श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद ९४

श्रीराम-स्तुति · पद ९४ / २७९

काहे ते हरि मोहिं बिसारो।

जानत निज महिमा मेरे अघ,तदपि न नाथ सँभारो ॥ १ ॥

पतित-पुनीत,दीनहित,असरन-सरन कहत श्रुति चारो।

हौं नहिं अधम,सभीत,दीन ? किधौं बेदन मृषा पुकारो ? ॥ २ ॥

खग-गनिका-गज-ब्याध-पाँति जहँ तहँ हौहूँ बैठारो।

अब केहि लाज कृपानिधान ! परसत पनवारो फारो ॥ ३ ॥

जो कलिकाल प्रबल अति होतो, तुव निदेसतें न्यारो।

तौ हरि रोष भरोस दोष गुन तेहि भजते तजि गारो ॥ ४ ॥

मसक बिरंचि,बिरंचि मसक सम, करहु प्रभाउ तुम्हारो।

यह सामरथ अछत मोहिं त्यागहु, नाथ तहाँ कछु चारो ॥ ५ ॥

नाहिन नरक परत मोकहँ डर,जद्यपि हौं अति हारो।

यह बडि त्रास दासतुलसी प्रभु,नामहु पाप न जारो ॥ ६ ॥