श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद १३८

श्रीराम-स्तुति · पद १३८ / २७९

कबहुँ सो कर-सरोज रघुनायक! धरिहौ नाथ सीस मेरे।

जेहि कर अभय किये जन आरे, बारकल बिबस नाम टेरे ॥ १ ॥

जेहि कर-कमल कठोर संभुधन भंजि जनक-संसय मेट्यो।

जेहि कर-कमल उठाइ बंधु ज्यों, परम प्रीती केवट भेंट्यो ॥ २ ॥

जेहि कर-कमल कृपालु गीधकहँ, पिंड देइ निजधाम दियो।

जेहि कर बालि बिदारि दास-हित, कपिकुल-पति सुग्रीव कियो ॥ ३ ॥

आयो सरन सभीत बिभीषन जेहि कर-कमल तिलक कीन्हों।

जेहि कर गहि सर चाप असुर हति, अभयदान देवन्ह दीन्हों ॥ ४ ॥

सीतल सुखद छाँह जेहि करकी, मेटति पापो,ताप,माया।

निसि-बासर तेहि कर सरोजकी, चाहत तुलसिदास छाया ॥ ५ ॥