श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 176

राख्यो राम सुस्वामी सों नीच नेह न नातो। एते अनादर हूँ तोहि ते न हातो ॥ 1

जोरे नये नाते नेह फोकट फीके। देहके दाहक, गाहक जीके ॥ 2 ॥

अपने अपनेको सब चाहत नीको। मूल दुहुँको दयालु दूलह सीको ॥ 3 ॥

जीवको जीवन प्रानको प्यारो। सुखहूको सूख रामसो बिसारो ॥ 4 ॥

कियो करैगो तोसे खलको भलो। ऐसे सुसाहब सों तू कुचाल क्यौं चलो ॥ 5 ॥

तुलसी तेरी भलाई अजहूँ बूझै। राढ़उ राउत होत फिरिकै जूझै ॥ 6 ॥