श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद २१५

श्रीराम-स्तुति · पद २१५ / २७९

श्रीरघुबीरकी यह बानि।

नीचहू सों करत नेह सुप्रीति मन अनुमानि ॥ १ ॥

परम अधम निषाद पाँवर, कौन ताकी कानि ?

लियो सो उर लाइ सुत ज्यौं प्रेमको पहिचानि ॥ २ ॥

गीध कौन दयालु, जो बिधि रच्यो हिंसा सानि ?

जनक ज्यों रघुनाथ ताकहँ दियो जल निज पानि ॥ ३ ॥

प्रकृति-मलिन कुजाति सबरी सकल अवगुन-खानि।

खात ताके दिये फल अति रुचि बखानि बखानि ॥ ४ ॥

रजनिचर अरु रिपु बिभीषन सरन आयो जानि।

भरत ज्यों उठि ताहि भैंटत देह-दसा भुलानि ॥ ५ ॥

कौन सुभग सुसील बानर, जिनहिं सुमिरत हानि।

किये ते सब सखा, पूजे भवन अपने आनि ॥ ६ ॥

राम सहज कृपालु कोमल दीनहित दिनदानि।

भजहि ऐसे प्षभुहि तुलसी कुटिल कपट न ठानि ॥ ७ ॥