श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद ६२

श्रीराम-स्तुति · पद ६२ / २७९

इहै परम फलु,परम बड़ाई।

नखसिख रुचिर बिंदुमाधव छबि निरखहिं नयन अघाई ॥ १ ॥

बिसद किसोर पीन सुंदर बपु,श्याम सुरुचि अधिकाई।

नीलकंज,बारिद,तमाल,मनि,इन्ह तनुते दुति पाई ॥ २ ॥

मृदुल चरन शुभ चिन्ह,पदज,नख अति अभूत उपमाई।

अरुन नील पाथोज प्रसव जनु, मनिजुत दल-समुदाई ॥ ३ ॥

जातरूप मनि-जटित-मनोहर, नूपुर जन-सुखदाई।

जनु हर-उर हरि बिबिध रूप धरि, रहे बर भवन बनाई ॥ ४ ॥

कटितट रटति चारु किंकिनि-रव,अनुपम,बरनि न जाई।

हेम जलज कल कलित मध्य जनु,मधुकर मुखर सुहाई ॥ ५ ॥

उर बिसाल भृगुचरन चारु अति,सूचत कोमलताई।

कंकन चारु बिबिध भूषन बिधि,रचि निज कर मन लाई ॥ ६ ॥

गज-मनिमाल बीच भ्राजत कहि जाति न पदक निकाई।

जनु उडुगन-मंडल बारिदपर,नवग्रह रची अथाई ॥ ७ ॥

भुजगभोग-भुजदंड कंज दर चक्र गदा बनि आई।

सोभासीव ग्रीव,चिबुकाधर,बदन अमित छबि छाई ॥ ८ ॥

कुलिस,कुंद-कुडमल,दामिनि-दुति,दसनन देखि लजाई।

नासा-नयन-कपोल,ललित श्रुति कुंडल भ्रू मोहि भाई ॥ ९ ॥

कुंचित कच सिर मुकुट,भाल पर,तिलक कहौं समुझाई।

अलप तड़ित जुग रेख इंदु महँ,रहि तजि चंचलताई ॥ १० ॥

निरमल पीत दुकुल अनूपम,उपमा हिय न समाई।

बहु मनिजुत गिरि नील सिखरपर कनक-बसन रुचिराई ॥ ११ ॥

दच्छ भाग अनुराग-सहित इंदिरा अधिक ललिताई।

हेमलता जनु तरु तमाल ढिग,नील निचोल ओढ़ाई ॥ १२ ॥

सत सारदा सेष श्रुति मिलिकै ,सोभा कहि न सिराई।

तुलसिदास मतिमंद द्वंदरत कहै कौन बिधि गाई ॥ १३ ॥