पद 190
श्रीराम-स्तुति · पद 190 / 279
सहज सनेही रामसों तैं कियो न सहज सनेह।
तातें भव-भाजन भयो,सुनु अजहुँ सिखावन एह ॥ 1 ॥
ज्यों मुख मुकुर बिलोकिये अरु चित न रहै अनुहारि।
त्यों सेवतहुँ न आपने, ये मातु-पिता, सुत-नारि ॥ 2 ॥
दै दै सुमन तिल बासिकै , अरु खरि परिहरि रस लेत।
स्वारथ हित भूतल भरे, मन मेचक, तन सेत ॥ 3 ॥
करि बीत्यो, अब करतु है करिबे हित मीत अपार।
कबहुँ न कोउ रघुबीर सो नेह निबाहनिहार ॥ 4 ॥
जासों सब नातों फुरै, तासों न करी पहिचानि।
तातें कछू समझ्यो नहीं, कहा लाभ कह हानि ॥ 5 ॥
साँचो जान्यो झूठको,झूठे कहँ साँचो जानि।
को न गयो, को जात है,को न जैहै करि हितहानि ॥ 6 ॥
बेद कह्यो, बुध कहत हैं , अरु हौहुँ कहत हौं टेरि।
तुलसी प्रभु साँचो हितू, तू हियकी आँखिन हेरि ॥ 7 ॥