श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 187

ताहि तें आयो सरन सबेरें।

ग्यान बिराग भगति साधन कछु सपनेहुँ नाथ! न मेरें ॥ 1 ॥

लोभ-मोह-मद-काम-क्रोध रिपु फिरत रैनि-दिन घेरें।

तिनहिं मिले मन भयो कुपथ-रत, फिरै तिहारेहि फेरें ॥ 2 ॥

दोष-निलय यह बिषय सोक-प्रद कहत संत श्रुति टेरें।

जानत हूँ अनुराग तहाँ अति सो, हरि तुम्हरेहि प्रेरें ? ॥ 3 ॥

बिष पियूष सम करहु अगिनि हिम, तारि सकहु बिनु बेरें।

तुम सम ईस कृपालु परम हित पुनि न पाइहौं हेरें ॥ 4 ॥

यह जिय जानि रहौं सब तजि रघुबीर भरोसे तेरें।

तुलसिदास यह बिपति बागुरौ तुम्हहिं सों बनै निबेरें ॥ 5 ॥