पद 177
श्रीराम-स्तुति · पद 177 / 279
जो तुम त्यागों राम हौं तौं नहीं त्यागो। परिहरि पाँय काहि अनुरागों ॥ 1 ॥
सुखद सुप्रभु तुम सो जगमाहीं। श्रवन-नयन मन गोचर नाहीं ॥ 2 ॥
हौं जड़ जीव,ईस रघुराया। तुम मायापति,हौं बस माया ॥ 3 ॥
हौं तो कुजाचक,स्वामी सुदाता। हौं कुपूत, तुम हितु पितु-माता ॥ 4 ॥
जो पै कहुँ कोउ बूझत बातो। तौ तुलसी बिनु मोल बिकातो ॥ 5 ॥