श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 98

ऐसी हरि करत दासपर प्रीति ।

निज प्रभुता बिसारि जनके बस, होत सदा यह रीति ॥ 1 ॥

जिन बाँधे सुर-असुर, नाग-नर, प्रबल करमकी डोरी ।

सोइ अबिछिन्न ब्रह्म जसुमति हठि बाँध्यो सकत न छोरी ॥ 2 ॥

जाकी मायाबस बिरंचि सिव, नाचत पार न पायो ।

करतल ताल बजाय ग्वाल-जुवतिन्ह सोइ नाच नचायो ॥ 3 ॥

बिस्वंभर, श्रीपति, त्रिभुवनपति,बेद-बिदित यह लीख ।

बलिसों कछु न चली प्रभुता बरु है द्विज माँगी भीख ॥ 4 ॥

जाको नाम लिये छूटत भव-जनम-मरन दुख-भार ।

अंबरीष-हित लागि कृपानिधि सोइ जनमे दस बार ॥ 5 ॥

जोग-बिराग, ध्यान-जप-तप करि, जेहि खोजत मुनि ग्यानी ।

बानर-भालु चपल पसु पामर, नाथ तहाँ रति मानी ॥ 6 ॥

लोकपाल,जम,काल,पवन,रबि,ससि सब आग्याकारी ।

तुलसिदास प्रभु उग्रसेनके द्वार बेंत कर धारी ॥ 7 ॥