भाग 9
नीच गुड़ी ज्यों जानिबो सुनि लखि तुलसीदास।
ढीलि दिएँ गिरि परत महि खैंचत चढ़त अकास।
भरदर बरसत कोस सत बचैं जे बूँद बराइ।
तुलसी तेउ खल बचन सर गए न पराइ।
पेरत कोल्हू मेलि तिली सनेही जानि।
देखि प्रीति की रीति यह अब देखिबी रिसानि।
सहबासी काचो गिलहिं पुरजन पाक प्रबीन।
कालछेप केहि मिलि करहिं तुलसी खग मृग मीन।
जासु भरोसें सोइऐ राखि गोद में सीस।
तुलसी तासु कुचाल तें रखवारो जगदीश।
मार खोज लै सौंह करि करि मत लाज न त्रास।
मुए नीच ते मीच बिनु जे इन कें बिस्वास।
परद्रोही परदार रत परधन पर अपबाद।
ते नर पावँर पापमय देह धरें मनुजाद।
बचन बेष क्यों जानिए मन मलीन नर नारि।
सूपनखा मृग पूतना दसमुख प्रमुख बिचारि।
हँसहि मिलनि बोलनि मधुर कटु करतब मन माँह।
छुवत जो सकुचइ सुमति सो तुलसी तिन्ह की छाँह।
कपट सार सूची सहस बाँधि बचन परबास।
कियो दुराउ चहौ चातुरीं सो सठ तुलसीदास।
बचन बिचार अचार तन मन करतब छल छूति।
तुलसी क्यांे सुख पाइये अंतरजामिहि धूति।
सारदूल को स्वाँग करि कूकर की करतूति ।
तुलसी तापर चाहिऐ कीरति बिजय बिभूति।
बड़े पाप बाढे़ं किए छोटे किए लजात।
तुलसी ता पर सुख चहत बिधि सों बहुत रिसात।
देस काल करता करम बचन बिचार बिहीन।
ते सुरतरू तर दारिदी सुरसरि तीर मलीन।।
साहस हीं कै कोप बस किएँ कठिन परिपाक।
सठ संकट भाजन भए हठि कुजाति कपि काक।
राज करत बिनु काजहीं करहिं कुचालि कुसाजि।
तुलसी ते दसकंध ज्यों जइहैं सहित समाज।
राज करत बिनु काजहीं ठजहिं जे कूर कुठाट।
तुलसी ते कुरूराज ज्यों जइहैं बारह बाट।
सभा सुयोधन की सकुनि सुमति सराहन जोग।
द्रोन बिदुर भीषम हरिहि कहहिं प्रपंची लोग।
पांडु सुअन की सदसि ते नीको रिपु हित जानि।
हरि हर सम सब मानिअत मोह ग्यान की बानि।।
हित पर बढइ बिरोध जब अनहित पर अनुराग।
राम बिमुख बिधि बाम गति सगुन अघाइ अभाग।
सहज सुहृय गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानि।
सो पछिताइ अधाइ उर अवसि हाइ हित हानि।।
भरूहाए नट भाँट के चपरि चढे़ संग्राम।
कै वै भाजे आइहैं कै बाँधे परिनाम।
लोक रीति फूटी सहहिं आँजी सहइ न कोइ।
तुलसी जो आँजी सहइ सो आँधरो न होइ।।
भागें भल ओड़ेहुँ भलो भलो न घालें घाउ।
तुलसी सब के सीस पर रखवारो रघुराउ।
सुमति बिचारहिं परिहरहिं दल सुमनहुँ संग्राम।
सकुल गए तनु बिनु भए साखी जादौ काम।
कलह न जानब छोट करि कलन कठिन परिनाम।
लगति अगिनि लघु नीच गृह जरत धनिक धन धाम।
छमा रोष के दोष गुन सुति मनु मानहिं सीख।
अबिचल श्रीपति हरि भए भूसुर लहै न भीख।
कौरव पांडव जानिऐ क्रोध छमा के सीम।
पाँचहि मारि न सौ सके सयौ सँघारे भीम।
बोल न मोटे मारिऐ मोटी रोटी मारू।
जीति सहस सम हारिबो जीतें हारि निहारू।
जो परि पायँ मनाइए तासों रूठि बिचारि।
तुलसी तहाँ न जीतिऐ जहँ जीतेहूँ हारि।
जूते ते भल बूझिबो भली जीति तें हार।
डहकें तें डहकाइबो भलो जो करिअ बिचार।
जा रिपु सों हारेहुँ हँसी जिते पाप परितापु।
तासेंा रारि निवारिऐ समयँ सँभारिअ आपु।
जो मधु मरै न मारिऐ माहुर देइ सो काउ।
जग जिति हारे परसुधर हारि जिते रघुराउ।
बैर मूल हर हित बचन प्रेम मूल उपकारं।
दो हा सुभ संदोह सो तुलसी किएँ बिचार।
रोष न रसना खोलिऐ बरू खोलिअ तरवारिं ।
सुनत मधुर परिनाम हित बोलिअ बचन बिचारि।
मधुर बचन कटु बोलिबो बिनु श्रम भाग अभाग।
कुहू कलकंठ रव का का कररत काग।
पेट न फूलत बिनु कहें कहत न लगाइ ढेर।
सुमति बिचारें बोलिऐ समुझि कुफेर सुफेर।
छिद्यो न तरूनि कटाच्छ सर करेउ न कठिन सनेहु।
तुलसी तिन की देह को जगत कवच करि लेहु।
सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु।
बिद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु।
बचन कहे अभिमान के पारथ पेखत सेतु।
प्रभु तिय लूटत नीच भर जय न मीचु तेहिं हेतु।
राम लखन बिजई भए बनहुँ गरीब निवाज।
मुखर बालि रावन गए घरहीं सहित समाज।
खग मृग मीत पुनीत किय बनहुँ राम नयपाल।
कुमति बालि दसकंठ धर सुहृद बंधु कियो काल।
लखइ अघानो भूख ज्यों लखइ जीतिमें हारि।
तुलसी सुमति सराहिऐ मग पग धरइ बिचारि।
लाभ समय को पालिबो हानि समय की चूक ।
सदा बिचारहिं चारूमति सुदिन कुदिन दिन दूक।
सिंधु तरन कपि गिरि हरन काज काज साइँ हित दोउ।
तुलसी समयहिं सब बड़ो बूझत कहुँ कोउ कोउ।
तुलसी मीठी अमी तें मागी मिलै जो मीच ।
सुधा सुधाकर समय बिनु कालकूट तें नीच।
तुलसी असमय के सखा धीरज धरम बिबेक।
साहित साहस सत्यब्रत राम भरोसो ऐक।
समरथ कोउ न राम सों तीय हरन अपराधु।
सतयहिं साधे काज सब समय सराहिहिं साधु।
तुलसी तीरहु के चलें समय पाइबी थाह।
धाइ न जाइ थहाइबी सर सरिता अवगाह।
तुलसी जसि भवतब्यता तैसी मिलइ सहाइ।
आपुनु आवइ ताहि पै ताहि तहाँ लै जाइ।
भाग-10 (दोहा संख्या 451 से 500)