पद 176
श्रीराम-स्तुति · पद 176 / 279
राख्यो राम सुस्वामी सों नीच नेह न नातो। एते अनादर हूँ तोहि ते न हातो ॥ 1
॥
जोरे नये नाते नेह फोकट फीके। देहके दाहक, गाहक जीके ॥ 2 ॥
अपने अपनेको सब चाहत नीको। मूल दुहुँको दयालु दूलह सीको ॥ 3 ॥
जीवको जीवन प्रानको प्यारो। सुखहूको सूख रामसो बिसारो ॥ 4 ॥
कियो करैगो तोसे खलको भलो। ऐसे सुसाहब सों तू कुचाल क्यौं चलो ॥ 5 ॥
तुलसी तेरी भलाई अजहूँ बूझै। राढ़उ राउत होत फिरिकै जूझै ॥ 6 ॥