श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद १३९

श्रीराम-स्तुति · पद १३९ / २७९

दीनदयालु,दुरित दारिद दुख दुनी दुसह तिहुँ ताप तई है।

देव दुवार पुकारत आरत, सबकी सब सुख हानि भई है ॥ १ ॥

प्रभुके बचन,बेद-बुध-सम्मत,’मम मूरति महिदेवमई है’।

तिनकी मति रिस-राग-मोह-मद,लोभ लालची लीलि लई है ॥ २ ॥

राज-समाज कुसाज कोटि कटु कलपित कलुष कुचाल नई है।

नीति,प्रतीति,प्रीति परमित पति हेतुबाद हठि हेरि हई है ॥ ३ ॥

आश्रम-बरन-धरम-बिरहित जग, लोक-बेद-मरजाद गई है।

प्रजा पतित,पाखंड-पापरत, अपने अपने रंग रई है ॥ ४ ॥

सांति,सत्य,सुभ,रीति गई घटि,बढ़ी कुरीति,कपट-कलई है।

सीदत साधु,साधुता सोचति,खल बिलसत,हुलसति खलई है ॥ ५ ॥

परमारथ स्वारथ,साधन भये अफल,सफल नहिं सिद्धि सई है।

कामधेनु-धरनी कलि-गोमर-बिबस बिकल जामति न बई है ॥ ६ ॥

कलि-करनी बरनिय कहाँ लौं,करत फिरत बिनु टहल टई है।

तापर दाँत पीसि कर मींजत, को जानै चित कहा ठई है ॥ ७ ॥

त्यों त्यों नीच चढ़त सिर ऊपर, ज्यों ज्यों सीलबस ढील दई है।

सरुष बरजि तरजिये तरजनी, कुम्हिलैहै कुम्हड़ेकी जई है ॥ ८ ॥

दीजै दादि देखि ना तौ बलि, महि मोद-मंगल रितई है।

भरे भाग अनुराग लोग कहैं , राम कृपा-चितवनि चितई है ॥ ९ ॥

बिनती सुनि सानंद हेरि हँसि, करुना-बारि भूमि भिजई है।

राम-राज भयो काज,सगुन सुभ, राजा राम जगत-बिजई है ॥ १० ॥

समरथ बड़ो,सुजान सुसाहब, सुकृत-सैन हारत जितई है।

सुजन सुभाव सराहत सादर, अनायास साँसति बितई है ॥ ११ ॥

उथपे थपन,उजारि बसावन, गई बहोरि बिरद सदई है।

तुलसी प्रभु आरत-आरतिहर, अभयबाँह केहि केहि न दई है ॥ १२ ॥