पद 279
श्रीराम-स्तुति · पद 279 / 279
मारुति-मन,रुचि भरतकी लखि लषन कही है।
कलिकालहु नाथ!नाम सों परतीति-प्रीति एक किंकरकी निबही है ॥ 1 ॥
सकल सभा सुनि लै उठी, जानी रीति रही है।
कृपा गरीब निवाजकी,देखत गरीबको साहब बाँह गही है ॥ 2 ॥
बिहँसि राम कह्यो ’सत्यहै,सुधि मैं हूँ लही है’।
रघुनाथ
मुदित माथ नावत, बनी तुलसी अनाथकी,परी———सही है ॥ 3 ॥
रघुनाथ हाथ
॥ श्रीसीतारामार्पणमस्तु ॥
॥ इतिश्री ॥