श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 19

हरनि पाप त्रिबिध ताप सुमिरत सुरसरित।

बिलसति महि कल्प-बेलि मुद-मनोरथ-फरित ॥ 1 ॥

सोहत ससि धवल धार सुधा-सलिल-भरित।

बिमलतर तरंग लसत रघुबरके -से चरित ॥ 2 ॥

तो बिनु जगदंब गंग कलिजुग का करित ?

घोर भव अपारसिंधु तुलसी किमि तरित ॥ 3 ॥