श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 95

तरु न मेरे अघ-अवगुन गनिहैं ।

जौ जमराज काज सब परिहरि, इहै ख्याल उर अनिहैं ॥ 1 ॥

चलिहैं छूटि पुंज पापिनके , असमंजस जिय जनिहैं ।

देखि खलल अधिकार प्रभूसों (मेरी) भूरि भलाई भनिहैं ॥ 2 ॥

हँसि करिहैं परतीति भगतकी भगत-सिरोमनि मनिहैं ।

ज्यों त्यों तुलसिदास कोसलपति अपनायेहि पर बनिहैं ॥ 3 ॥