श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
भजन · गीतावली

आजु अनरसे हैं भोरके, पय पियत न नीके

आजु अनरसे हैं भोरके, पय पियत न नीके

राग आसावरी

"आजु अनरसे हैं भोरके, पय पियत न नीके |

रहत न बैठे, ठाढ़े, पालने झुलावत हू, रोवत राम मेरो

सो सोच सबहीके ||

देव, पितर, ग्रह पूजिये तुला तौलिये घीके |

तदपि कबहुँ कबहुँक सखी ऐसेहि अरत जब

परत दृष्टि दुष्ट तीके ||

बेगि बोलि कुलगुर, छुऔ माथे हाथ अमीके |

सुनत आइ ऋषि कुस हरे नरसिंह मन्त्र पढ़े, जो

सुमिरत भय भीके ||

जासु नाम सरबस सदासिव-पारबतीके |

ताहि झरावति कौसिला, यह रीति प्रीतिकी हिय

हुलसति तुलसीके ||

माथे हाथ ऋषि जब दियो राम किलकन लागे |

महिमा समुझि, लीला बिलोकि गुरु सजल नयन, तनु पुलक,

रोम रोम जागे ||

लिये गोद, धाए गोदतें, मोद मुनि मन अनुरागे |

निरखि मातु हरषी हिये आली-ओट कहति मृदु बचन

प्रेमके-से पागे ||

तुम्ह सुरतरु रघुबंसके, देत अभिमत माँगे |

मेरे बिसेषि गति रावरी, तुलसी प्रसाद जाके सकल

अमङ्गल भागे ||

अमिय-बिलोकनि करि कृपा मुनिबर जब जोए |

तबतें राम अरु भरत, लषन, रिपुदवन, सुमुख सखि, सकल

सुवन सुख सोए ||

सुमित्रा लाय हिये फनि मनि ज्यों गोए |

तुलसी नेवछावरि करति मातु अतिप्रेम-मगन-मन,

सजल सुलोचन कोये ||

मातु सकल, कुल-गुर-बधू, प्रिय सखी सुहाई |

सादर सब मङ्गल किए महि-मनि-महेस पर

सबनि सुधेनु दुहाई ||

बोलि भूपभूसुर लिये अति बिनय बड़ाई |

पूजि पायँ, सनमानि, दान दिये, लहि असीस, सुनि

बरषैं सुमन सुरसाईँ ||

घर-घर पुर बाजन लगीं आनन्द-बधाई |

सुख-सनेह तेहि समयको तुलसी जानै जाको चोर्यो

है चित चहुँ भाई ||

स्रोत: गीतावली · गोस्वामी तुलसीदास · सार्वजनिक सम्पदा  ·  सम्पूर्ण गीतावली में पढ़ें →