श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 138

कबहुँ सो कर-सरोज रघुनायक! धरिहौ नाथ सीस मेरे।

जेहि कर अभय किये जन आरे, बारकल बिबस नाम टेरे ॥ 1 ॥

जेहि कर-कमल कठोर संभुधन भंजि जनक-संसय मेट्यो।

जेहि कर-कमल उठाइ बंधु ज्यों, परम प्रीती केवट भेंट्यो ॥ 2 ॥

जेहि कर-कमल कृपालु गीधकहँ, पिंड देइ निजधाम दियो।

जेहि कर बालि बिदारि दास-हित, कपिकुल-पति सुग्रीव कियो ॥ 3 ॥

आयो सरन सभीत बिभीषन जेहि कर-कमल तिलक कीन्हों।

जेहि कर गहि सर चाप असुर हति, अभयदान देवन्ह दीन्हों ॥ 4 ॥

सीतल सुखद छाँह जेहि करकी, मेटति पापो,ताप,माया।

निसि-बासर तेहि कर सरोजकी, चाहत तुलसिदास छाया ॥ 5 ॥