भाग 10
कै जूझिबो कै बूझिबो दान कि काय कलेस।
चारि चारू परलोक पथ जथा जोग उपदेस।
पात पात को सींचिबो न करू सरग तरू हेत।
कुटिल कटुक फर फरैगो तुलसी करत अचेत।
गठिबँध ते परतीति बड़ि जेहिं सबको सब काज।
कहब थोर समुझब बहुत गाड़े बढ़त अनाज।
अपनो एपन निज हथा तिय पूजहिं निजज भीति।
फरइ सकल मन कामना तुलसी प्रीति प्रतीति।
बरषत करषत आपु जल हरषत अरघनि भानु।
तुलसी चाहत साधु सुर सब सनेह सनमानु।
श्रुति गुन कर गुन पु जुग मृग हय रेवती सखाउ।
देहि लेहि धन धरनि धरू गएहुँ न जाइहि काउ।
ऊगुन पूगुन बि अज कृ म आ भ अ मू गुनु साथ।
हरो धरो गाड़ो दियो धन फिरि चढ़इ न हाथ।
रबि हर दिसि गुन रस नयन मुनि प्रथमादिक बार।
तिथि सब काज नसावनी होइ कुजोग बिचार।
ससि सर नव दुइ छ दस गुन मुनि फल बसु हर भानु।
मेषादिक क्रम तें गनहि घात चंद्र जियँ जानु।
नकुल सुदरसन दरसनी छेमकरी चक चाष।
दस दिसि देखत सगुन सुभ पुजहिं मन अभिलाष।
सुधा साधु सुरतरू सुमन सुफल सुहावनि बात।
तुलसी सीतापति भगति सगुन सुमंगल सात।
भरत सत्रु सुदन लखन सहित सुमिरि रधुनाथं ।
करहु काज सुभ साज सब मिलिहि सुमंगल साथ।।
राम लखन कौसिक सहित सुमिरहु करहु पयान।
लच्छि लाभ लै जगत जसु मंगल सगुन प्रमान।
अतुलित महिमा बेद की तुलसी किएँ बिचार।
जो निंदित भयो बिदित बुद्ध अवतार।
बुध किसान सर बेद निज मतें खेत सब सींच ।
तुलसी कृषि लखि जानिबो उत्तम मध्यम नीच।
सहि कुबोल साँसति सकल अँगइ अनट अपमान।
तुलसी धरम न परिहरिअ कहि करि गए सुजान।
अनहित भय परहित किएँ पर अनहित हित हानि।
तुलसी चारू बिचारू भल करिअ काज सुनि जानि।
पुरूषारथ पूरब करम परमेस्वर परधान।
तुलसी पैरत सरित ज्यों सबहिं काज अनुमान।
चलब नीति मग राम पग नेह निबाहब नीक।
तुलसी पहिरिअ सो बसन जो न पखारें फीक।
दोहा चारू बिचारू चलु परिहरि बाद बिबाद।
सुकृत सीवँ स्वारथ अवधि परमारथ मरजाद।
तुलसी सो समरथ सुमति सुकृती साधु सयान।
जो बिचारि ब्यवहरइ जग खरच लाभ अनुमान।
जाय जोग जग छेम बिनु तुलसी के हित राखि।
बिनुऽपराध भृगुपति नहुष बेनु बृकासुर साखि।
बड़ि प्रतीति गठिबंध तें बड़ो जोग तें छेमं।
बड़ो सुसेवक साइँ तें बड़ो नेम तें प्रेम।
सिस्य सखा सेवक सचिव सुतिय सिखावन साँच।
सुनि समुझिअ पुनि परिहरिअ पर मन रंजन पाँच।।
नगर नारि भोजन सचिव सेवक सखा अगार।
सरस परिहरें रंग रस निरस बिषाद बिकार।
तूठहिं निज रूचि काज करि रूठहिं काज बिगारि।
तीय तनय सेवक सखा मन के कंटक चारि।
दीरघ रोगी दारिदी कटुबच लोलुप लोग।
तुलसी प्रान समान तउ होहिं निरादर जोग।
पाही खेती लगन बट रिन कुब्याज मग खेत।
बैर बड़े सों आपने किए पाँच दुख हेत।
धाइ लगै लोहा ललकि खैंचि लेइ नइ नीचु।
समरथ पापी सों बयर जानि बिसाही मीचु।
सोचिअ गृही जो मोह बस करइ करम पथ त्याग।
सोचिअ जती प्रपंच रत बिगत बिबेक बिराग।
तुलसी स्वारथ सामुहो परमारथ तन पीठि।
अंध कहें दुख पाइहै डिठिआरो केहि डीठि।
बिन आँखिन की पानहीं पहिचानत लखि पाय।
चारि नयन के नारि नर सूझत मीचु न माय।
जौ पै मूढ़ उपदेस के होते जोग जहान।
क्यों न सुजोधन बोध कै आए स्याम सुजान।
(सोरठा)
फूलइ फरइ न बेत जदपि सुधा बरषहिं जलद।
मूरूख हृदयँ न चेत जौं गुर मिलहिं बिरंचि सम।
(दोहा)
रीझि आपनी बेझि पर खीझि बिचार बिहीन।
ते उपदेस न मानहीं मोह महोदधि मीन।
अनसमुझें अनुसोचनो अवसि समुझिऐ आयु।
तुलसी आपु न समुझिऐ पल पल पर परितापु।
कूप खनत मंदिर जरत आएँ धारि बबूर।
बवहिं नवहिं निज काज सिर कुमति सिरोमनि कूर।
निडर ईस ते बीस कै बीस बाहु सो होइ।
गयो कहैं सुमति सब भयो कुमति कह कोइ।
जो सुनि समुझि अनीति रत जागत रहै जु सोइ।
उपदेसिबो जगाइबो तुलसी उचित न होय।
बहु सुत बहु रूचि बहु बचन बहु अचार ब्यवहार।
इनको भलो मनाइबो यह अग्यान अपार।
लोगनि भलो मनाव जो भलो होन की आस।
करत गगन को गेंडुआ सो सठ तुलसीदास।
अपजस जोग कि जानकी मनि चोरी की कान्ह।
तुलसी जु पै गुमान को होतो कछू उपाउ।
तौ कि जानकिहि जानि जियँ परिहरते रधुराउ।
मागि मधुकरी खात ते सोवत गोड़ पसारि।
पाप प्रतिष्ठा बढ़ि परी ताते बाढ़ी रारि।
तुलसी भेड़ी की धँसनि जड़ जनता सनमान।
उपजत ही अभिमान भो खोवत मूढ़ अपान।
लही आँखि कब आँधरे बाँझ पूत कब ल्याइ।
कब कोढ़ी काया लही जग बहराइच जाइ।
तुलसी निरभय होत नर सुनिअत सुरपुर जाइ।
सो गति लखि ब्रत अछत तनु सुख संपति गति पाइ।
तुलसी तोरत तीर तरू बक हित हंस बिडारि।
बिगत नलिन अलि मलिन जल सुरसरिहू बढ़िआरि।
अधिकारी बस औसरा भलेउ जानिबे मंद।
सुधा सदन बसु बारहें चउथें चउथिउ चंद।
त्रिबिध एक बिधि प्रभु अनुग अवसर करहिं कुठाट।
सूधें टेढ़े सम बिषम सब महँ बारह बाट।
भाग-11 (दोहा संख्या 501 से 550)