श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 215

श्रीरघुबीरकी यह बानि।

नीचहू सों करत नेह सुप्रीति मन अनुमानि ॥ 1 ॥

परम अधम निषाद पाँवर, कौन ताकी कानि ?

लियो सो उर लाइ सुत ज्यौं प्रेमको पहिचानि ॥ 2 ॥

गीध कौन दयालु, जो बिधि रच्यो हिंसा सानि ?

जनक ज्यों रघुनाथ ताकहँ दियो जल निज पानि ॥ 3 ॥

प्रकृति-मलिन कुजाति सबरी सकल अवगुन-खानि।

खात ताके दिये फल अति रुचि बखानि बखानि ॥ 4 ॥

रजनिचर अरु रिपु बिभीषन सरन आयो जानि।

भरत ज्यों उठि ताहि भैंटत देह-दसा भुलानि ॥ 5 ॥

कौन सुभग सुसील बानर, जिनहिं सुमिरत हानि।

किये ते सब सखा, पूजे भवन अपने आनि ॥ 6 ॥

राम सहज कृपालु कोमल दीनहित दिनदानि।

भजहि ऐसे प्षभुहि तुलसी कुटिल कपट न ठानि ॥ 7 ॥