पद १८
गंगा-स्तुति · पद १८ / २७९
जयति जय सुरसरी जगदखिल-पावनी।
विष्णु-पदकंज-मकरंद इव अम्बुवर वहसि,दुख दहसि,अघवृन्द-विद्राविनी ॥ १ ॥
मिलितजलपात्र-अजयुक्त-हरिचरणरज,विरज-वर-वारि त्रिपुरारि शिर-धामिनी।
जह्नु-कन्या धन्य,पुण्यकृत सगर-सुत,भूधरद्रोणि-विद्दरणि,बहुनामिनी ॥ २ ॥
यक्ष,गंधर्व,मुनि,किन्नरोरग,दनुज,मनुज मज्जहिं सुकृत-पुंज युत-कामिनी।
स्वर्ग-सोपान,विज्ञान-ज्ञानप्रदे,मोह-मद-मदन-पाथोज-हिमयामिनी ॥ ३ ॥
हरित गंभीर वानीर दुहुँ तीरवर,मध्य धारा विशद,विश्व अभिरामिनी।
नील-पर्यक-कृत-शयन सर्पेश जनु,सहस सीसावली स्त्रोत सुर-स्वामिनी ॥ ४ ॥
अमित-महिमा,अमितरूप,भूपावली-मुकुट-मनिवंद्य त्रेलोक पथगामिनी।
देहि रघुबीर-पद-प्रीति निर्भर मातु, दासतुलसी त्रासहरणि भवभामिनी ॥ ५ ॥