पद १९१
श्रीराम-स्तुति · पद १९१ / २७९
एक सनेही साचिलो केवल कोसलपालु।
प्रेम-कनोड़ो रामसो नहिं दूसरो दयालु ॥ १ ॥
तन-साथी सब स्वारथी, सुर ब्यवहार-सुजान।
आरत-अधम-अनाथ हित को रघुबीर समान ॥ २ ॥
नाद निठूर, समचर सिखी, सलिल सनेह न सूर।
ससि सरोग, दिनकरुबड़े, पयद प्रेम-पथ कूर ॥ ३ ॥
जाको मन जासों बँध्यो, ताको सुखदायक सोइ।
सरल सील साहिब सदा सीतापति सरिस न कोइ ॥ ४ ॥
सुनि सेवा सही को करै, परिहरै को दूषन देखि।
केहि दिवान दिन दीन को आदर-अनुराग बिसेखि ॥ ५ ॥
खग-सबरी पितु-मातु ज्यों माने, कपि को किये मीत।
केवट भेंट्यों भरत ज्यो, ऐसो को कहु पतित-पुनीत ॥ ६ ॥
देह अभागहिं भागु को, को राखै सरन सभीत।
बेद-बिदित विरुदावली, कबि-कोबिद गावत गीत ॥ ७ ॥
कैसेउ पाँवर पातकी, जेहि लई नामकी ओट।
गाँठी बाँध्यो दाम तो, परख्यो न फेरि खर-खोट ॥ ८ ॥
मन मलीन, कलि किलबिषी होत सुनत जासु कृत-काज।
सो तुलसी कियो आपुनो रघुबीर गरीब-निवाज ॥ ९ ॥