श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद १३५

श्रीराम-स्तुति · राग सुहो बिलावल · पद १३५ / २७९

राम सनेही सों तैं न सनेह कियो।

अगम जो अमरनि हूँ सो तनु तोहिं दियो ॥

दियो सुकुल जनम,सरीर सुंदर, हेतु जो फल चारिको।

जो पाइ पंडित परमपद, पावत पुरारि-मुरारिको ॥

यह भरतखंड,समीप सुरसरि,थल भलो,संगति भली।

तेरी कुमति कायर! कलप-बल्ली चहति है बिष फल फली ॥ १ ॥

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अजहूँ समुझि चित दै सुनु परमारथ।û

है हित सो जगहूँ जाहिते स्वारथ ॥

स्वारथहि प्रिय,स्वारथ सो का ते कौन बेद बखानई।

देखु खल,अहि-खेल परिहरि,सो प्रभुहि पहिचानाई ॥

पितु-मातु,गुरु,स्वामी,अपनपौ,तिय,तनय,सेवक,सखा।

प्रिय लगत जाके प्रेमसों,बिनु हेतु हित तैं नहि लखा ॥ २ ॥

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दूरि न सो हितू हेरि हिये ही है।

छलहि छाँड़ि सुमिरे छोहु किये ही है।

किये छोहु छाया कमल करकी भगतपर भजतहि भजै।

जगदीश,जीवन जीवको, जो साज सब सबको सजै ॥

हरिहि हरिता,बिधिहि बिधिता,सिवहि सिवता जो दई।

सोइ जानकी-पति मधुर मूरति,मोदमय मंगल मई ॥ ३ ॥

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ठाकुर अतिहि बड़ो,सील,सरल,सुठि।

ध्यान अगम सिवहूँ,भेट्यो केवट उठि ॥

भरि अंक भेट्यो सजल नयन, सनेह सिथिल सरीर सो।

सुर,सिद्ध,मुनि,कबि कहत कोउ न प्रेमप्रिय रघुबीर सो।

खग,सबरि,निसिचर,भालु,कपि किये आपु ते बंदित बड़े।

तापर तिन्ह कि सेवा सुमिरि जिय जात जनु सकुचनि गड़े ॥ ४ ॥

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स्वामीको सुभाव कह्यो सो जब उर आनिहै।

सोच सकल मिटिहै, राम भलो मन मानिहैं ॥

भलो मानिहै रघुनाथ जोरि जो हाथ माथो नाइहै।

ततकाल तुलसीदास जीवन-जनमको फल पाइहै ॥

जपि नाम करहि प्रनाम,कहि गुन-ग्राम,रामहिं धरि हिये।

बिचरहि अवनि अवनीस-चरनसरोज मन-मधुकर किये ॥ ५ ॥