श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 188

मैं तोहिं अब जान्यो संसार।

बाँधि न सकहिं मोहि हरिके बल,प्रगट कपट-आगार ॥ 1 ॥

देखत ही कमनीय, कछू नाहिंन पुनि किये बिचार।

ज्यों कदलीतरु-मध्य निहारत, कबहुँ न निकसत सार ॥ 2।

तेरे लिये जनम अनेक मैं फिरत न पायों पार।

महामोह-मृगजल-सरिता महँ बोर्यो हौं बारहिं बार ॥ 3 ॥

सुनु खल! छल बल कोटि किये बस होहिं न भगत उदार।

सहित सहाय तहाँ बसि अब ,जेहि हृदय न नंदकुमार ॥ 4 ॥

तासों करहु चातुरी जो नहिं जानै मरम तुम्हार।

सो परि डरै मरै रजु-अहि तें, बूझै नहिं ब्यवहार ॥ 5 ॥

निज हित सुनु सठ!हठ न करहि,जो चहहि कुसल परिवार।

तुलसिदास प्रभुके दासनि तजि भजहि जहाँ मद मार ॥ 6 ॥