श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 217

जो पै दूसरो कोउ होइ।

तौ हौं बारहि बार प्रभु कत दुख सुनावौं रोइ ॥ 1 ॥

काहि ममता दीनपर, काको पतितपावन नाम।

पापमूल अजामिलहि केहि दियो अपनो धाम ॥ 2 ॥

रहे संभु बिरंचि सुरपति लोकपाल अनेक।

सोक-सरि बूड़त करीसहि दई काहु न टेक ॥ 3 ॥

बिपुल-भूपति-सदहि महँ नर-नारि कह्यो ’प्रभु पाहि’।

सकल समरथ रहे, काहु न बसन दीन्हों ताहि ॥ 4 ॥

एक मुख क्यों कहौं करुनासिंधुके गुन-गाथ ?

भक्तहित धरि देह काह न कियो कोसलनाथ! ॥ 5 ॥

आपसे कहुँ सौंपिये मोहि जो पै अतिहि घिनात।

दासतुलसी और बिधि क्यों चरन परिहरि जात ॥ 6 ॥