श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद ५४

श्रीराम-स्तुति · पद ५४ / २७९

देव–

विश्व-विख्यात,विश्वेश,विश्वायतन, विश्वमरजाद,व्यालारिगामी।

ब्रह्म,वरदेश,वागीश,व्यापक,विमल विपुल,बलवान,निर्वानस्वामी ॥ १ ॥

प्रकृति,महतत्व,शब्दादि गुण,देवता व्योम,मरुदग्नि,अमलांबु,उर्वी।

बुद्धि,मन,इंद्रिय,प्राण,चित्तातमा, काल,परमाणु,चिच्छक्ति गुर्वी ॥ २ ॥

सर्वमेवात्र त्वद्रूप भूपालमणि! व्यक्तमव्यक्त, गतभेद,विष्णो।

भुवन भवदंग,कामारि-वंदित, पदद्वंद्व मंदाकिनी-जनक, जिष्णो ॥ ३ ॥

आदिमध्यांत,भगवंत! त्वं सर्वगतमीश, पश्यन्ति ये ब्रह्मवादी।

यथा पट-तंतु,घट-मृतिका, सर्प-स्त्रग,दारुकरि,कनक-कटकांगदादी ॥ ४ ॥

गूढ़,गंभीर,गर्वघ्न,गूढार्थवित,गुप्त,गोतीत,गुरु,ग्यान-ग्याता।

ग्येय,ग्यानप्रिय,प्रचुर गरिमागार, घोर-संसार-पर, पार दाता ॥ ५ ॥

सत्यसंकल्प,अतिकल्प,कल्पांतकृत,कल्पनातीत,अहि-तल्पवासी।

वनज-लोचन,वनज-नाभ, वनदाभ-वपु, वनचरध्वज-कोटि-लावण्यरासी ॥ ६ ॥

सुकर,दुःकर,दुराराध्य,दुर्व्यसनहर,दुर्ग,दुर्द्धर्ष,दुर्गार्त्तिहर्त्ता।

वेदगर्भार्भकादर्भ-गुनगर्व, अर्वांगपर-गर्व-निर्वाप-कर्त्ता ॥ ७ ॥

भक्त-अनुकूल,भवशूल-निर्मूलकर, तूल-अघ-नाम पावक-समानं।

तरलतृष्णा-तमी-तरणि,धरणीधरण, शरण-भयहरण,करुणानिधानं ॥ ८ ॥

बहुल वृंदारकावृंद-वंदारु-पद-द्वंद्व मंदार-मालोर-धारी।

पाहि मामीश संताप-संकुल सदा दास तुलसी प्रणत रावणारी ॥ ९ ॥