पद १९
गंगा-स्तुति · पद १९ / २७९
हरनि पाप त्रिबिध ताप सुमिरत सुरसरित।
बिलसति महि कल्प-बेलि मुद-मनोरथ-फरित ॥ १ ॥
सोहत ससि धवल धार सुधा-सलिल-भरित।
बिमलतर तरंग लसत रघुबरके -से चरित ॥ २ ॥
तो बिनु जगदंब गंग कलिजुग का करित ?
घोर भव अपारसिंधु तुलसी किमि तरित ॥ ३ ॥