श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद २०३

श्रीराम-स्तुति · पद २०३ / २७९

श्रीहरि-गुरु-पद-कमल भजहु मन तजि अभिमान।

जेहि सेवत पाइय हरि सुख-निधान भगवान ॥ १ ॥

परिवा प्रथम प्रेम बिनु राम-मिलन अति दूरि।

जद्यपि निकट हृदय निज रहे सकल भरिपूरि ॥ २ ॥

दुइज द्वेत-मति छाड़ि चरहि महि-मंडल धीर।

बिगत मोह-माया-मद हृदय बसत रघुबीर ॥ ३ ॥

तीज त्रिगुन-पर परम पुरुष श्रीरमन मुकुंद।

गुन सुभाव त्यागे बिनु दुरलभ परमानंद ॥ ४ ॥

चौथि चारि परिहरहु बुद्धि-मन-चित-अहंकार।

बिमल बिचार परमपद निज सुख सहज उदार ॥ ५ ॥

पाँचइ पाँच परस,रस,सब्द,गंध अरु रूप।

इन्ह कर कहा न कीजिये, बहुरि परब भव-कूप ॥ ६ ॥

छठ षटबरग करिय जय जनकसुता-पति लागि।

रघुपति-कृपा-बारि बिनु नहीं बुताइ लोभागि ॥ ७ ॥

सातैं सप्तधातु-निरमित तनु करिय बिचार।

तेहि तनु केर एक फल, कीजै पर-उपकार ॥ ८ ॥

आठइँ आठ प्रकृति-पर निरबिकार श्रीराम।

केहि प्रकार पाइय हरि, हृदय बसहिं बहु काम ॥ ९ ॥

नवमी नवद्वार-पुर बसि जेहि न आपु भल कीन्ह।

ते नर जोनि अनेक भ्रमत दारून दुख लीन्ह ॥ १० ॥

दसइँ दसहु कर संजम जो न करिय जिय जानि।

साधन बृथा होइ सब मिलहिं न सारंगपानि।११ ॥

एकादसी एक मन बस कै सेवहु जाइ।

सोइ ब्रत कर फल पावै आवागमन नसाइ ॥ १२ ॥

द्वादसि दान देहु अस, अभय होइ त्रेलोक।

परहित-निरत सो पारन बहुरि न ब्यापत सोक ॥ १३ ॥

तेरसि तीन अवस्था तजहु, भजहु भगवंत।

मन-क्रम-बचन-अगोचर, ब्यापक, ब्याप्य, अनंत ॥ १४ ॥

चौदसि चौदह भुवन अचर-चर-रूप गोपाल।

भेद गये बिनु रघुपति अति न हरहिं जग-जाल ॥ १५ ॥

पूनों प्रेम-भगति-रस हरि-रस जानहिं दास।

सम, सीतल, गत-मान, ग्यानरत, बिषय-उदास ॥ १६ ॥

त्रिबिध सूल होलिय जरे, खेलिय अब फागु।

जो जिय चहसि परमसुख, तौ यहि मारग लागु ॥ १७ ॥

श्रुति-पुरान-बुध-संमत चाँचरि चरित मुरारि।

करि बिचार भव तरिय, परिय न कबहुँ जमधारि ॥ १८ ॥

संसय-समन, दमन दुख, सुखनिधान हरि एक।

साधु-कृपा बिनु मिलहिं न, करिय उपाय अनेक ॥ १९ ॥

भव सागर कहँ नाव सुद्ध संतनके चरन।

तुलसिदास प्रयास बिनु मिलहिं राम दुखहरन ॥ २० ॥