसरे बिषाद,निकाय-संकट समुझि नहिं फाटत हियो।

फिरि गर्भगत-आवर्त सृंसतिचक्र जेहि होइ सोइ कियो ॥

कृमि-भस्म-बिट-परिनाम तनु, तेहि लागि जग बैरी भयो।

परदार,परधन,द्रोहपर,संसार बाढ़ै नित नयो ॥

(८ )

देखत ही आई बिरुधाई। जो तैं सपनेहुँ नाहिं बुलाई ॥

ताके गुन कछु कहे न जाहीं। सो अब प्रगट देखु तनु माहीं ॥

सो प्रगट तनु जरजर जराबस,ब्याधि,सूल सतावई।

सिर-कंप,इन्द्रिय-सक्ति प्रतिहत,बचन काहु न भावई ॥

गृहपालहूतें अति निरादर,खान-पान न पावई।

ऐसिहु दसा न बिराग तहँ,तृष्णा-तरंग बढ़ावई ॥

(९ )

कहि को सकै महाभव तेरे। जनम एकके कछुक गनेरे ॥

चारि खानि संतत अवगाहीं। अजहुँ न करु बिचार मन माहीं ॥

अजहुँ बिचारु,बिकार तजि, भजु राम जन-सुखदायकं।

भवसिंधु दुस्तर जलरथं, भजु चक्रधर सुरनायकं ॥

बिनु हेतु करुनाकर,उदारे, अपार-माया-तारनं।

कैवल्य-पति,जगपति,रमापति,प्रानपति,गतिकारनं ॥

(१०)

रघुपति-भगति सुलभ,सुखकारी। सो त्रयताप-सोक-भय-हारी ॥

बिनु सतसंग भगति नहिं होई। ते तब मिलै द्रवै जब सोई ॥

जब द्रवै दीनदलयालु राघव, साधु-संगति पाइये।

जेहि दरस-परस-समागमादिक पापरासि नसाइये ॥

जिनके मिले दुख-सुख समान, अमानतादिक गुन भये।

मद-मोह लोभ-बिषाद-क्रोध सुबोधतें सहजहिं गये ॥

(११)

सेवत साधु द्वैत-भय भागै। श्रीरघुबीर-चरन लय लागै ॥

देह-जनित विकार सब त्यागै। तब फिरि निज स्वरूप अनुरागै ॥

अनुराग सो निज रूप जो जगतें बिलच्छन देखिये।

सन्तोष,सम,सीतल,सदा दम, देहवंत न लेखिये ॥

निरमल,निरामय,एकरस,तेहि हरष-सोक न ब्यापई।

त्रैलोक-पावन सो सदा जाकी दसा ऐसी भई ॥

(१२)

जो तेहि पंथ चलै मन लाई। तौ हरि काहे न होहिं सहाई।

जो मारग श्रुति-साधु दिखावै। तेहि पथ चलत सबै सुख पावै ॥

पावै सदा सुख हरि-कृपा,संसार-आसा तजि रहै।

सपनेहुँ नहीं सुख द्वैत-दरसन, बात कोटिक को कहै ॥

द्विज,देव,गुरु,हरि,संत बिनु संसार-पार न पाइये।

यह जानि तुलसीदास त्रासहरन रमापति गाइये ॥