श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
भजन · गीतावली

चुपरि उबटि अनाहवाइकै नयन आँजे

चुपरि उबटि अनाहवाइकै नयन आँजे

राग केदारा

चुपरि उबटि अनाहवाइकै नयन आँजे,

चिर रुचि तिलक गोरोचनको कियो है |

भ्रूपर अनूप मसिबिन्दु, बारे बारे बार

बिलसत सीसपर, हेरि हरै हियो है ||

मोदभरी गोद लिये लालति सुमित्रा देखि

देव कहैं, सबको सुकृत उपवियो है |

मातु, पितु, प्रिय, परिजन, पुरजन धन्य,

पुन्यपुञ्ज पेखि पेखि प्रेमरस पियो है ||

लोहित ललित लघु चरन-कमल चारु,

चाल चाहि सो छबि सुकबि जिय जियो है |

बालकेलि बातबस झलकि झलमलत

सोभाकी दीयटि मानो रुप-दीप दियो है ||

राम-सिसु सानुज चरित चारु गाइ-सुनि

सुजन सादर जनम-लाहु लियो है |

तुलसी बिहाइ दसरथ दसचारिपुर

ऐसे सुख जोग बिधि बिरच्यो न बियो है ||

राम-सिसु गोद महामोद भरे दसरथ,

कौसिलाहु ललकि लषनलाल लये हैं |

भरत सुमित्रा लये, कैकयी सत्रुसमन,

तन प्रेम-पुलक मगन मन भये हैं ||

मेढ़ी लटकन मनि-कनक-रचित, बाल-

भूषन बनाइ आछे अंग अंग ठये हैं |

चाहि चुचुकारि चूमि लालत लावत उर

तैसे फल पावत जैसे सुबीज बये हैं ||

घन-ओट बिबुध बिलोकि बरषत फूल

अनुकूल बचन कहत नेह नये हैं |

ऐसे पितु, मातु, पूत, त्रिय, परिजन बिधि

जानियत आयु भरि येई निरमये हैं ||

"अजर अमर होहु, "करौ हरिहर छोहु

जरठ जठेरिन्ह आसिरबाद दये हैं |

तुलसी सराहैं भाग तिन्हके, जिन्हके हिये

डिम्भ-राम-रुप-अनुराग रङ्ग रये हैं ||

स्रोत: गीतावली · गोस्वामी तुलसीदास · सार्वजनिक सम्पदा  ·  सम्पूर्ण गीतावली में पढ़ें →