श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
दोहावली · गोस्वामी तुलसीदास

भाग 10

दोहावली · भाग 10
दोहा ४५१

कै जूझिबो कै बूझिबो दान कि काय कलेस।

चारि चारू परलोक पथ जथा जोग उपदेस।

दोहा ४५२

पात पात को सींचिबो न करू सरग तरू हेत।

कुटिल कटुक फर फरैगो तुलसी करत अचेत।

दोहा ४५३

गठिबँध ते परतीति बड़ि जेहिं सबको सब काज।

कहब थोर समुझब बहुत गाड़े बढ़त अनाज।

दोहा ४५४

अपनो एपन निज हथा तिय पूजहिं निजज भीति।

फरइ सकल मन कामना तुलसी प्रीति प्रतीति।

दोहा ४५५

बरषत करषत आपु जल हरषत अरघनि भानु।

तुलसी चाहत साधु सुर सब सनेह सनमानु।

दोहा ४५६

श्रुति गुन कर गुन पु जुग मृग हय रेवती सखाउ।

देहि लेहि धन धरनि धरू गएहुँ न जाइहि काउ।

दोहा ४५७

ऊगुन पूगुन बि अज कृ म आ भ अ मू गुनु साथ।

हरो धरो गाड़ो दियो धन फिरि चढ़इ न हाथ।

दोहा ४५८

रबि हर दिसि गुन रस नयन मुनि प्रथमादिक बार।

तिथि सब काज नसावनी होइ कुजोग बिचार।

दोहा ४५९

ससि सर नव दुइ छ दस गुन मुनि फल बसु हर भानु।

मेषादिक क्रम तें गनहि घात चंद्र जियँ जानु।

दोहा ४६०

नकुल सुदरसन दरसनी छेमकरी चक चाष।

दस दिसि देखत सगुन सुभ पुजहिं मन अभिलाष।

दोहा ४६१

सुधा साधु सुरतरू सुमन सुफल सुहावनि बात।

तुलसी सीतापति भगति सगुन सुमंगल सात।

दोहा ४६२

भरत सत्रु सुदन लखन सहित सुमिरि रधुनाथं ।

करहु काज सुभ साज सब मिलिहि सुमंगल साथ।।

दोहा ४६३

राम लखन कौसिक सहित सुमिरहु करहु पयान।

लच्छि लाभ लै जगत जसु मंगल सगुन प्रमान।

दोहा ४६४

अतुलित महिमा बेद की तुलसी किएँ बिचार।

जो निंदित भयो बिदित बुद्ध अवतार।

दोहा ४६५

बुध किसान सर बेद निज मतें खेत सब सींच ।

तुलसी कृषि लखि जानिबो उत्तम मध्यम नीच।

दोहा ४६६

सहि कुबोल साँसति सकल अँगइ अनट अपमान।

तुलसी धरम न परिहरिअ कहि करि गए सुजान।

दोहा ४६७

अनहित भय परहित किएँ पर अनहित हित हानि।

तुलसी चारू बिचारू भल करिअ काज सुनि जानि।

दोहा ४६८

पुरूषारथ पूरब करम परमेस्वर परधान।

तुलसी पैरत सरित ज्यों सबहिं काज अनुमान।

दोहा ४६९

चलब नीति मग राम पग नेह निबाहब नीक।

तुलसी पहिरिअ सो बसन जो न पखारें फीक।

दोहा ४७०

दोहा चारू बिचारू चलु परिहरि बाद बिबाद।

सुकृत सीवँ स्वारथ अवधि परमारथ मरजाद।

दोहा ४७१

तुलसी सो समरथ सुमति सुकृती साधु सयान।

जो बिचारि ब्यवहरइ जग खरच लाभ अनुमान।

दोहा ४७२

जाय जोग जग छेम बिनु तुलसी के हित राखि।

बिनुऽपराध भृगुपति नहुष बेनु बृकासुर साखि।

दोहा ४७३

बड़ि प्रतीति गठिबंध तें बड़ो जोग तें छेमं।

बड़ो सुसेवक साइँ तें बड़ो नेम तें प्रेम।

दोहा ४७४

सिस्य सखा सेवक सचिव सुतिय सिखावन साँच।

सुनि समुझिअ पुनि परिहरिअ पर मन रंजन पाँच।।

दोहा ४७५

नगर नारि भोजन सचिव सेवक सखा अगार।

सरस परिहरें रंग रस निरस बिषाद बिकार।

दोहा ४७६

तूठहिं निज रूचि काज करि रूठहिं काज बिगारि।

तीय तनय सेवक सखा मन के कंटक चारि।

दोहा ४७७

दीरघ रोगी दारिदी कटुबच लोलुप लोग।

तुलसी प्रान समान तउ होहिं निरादर जोग।

दोहा ४७८

पाही खेती लगन बट रिन कुब्याज मग खेत।

बैर बड़े सों आपने किए पाँच दुख हेत।

दोहा ४७९

धाइ लगै लोहा ललकि खैंचि लेइ नइ नीचु।

समरथ पापी सों बयर जानि बिसाही मीचु।

दोहा ४८०

सोचिअ गृही जो मोह बस करइ करम पथ त्याग।

सोचिअ जती प्रपंच रत बिगत बिबेक बिराग।

दोहा ४८१

तुलसी स्वारथ सामुहो परमारथ तन पीठि।

अंध कहें दुख पाइहै डिठिआरो केहि डीठि।

दोहा ४८२

बिन आँखिन की पानहीं पहिचानत लखि पाय।

चारि नयन के नारि नर सूझत मीचु न माय।

दोहा ४८३

जौ पै मूढ़ उपदेस के होते जोग जहान।

क्यों न सुजोधन बोध कै आए स्याम सुजान।

दोहा ४८४

(सोरठा)

फूलइ फरइ न बेत जदपि सुधा बरषहिं जलद।

मूरूख हृदयँ न चेत जौं गुर मिलहिं बिरंचि सम।

दोहा ४८५

(दोहा)

रीझि आपनी बेझि पर खीझि बिचार बिहीन।

ते उपदेस न मानहीं मोह महोदधि मीन।

दोहा ४८६

अनसमुझें अनुसोचनो अवसि समुझिऐ आयु।

तुलसी आपु न समुझिऐ पल पल पर परितापु।

दोहा ४८७

कूप खनत मंदिर जरत आएँ धारि बबूर।

बवहिं नवहिं निज काज सिर कुमति सिरोमनि कूर।

दोहा ४८८

निडर ईस ते बीस कै बीस बाहु सो होइ।

गयो कहैं सुमति सब भयो कुमति कह कोइ।

दोहा ४८९

जो सुनि समुझि अनीति रत जागत रहै जु सोइ।

उपदेसिबो जगाइबो तुलसी उचित न होय।

दोहा ४९०

बहु सुत बहु रूचि बहु बचन बहु अचार ब्यवहार।

इनको भलो मनाइबो यह अग्यान अपार।

दोहा ४९१

लोगनि भलो मनाव जो भलो होन की आस।

करत गगन को गेंडुआ सो सठ तुलसीदास।

दोहा ४९२

अपजस जोग कि जानकी मनि चोरी की कान्ह।

दोहा ४९३

तुलसी जु पै गुमान को होतो कछू उपाउ।

तौ कि जानकिहि जानि जियँ परिहरते रधुराउ।

दोहा ४९४

मागि मधुकरी खात ते सोवत गोड़ पसारि।

पाप प्रतिष्ठा बढ़ि परी ताते बाढ़ी रारि।

दोहा ४९५

तुलसी भेड़ी की धँसनि जड़ जनता सनमान।

उपजत ही अभिमान भो खोवत मूढ़ अपान।

दोहा ४९६

लही आँखि कब आँधरे बाँझ पूत कब ल्याइ।

कब कोढ़ी काया लही जग बहराइच जाइ।

दोहा ४९७

तुलसी निरभय होत नर सुनिअत सुरपुर जाइ।

सो गति लखि ब्रत अछत तनु सुख संपति गति पाइ।

दोहा ४९८

तुलसी तोरत तीर तरू बक हित हंस बिडारि।

बिगत नलिन अलि मलिन जल सुरसरिहू बढ़िआरि।

दोहा ४९९

अधिकारी बस औसरा भलेउ जानिबे मंद।

सुधा सदन बसु बारहें चउथें चउथिउ चंद।

दोहा ५००

त्रिबिध एक बिधि प्रभु अनुग अवसर करहिं कुठाट।

सूधें टेढ़े सम बिषम सब महँ बारह बाट।

भाग-11 (दोहा संख्या 501 से 550)