पद ५५
देव–
संत-संतापहर,विश्व-विश्रामकर, रामकामारि,अभिरामकारी।
शुद्ध बोधायतन,सच्चिदानंदघन, सज्जनानंद-वर्धन,खरारी ॥ १ ॥
शील-समता-भवन,विषमता-मति-शमन,राम,रमारमन,रावनारी।
खड्ग,कर चर्मवर,वर्मधर,रुचिरल कटि तूण,शर-शक्ति-सारंगधारी ॥ २ ॥
सत्यसंधान,निर्वानप्रद,सर्वहित, सर्वगुण-ज्ञान-विज्ञानशाली।
सघन-तम-घोर-संसार-भर-शर्वरी नाम दिवसेष खर-किरणमाली ॥ ३ ॥
तपन तीच्छन तरुन तीव्र तापघ्न, तपरूप,तनभूप,तमपर,तपस्वी।
मान-मद-मदन-मत्सर-मनोरथ-मथन, मोह-अंभोधि-मंदर,मनस्वी ॥ ४ ॥
वेद विख्यात,वरदेश,वामन,विरज,विमल,वागीश,वैकुंठस्वामी।
काम-क्रोधादिमर्दन,विवर्धन,छमा-शांति-विग्रह,विहगराज-गामी ॥ ५ ॥
परम पावन,पाप-पुंज-मुंजावटी-अनल इव निमिष निर्मूलकर्त्ता।
भुवन-भूषण,दूषणारि-भुवनेश,भूनाथ,श्रुतिमाथ जय भुवनभर्ता ॥ ६ ॥
अमल,अविचल,अकल,सकल,संतप्त-कलि-विकलता-भंजनानंदरासी।
उरगनायक-शयन,तरुणपंकज-नयन,छीरसागर-अयन,सर्ववासी ॥ ७ ॥
सिद्ध-कवि-कोविकानंद-दायक पदद्वंद्व मंदात्ममनुजैर्दुरापं।
यत्र संभूत अतिपूत जल सुरसरी दर्शनादेव अपहरति पापं ॥ ८ ॥
नित्य निर्मुक्त,संयुक्तगुण,निर्गुणानंद,भगवंत,न्यामक,नियंता।
विश्व-पोषण-भरण,विश्व-कारण-करण, शरण तुलसीदास त्रास-हंता ॥ ९ ॥