श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 97

जौ पै हरि जनके औगुन गहते ।

तौ सुरपति कुरुराज बालिसों, कत हठि बैर बिसहते ॥ 1 ॥

जौ जप जाग जोग ब्रत बरजित, केवल प्रेम न चहते ।

तौ कत सुर मुनिबर बिहाय ब्रज, गोप-गेह बसि रहते ॥ 2 ॥

जौ जहँ-तहँ प्रन राखि भगतको, भजन-प्रभाउ न कहते ।

तौ कलि कठिन करम-मारग जड़ हम केहि भाँति निबहते ॥ 3 ॥

जौ सुतहित लिये नाम अजामिलके अघ अमित न दहते ।

तौ जमभट साँसति-हर हमसे बृषभ खोजि खोजि नहते ॥ 4 ॥

जौ जगबिदित पतितपावन, अति बाँकुर बिरद न बहते ।

तौ बहुकलप कुटिल तुलसीसे, सपनेहुँ सुगति न लहते ॥ 5 ॥