पद 62
इहै परम फलु,परम बड़ाई।
नखसिख रुचिर बिंदुमाधव छबि निरखहिं नयन अघाई ॥ 1 ॥
बिसद किसोर पीन सुंदर बपु,श्याम सुरुचि अधिकाई।
नीलकंज,बारिद,तमाल,मनि,इन्ह तनुते दुति पाई ॥ 2 ॥
मृदुल चरन शुभ चिन्ह,पदज,नख अति अभूत उपमाई।
अरुन नील पाथोज प्रसव जनु, मनिजुत दल-समुदाई ॥ 3 ॥
जातरूप मनि-जटित-मनोहर, नूपुर जन-सुखदाई।
जनु हर-उर हरि बिबिध रूप धरि, रहे बर भवन बनाई ॥ 4 ॥
कटितट रटति चारु किंकिनि-रव,अनुपम,बरनि न जाई।
हेम जलज कल कलित मध्य जनु,मधुकर मुखर सुहाई ॥ 5 ॥
उर बिसाल भृगुचरन चारु अति,सूचत कोमलताई।
कंकन चारु बिबिध भूषन बिधि,रचि निज कर मन लाई ॥ 6 ॥
गज-मनिमाल बीच भ्राजत कहि जाति न पदक निकाई।
जनु उडुगन-मंडल बारिदपर,नवग्रह रची अथाई ॥ 7 ॥
भुजगभोग-भुजदंड कंज दर चक्र गदा बनि आई।
सोभासीव ग्रीव,चिबुकाधर,बदन अमित छबि छाई ॥ 8 ॥
कुलिस,कुंद-कुडमल,दामिनि-दुति,दसनन देखि लजाई।
नासा-नयन-कपोल,ललित श्रुति कुंडल भ्रू मोहि भाई ॥ 9 ॥
कुंचित कच सिर मुकुट,भाल पर,तिलक कहौं समुझाई।
अलप तड़ित जुग रेख इंदु महँ,रहि तजि चंचलताई ॥ 10 ॥
निरमल पीत दुकुल अनूपम,उपमा हिय न समाई।
बहु मनिजुत गिरि नील सिखरपर कनक-बसन रुचिराई ॥ 11 ॥
दच्छ भाग अनुराग-सहित इंदिरा अधिक ललिताई।
हेमलता जनु तरु तमाल ढिग,नील निचोल ओढ़ाई ॥ 12 ॥
सत सारदा सेष श्रुति मिलिकै ,सोभा कहि न सिराई।
तुलसिदास मतिमंद द्वंदरत कहै कौन बिधि गाई ॥ 13 ॥