श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 63

श्रीराम-स्तुति · राग जैतश्री · पद 63 / 279

मन इतनोई या तनुको परम फलु।

सब अँग सुभग बिंदुमाधव-छबि,तजि सुभाव,अवलोकु एक पलु ॥ 1 ॥

तरुन अरुन अंभोज चरन मृदु,नख-दुति ह्रदय-तिमिर-हारी।

कुलिस-केतु-जव-जलज रेख बर,अंकुस मन-गज-बसकारी ॥ 2 ॥

कनक-जटित मनि नूपुर,मेखल,कटि-तट रटति मधुर बानी।

त्रिबली उदर,गँभीर नाभि सर,जहँ उपजे बिरंचि ग्यानी ॥ 3 ॥

उर बनमाल,पदिक अति सोभित,बिप्र-चरन चित कहँ करषै।

स्याम तामरस-दाम-बरन बपु पीत बसन सोभा बरषै ॥ 4 ॥

कर कंकन केयूर मनोहर,देति मोद मुद्रिक न्यारी।

गदा कंज दर चारु चक्रधर,नाग-सुंड-सम भुज चारी ॥ 5 ॥

कंबुग्रीव,छबिसीव चिबुक द्विज,अधर अरुन,उन्नत नासा।

नव राजीव नयन,ससि आनन,सेवक-सुखद बिसद हासा ॥ 6 ॥

रुचिर कपोल,श्रवन कुंडल,सिर मुकुट,सुतिलक भाल भ्राजै।

ललित भृकुटि,सुंदर चितवनि,कच निरखि मधुप-अवली लाजे ॥ 7 ॥

रूप-सील-गुन-खानि दच्छ दिसि,सिंधु-सुता रत-पद-सेवा।

जाकी कृपा-कटाच्छ चहत सिव,बिधि,मुनि,मनुज,दनुज,देवा ॥ 8 ॥

तुलसिदास भव-त्रास मिटै तब,जब मति येहि सरूप अटकै।

नाहिंत दीन मलीन हीनसुख,कोटि जनम भ्रमि भ्रमि भटकै ॥ 9 ॥