पद 174
श्रीराम-स्तुति · पद 174 / 279
जाके प्रिय न राम-बैदेही।
तजिये ताहि
——– कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही ॥ 1 ॥
सो छाँड़िये
तज्यो पिता प्रहलाद, बिभीषन बंधु, भरत महतारी।
बलि गुरु तज्यो कंत ब्रज-बनितन्हि, भये मुद-मंगलकारी ॥ 2 ॥
नाते नेह रामके मनियत सुहृद सुसेब्य जहाँ लों।
अंजन कहा आँखि जेहि फूटै, बहुतक कहौं कहाँ लौं ॥ 3 ॥
तुलसि सो सब भाँति परम हित पूज्य प्रानते प्यारो।
जासों होय सनेह राम-पद, एतो मतो हमारो ॥ 4 ॥