श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 173

नाहिंन आवत आन भरोसो।

यहि कलिकाल सकल साधनतरु है स्रम-फलनि फरो सो ॥ 1 ॥

तप,तीरथ,उपवास,दान,मख जेहि जो रुचै करो सो।

पायेहि पै जानिबो करम-फल भरि-भरि बेद परोसो ॥ 2 ॥

आगम-बिधि जप-जग करत नर सरत न काज खरो सो।

सुख सपनेहु न जोग-सिधि-साधन, रोग बियोग धरो सो ॥ 3 ॥

काम, क्रोध,मद,लोभ,मोह मिलि ग्यान बिराग हरो सो।

बिगरत मन संन्यास लेत जल नावत आम घरो सो ॥ 4 ॥

बहु मत मुनि बहु पंथ पुराननि जहाँ-तहाँ झगरो सो।

गुरु कह्यो राम-भजन नीको मोंहि लगत राज-डगरो सो ॥ 5 ॥

तुलसी बिनु परतीती प्रीति फिरि-फिरि पचि मरै मरो सो।

रामनाम-बोहित भव-सागर चाहै तरन तरो सो ॥ 6 ॥