पद २०२
श्रीराम-स्तुति · पद २०२ / २७९
काजु कहा नरतनु धरि सार्यो।
पर-उपकार सार श्रुतिको जो, सो धोखेहु न बिचार्यो ॥ १ ॥
द्वैत मूल, भय-सूल, सोक-फल, भवतरु टरै न टार्यौ।
रामभजन-तीछन कुठार लै सो नहिं काटि निवार्यो ॥ २ ॥
संसय-सिंधु नाम बोहित भजि निज आतमा न तार्यो।
जनम अनेक विवेकहीन बहु जोनि भ्रमत नहिं हार्यो ॥ ३ ॥
देखि आनकि सहज संपदा द्वेष-अनल मन-जार्यो।
सम,दम,दया,दीन-पालन, सीतल हिय हरि न सँभार्यो ॥ ४ ॥
प्रभु गुरु पिता सखा रघुपति तैं मन क्रम बचन बिसार्यो।
तुलसिदास यहि आस, सरन राखिहि जेहि गीध उधार्यो ॥ ५ ॥