श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद २१८

श्रीराम-स्तुति · पद २१८ / २७९

कबहि देखाइहौ हरि चरन।

समन सकल कलेस कलि-मल ,सकल मंगल- करन ॥ १ ॥

सरद-भव सुंदर तरुनतर अरुन-बारिज-बरन।

लच्छि-लालित-ललित करतल छबि अनूपम धरन ॥ २ ॥

गंग-जनक अनंग-अरि-प्रिय कपट-बटु बलि-छरन।

बिप्रतिय नृग बधिकके दुख-दोस दारुन दरन ॥ ३।

सिद्ध-सुर-मुनि-बृंद-बंदित सुखद सब कहँ सरन।

सकृत उर आनत जिनहिं जन होत तारन-तरन ॥ ४ ॥

कृपासिंधु सुजान रघुबर प्रनत-आरति-हरन।

दरस-आस-पियास तुलसीदास चाहत मरन ॥ ५ ॥