पद ५३
देव–
सकल सौभाग्यप्रद सर्वतोभद्र-निधि, सर्व,सर्वेश,सर्वाभिरामं।
शर्व-ह्रदि-कंज-मकरंद-मधुकर रुचिर-रूप, भूपालमणि नौमि रामं ॥ १ ॥
सर्वसुख-धाम गुणग्राम, विश्रामपद, नाम सर्वसंपदमति पुनीतं।
निर्मलं शांत,सुविशुद्ध,बोधायतन, क्रोध-मद-हरण,करुणा-निकेतं ॥ २ ॥
अजित,निरुपाधि,गोतीतमव्यक्त, विभुमेकमनवद्यमजमद्वितीयं।
प्राकृतं,प्रकट परमातमा,परमहित, प्रेरकानंत वंदे तुरीयं ॥ ३ ॥
भूधरं सुन्दरं,श्रीवरं,मदन-मद-मथन सौन्दर्य-सीमातिरम्यं।
दुष्प्राप्य,दुष्पेक्ष्य,दुस्तर्क्य,दुष्पार, संसारहर,सुलभ,मृदुभाव-गम्यं ॥
सत्यकृत,सत्यरत,सत्यव्रत,सर्वदा, पुष्ट,संतुष्ट,संकष्टहारी।
धर्मवर्मनि ब्रह्मकर्मबोधैक,विप्रपूज्य, ब्रह्मण्यजनप्रिय,मुरारी ॥ ५ ॥
नित्य,निर्मम,नित्यमुक्त,निर्मान, हरि,ज्ञानघन,सच्चिदानंद मूलं।
सर्वरक्षक सर्वभक्षकाध्यक्ष,कूटस्थ, गूढार्चि, भक्तानुकूलं ॥ ६ ॥
सिद्ध-साधक-साध्य,वाच्य-वाचकरूप, मंत्र-जापक-जाप्य,सृष्टि-स्त्रष्टा।
परम कारण,कञ्ञनाभ,जलदाभतनु, सगुण,निर्गुण,सकल दृश्य-द्रष्टा ॥ ७ ॥
व्योम-व्यापक,विरज,ब्रह्म,वरदेश, वैकुंठ, वामन विमल ब्रह्मचारी।
सिद्ध-वृंदारकावृंदवंदित सदा, खंडि पाखंड-निर्मूलकारी ॥ ८ ॥
पूरनानंदसंदोह, अपहरन संमोह-अज्ञान, गुण-सन्निपातं।
बचन-मन-कर्म-गत शरण तुलसीदास त्रास-पाथोधि इव कुंभजातं ॥ ९ ॥