पद १३५
राम सनेही सों तैं न सनेह कियो।
अगम जो अमरनि हूँ सो तनु तोहिं दियो ॥
दियो सुकुल जनम,सरीर सुंदर, हेतु जो फल चारिको।
जो पाइ पंडित परमपद, पावत पुरारि-मुरारिको ॥
यह भरतखंड,समीप सुरसरि,थल भलो,संगति भली।
तेरी कुमति कायर! कलप-बल्ली चहति है बिष फल फली ॥ १ ॥
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अजहूँ समुझि चित दै सुनु परमारथ।û
है हित सो जगहूँ जाहिते स्वारथ ॥
स्वारथहि प्रिय,स्वारथ सो का ते कौन बेद बखानई।
देखु खल,अहि-खेल परिहरि,सो प्रभुहि पहिचानाई ॥
पितु-मातु,गुरु,स्वामी,अपनपौ,तिय,तनय,सेवक,सखा।
प्रिय लगत जाके प्रेमसों,बिनु हेतु हित तैं नहि लखा ॥ २ ॥
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दूरि न सो हितू हेरि हिये ही है।
छलहि छाँड़ि सुमिरे छोहु किये ही है।
किये छोहु छाया कमल करकी भगतपर भजतहि भजै।
जगदीश,जीवन जीवको, जो साज सब सबको सजै ॥
हरिहि हरिता,बिधिहि बिधिता,सिवहि सिवता जो दई।
सोइ जानकी-पति मधुर मूरति,मोदमय मंगल मई ॥ ३ ॥
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ठाकुर अतिहि बड़ो,सील,सरल,सुठि।
ध्यान अगम सिवहूँ,भेट्यो केवट उठि ॥
भरि अंक भेट्यो सजल नयन, सनेह सिथिल सरीर सो।
सुर,सिद्ध,मुनि,कबि कहत कोउ न प्रेमप्रिय रघुबीर सो।
खग,सबरि,निसिचर,भालु,कपि किये आपु ते बंदित बड़े।
तापर तिन्ह कि सेवा सुमिरि जिय जात जनु सकुचनि गड़े ॥ ४ ॥
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स्वामीको सुभाव कह्यो सो जब उर आनिहै।
सोच सकल मिटिहै, राम भलो मन मानिहैं ॥
भलो मानिहै रघुनाथ जोरि जो हाथ माथो नाइहै।
ततकाल तुलसीदास जीवन-जनमको फल पाइहै ॥
जपि नाम करहि प्रनाम,कहि गुन-ग्राम,रामहिं धरि हिये।
बिचरहि अवनि अवनीस-चरनसरोज मन-मधुकर किये ॥ ५ ॥