श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
दोहावली · गोस्वामी तुलसीदास

भाग 9

दोहावली · भाग 9
दोहा 401

नीच गुड़ी ज्यों जानिबो सुनि लखि तुलसीदास।

ढीलि दिएँ गिरि परत महि खैंचत चढ़त अकास।

दोहा 402

भरदर बरसत कोस सत बचैं जे बूँद बराइ।

तुलसी तेउ खल बचन सर गए न पराइ।

दोहा 403

पेरत कोल्हू मेलि तिली सनेही जानि।

देखि प्रीति की रीति यह अब देखिबी रिसानि।

दोहा 404

सहबासी काचो गिलहिं पुरजन पाक प्रबीन।

कालछेप केहि मिलि करहिं तुलसी खग मृग मीन।

दोहा 405

जासु भरोसें सोइऐ राखि गोद में सीस।

तुलसी तासु कुचाल तें रखवारो जगदीश।

दोहा 406

मार खोज लै सौंह करि करि मत लाज न त्रास।

मुए नीच ते मीच बिनु जे इन कें बिस्वास।

दोहा 407

परद्रोही परदार रत परधन पर अपबाद।

ते नर पावँर पापमय देह धरें मनुजाद।

दोहा 408

बचन बेष क्यों जानिए मन मलीन नर नारि।

सूपनखा मृग पूतना दसमुख प्रमुख बिचारि।

दोहा 409

हँसहि मिलनि बोलनि मधुर कटु करतब मन माँह।

छुवत जो सकुचइ सुमति सो तुलसी तिन्ह की छाँह।

दोहा 410

कपट सार सूची सहस बाँधि बचन परबास।

कियो दुराउ चहौ चातुरीं सो सठ तुलसीदास।

दोहा 411

बचन बिचार अचार तन मन करतब छल छूति।

तुलसी क्यांे सुख पाइये अंतरजामिहि धूति।

दोहा 412

सारदूल को स्वाँग करि कूकर की करतूति ।

तुलसी तापर चाहिऐ कीरति बिजय बिभूति।

दोहा 413

बड़े पाप बाढे़ं किए छोटे किए लजात।

तुलसी ता पर सुख चहत बिधि सों बहुत रिसात।

दोहा 414

देस काल करता करम बचन बिचार बिहीन।

ते सुरतरू तर दारिदी सुरसरि तीर मलीन।।

दोहा 415

साहस हीं कै कोप बस किएँ कठिन परिपाक।

सठ संकट भाजन भए हठि कुजाति कपि काक।

दोहा 416

राज करत बिनु काजहीं करहिं कुचालि कुसाजि।

तुलसी ते दसकंध ज्यों जइहैं सहित समाज।

दोहा 417

राज करत बिनु काजहीं ठजहिं जे कूर कुठाट।

तुलसी ते कुरूराज ज्यों जइहैं बारह बाट।

दोहा 418

सभा सुयोधन की सकुनि सुमति सराहन जोग।

द्रोन बिदुर भीषम हरिहि कहहिं प्रपंची लोग।

दोहा 419

पांडु सुअन की सदसि ते नीको रिपु हित जानि।

हरि हर सम सब मानिअत मोह ग्यान की बानि।।

दोहा 420

हित पर बढइ बिरोध जब अनहित पर अनुराग।

राम बिमुख बिधि बाम गति सगुन अघाइ अभाग।

दोहा 421

सहज सुहृय गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानि।

सो पछिताइ अधाइ उर अवसि हाइ हित हानि।।

दोहा 422

भरूहाए नट भाँट के चपरि चढे़ संग्राम।

कै वै भाजे आइहैं कै बाँधे परिनाम।

दोहा 423

लोक रीति फूटी सहहिं आँजी सहइ न कोइ।

तुलसी जो आँजी सहइ सो आँधरो न होइ।।

दोहा 424

भागें भल ओड़ेहुँ भलो भलो न घालें घाउ।

तुलसी सब के सीस पर रखवारो रघुराउ।

दोहा 425

सुमति बिचारहिं परिहरहिं दल सुमनहुँ संग्राम।

सकुल गए तनु बिनु भए साखी जादौ काम।

दोहा 426

कलह न जानब छोट करि कलन कठिन परिनाम।

लगति अगिनि लघु नीच गृह जरत धनिक धन धाम।

दोहा 427

छमा रोष के दोष गुन सुति मनु मानहिं सीख।

अबिचल श्रीपति हरि भए भूसुर लहै न भीख।

दोहा 428

कौरव पांडव जानिऐ क्रोध छमा के सीम।

पाँचहि मारि न सौ सके सयौ सँघारे भीम।

दोहा 429

बोल न मोटे मारिऐ मोटी रोटी मारू।

जीति सहस सम हारिबो जीतें हारि निहारू।

दोहा 430

जो परि पायँ मनाइए तासों रूठि बिचारि।

तुलसी तहाँ न जीतिऐ जहँ जीतेहूँ हारि।

दोहा 431

जूते ते भल बूझिबो भली जीति तें हार।

डहकें तें डहकाइबो भलो जो करिअ बिचार।

दोहा 432

जा रिपु सों हारेहुँ हँसी जिते पाप परितापु।

तासेंा रारि निवारिऐ समयँ सँभारिअ आपु।

दोहा 433

जो मधु मरै न मारिऐ माहुर देइ सो काउ।

जग जिति हारे परसुधर हारि जिते रघुराउ।

दोहा 434

बैर मूल हर हित बचन प्रेम मूल उपकारं।

दो हा सुभ संदोह सो तुलसी किएँ बिचार।

दोहा 435

रोष न रसना खोलिऐ बरू खोलिअ तरवारिं ।

सुनत मधुर परिनाम हित बोलिअ बचन बिचारि।

दोहा 436

मधुर बचन कटु बोलिबो बिनु श्रम भाग अभाग।

कुहू कलकंठ रव का का कररत काग।

दोहा 437

पेट न फूलत बिनु कहें कहत न लगाइ ढेर।

सुमति बिचारें बोलिऐ समुझि कुफेर सुफेर।

दोहा 438

छिद्यो न तरूनि कटाच्छ सर करेउ न कठिन सनेहु।

तुलसी तिन की देह को जगत कवच करि लेहु।

दोहा 439

सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु।

बिद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु।

दोहा 440

बचन कहे अभिमान के पारथ पेखत सेतु।

प्रभु तिय लूटत नीच भर जय न मीचु तेहिं हेतु।

दोहा 441

राम लखन बिजई भए बनहुँ गरीब निवाज।

मुखर बालि रावन गए घरहीं सहित समाज।

दोहा 442

खग मृग मीत पुनीत किय बनहुँ राम नयपाल।

कुमति बालि दसकंठ धर सुहृद बंधु कियो काल।

दोहा 443

लखइ अघानो भूख ज्यों लखइ जीतिमें हारि।

तुलसी सुमति सराहिऐ मग पग धरइ बिचारि।

दोहा 444

लाभ समय को पालिबो हानि समय की चूक ।

सदा बिचारहिं चारूमति सुदिन कुदिन दिन दूक।

दोहा 445

सिंधु तरन कपि गिरि हरन काज काज साइँ हित दोउ।

तुलसी समयहिं सब बड़ो बूझत कहुँ कोउ कोउ।

दोहा 446

तुलसी मीठी अमी तें मागी मिलै जो मीच ।

सुधा सुधाकर समय बिनु कालकूट तें नीच।

दोहा 447

तुलसी असमय के सखा धीरज धरम बिबेक।

साहित साहस सत्यब्रत राम भरोसो ऐक।

दोहा 448

समरथ कोउ न राम सों तीय हरन अपराधु।

सतयहिं साधे काज सब समय सराहिहिं साधु।

दोहा 449

तुलसी तीरहु के चलें समय पाइबी थाह।

धाइ न जाइ थहाइबी सर सरिता अवगाह।

दोहा 450

तुलसी जसि भवतब्यता तैसी मिलइ सहाइ।

आपुनु आवइ ताहि पै ताहि तहाँ लै जाइ।

भाग-10 (दोहा संख्या 451 से 500)