श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 214

श्रीराम-स्तुति · राग कल्यान · पद 214 / 279

ऐसी कौन प्रभुकी रीति ?

बिरद हेतु पुनीत परिहरि पाँवरनि पर प्रीति ॥ 1 ॥

गई मारन पूतना कुच कालकूट लगाई।

मातुकी गति दई ताहि कृपालु जादवराइ ॥ 2 ॥

काममोहित गोपिकनिपर कृपा अतुलित कीन्ह।

जगत-पिता बिरंचि जिन्हके चरनकी रज लीन्ह ॥ 3 ॥

नेमतें सिसुपाल दिन प्रति देत गनि गनि गारि।

कियो लीन सु आपमें हरि राज-सभा मँझारि ॥ 4 ॥

ब्याध चित दै चरन मार्यो मूढ़मति मृग जानि।

सो सदेह स्वलोक पठयो प्रगट करि निज बानि ॥ 5 ॥

कौन तिन्हकी कहै जिन्हके सुकृत अरु अघ दोउ।

प्रगट पातकरूप तुलसी सरन राख्यो सोउ ॥ 6 ॥