श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद २१७

श्रीराम-स्तुति · पद २१७ / २७९

जो पै दूसरो कोउ होइ।

तौ हौं बारहि बार प्रभु कत दुख सुनावौं रोइ ॥ १ ॥

काहि ममता दीनपर, काको पतितपावन नाम।

पापमूल अजामिलहि केहि दियो अपनो धाम ॥ २ ॥

रहे संभु बिरंचि सुरपति लोकपाल अनेक।

सोक-सरि बूड़त करीसहि दई काहु न टेक ॥ ३ ॥

बिपुल-भूपति-सदहि महँ नर-नारि कह्यो ’प्रभु पाहि’।

सकल समरथ रहे, काहु न बसन दीन्हों ताहि ॥ ४ ॥

एक मुख क्यों कहौं करुनासिंधुके गुन-गाथ ?

भक्तहित धरि देह काह न कियो कोसलनाथ! ॥ ५ ॥

आपसे कहुँ सौंपिये मोहि जो पै अतिहि घिनात।

दासतुलसी और बिधि क्यों चरन परिहरि जात ॥ ६ ॥