श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 174

जाके प्रिय न राम-बैदेही।

तजिये ताहि

——– कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही ॥ 1 ॥

सो छाँड़िये

तज्यो पिता प्रहलाद, बिभीषन बंधु, भरत महतारी।

बलि गुरु तज्यो कंत ब्रज-बनितन्हि, भये मुद-मंगलकारी ॥ 2 ॥

नाते नेह रामके मनियत सुहृद सुसेब्य जहाँ लों।

अंजन कहा आँखि जेहि फूटै, बहुतक कहौं कहाँ लौं ॥ 3 ॥

तुलसि सो सब भाँति परम हित पूज्य प्रानते प्यारो।

जासों होय सनेह राम-पद, एतो मतो हमारो ॥ 4 ॥