श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद २७८

श्रीराम-स्तुति · पद २७८ / २७९

पवन-सुवन! रिपु-दवन! भरतलाल! लखन! दीनकी।

निज निज अवसर सुधि किये,बलि जाउँ, दास-आस पूजि है खासखीनकी ॥ १ ॥

राज-द्वार भली सब कहैं साधु-समीचीनकी।

सुकृत-सुजस,साहिब-कृपा,स्वारथ-परमारथ,गति भये गति-बिहीनकी ॥ २ ॥

समय सँभारि सुधारिबी तुलसी मलीनकी।

प्रीति-रीति समुझाइबी नतपाल कृपालुहि परमिति पराधीनकी।३ ॥