श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 191

एक सनेही साचिलो केवल कोसलपालु।

प्रेम-कनोड़ो रामसो नहिं दूसरो दयालु ॥ 1 ॥

तन-साथी सब स्वारथी, सुर ब्यवहार-सुजान।

आरत-अधम-अनाथ हित को रघुबीर समान ॥ 2 ॥

नाद निठूर, समचर सिखी, सलिल सनेह न सूर।

ससि सरोग, दिनकरुबड़े, पयद प्रेम-पथ कूर ॥ 3 ॥

जाको मन जासों बँध्यो, ताको सुखदायक सोइ।

सरल सील साहिब सदा सीतापति सरिस न कोइ ॥ 4 ॥

सुनि सेवा सही को करै, परिहरै को दूषन देखि।

केहि दिवान दिन दीन को आदर-अनुराग बिसेखि ॥ 5 ॥

खग-सबरी पितु-मातु ज्यों माने, कपि को किये मीत।

केवट भेंट्यों भरत ज्यो, ऐसो को कहु पतित-पुनीत ॥ 6 ॥

देह अभागहिं भागु को, को राखै सरन सभीत।

बेद-बिदित विरुदावली, कबि-कोबिद गावत गीत ॥ 7 ॥

कैसेउ पाँवर पातकी, जेहि लई नामकी ओट।

गाँठी बाँध्यो दाम तो, परख्यो न फेरि खर-खोट ॥ 8 ॥

मन मलीन, कलि किलबिषी होत सुनत जासु कृत-काज।

सो तुलसी कियो आपुनो रघुबीर गरीब-निवाज ॥ 9 ॥