श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद १८८

श्रीराम-स्तुति · पद १८८ / २७९

मैं तोहिं अब जान्यो संसार।

बाँधि न सकहिं मोहि हरिके बल,प्रगट कपट-आगार ॥ १ ॥

देखत ही कमनीय, कछू नाहिंन पुनि किये बिचार।

ज्यों कदलीतरु-मध्य निहारत, कबहुँ न निकसत सार ॥ २।

तेरे लिये जनम अनेक मैं फिरत न पायों पार।

महामोह-मृगजल-सरिता महँ बोर्यो हौं बारहिं बार ॥ ३ ॥

सुनु खल! छल बल कोटि किये बस होहिं न भगत उदार।

सहित सहाय तहाँ बसि अब ,जेहि हृदय न नंदकुमार ॥ ४ ॥

तासों करहु चातुरी जो नहिं जानै मरम तुम्हार।

सो परि डरै मरै रजु-अहि तें, बूझै नहिं ब्यवहार ॥ ५ ॥

निज हित सुनु सठ!हठ न करहि,जो चहहि कुसल परिवार।

तुलसिदास प्रभुके दासनि तजि भजहि जहाँ मद मार ॥ ६ ॥