पद 173
श्रीराम-स्तुति · पद 173 / 279
नाहिंन आवत आन भरोसो।
यहि कलिकाल सकल साधनतरु है स्रम-फलनि फरो सो ॥ 1 ॥
तप,तीरथ,उपवास,दान,मख जेहि जो रुचै करो सो।
पायेहि पै जानिबो करम-फल भरि-भरि बेद परोसो ॥ 2 ॥
आगम-बिधि जप-जग करत नर सरत न काज खरो सो।
सुख सपनेहु न जोग-सिधि-साधन, रोग बियोग धरो सो ॥ 3 ॥
काम, क्रोध,मद,लोभ,मोह मिलि ग्यान बिराग हरो सो।
बिगरत मन संन्यास लेत जल नावत आम घरो सो ॥ 4 ॥
बहु मत मुनि बहु पंथ पुराननि जहाँ-तहाँ झगरो सो।
गुरु कह्यो राम-भजन नीको मोंहि लगत राज-डगरो सो ॥ 5 ॥
तुलसी बिनु परतीती प्रीति फिरि-फिरि पचि मरै मरो सो।
रामनाम-बोहित भव-सागर चाहै तरन तरो सो ॥ 6 ॥