श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
दोहावली · गोस्वामी तुलसीदास

भाग 4

दोहावली · भाग 4
दोहा १५१

चारि चहत मानस अगम चनक चारि को लाहु।

चारि परिहरें चारि को दानि चारि चख चाहु।

दोहा १५२

सूधे मन सूधे बचन सूधी सब करतूति।

तुलसी सूधी सकल बिधि रघुबर प्रेम प्रसूति।

दोहा १५३

बेष बिषद बोलनि मधुर मन कटु करम मलीन।

तुलसी राम न पाइऐ भएँ बिषय जल मीन।

दोहा १५४

बषन बेष तें जो बनइ से बिगरइ परिनाम।

तुलसी मन तें जो बनइ बनी बनाई राम।

दोहा १५५

नीच मीचु लै जाइ जो राम रजायसु पाइ।

तौ तुलसी तेरो भलो न तु अनभलो अघाइ।

दोहा १५६

जाति हीन अघ जन्म महि मुक्त कीन्हि असि नारि।

महामंद मन सुख चहसि ऐसे प्रभुहि बिसारि।।

दोहा १५७

बंधु बधू रत कहि कियो बचन निरूत्तर बालि।

तुलसी प्रभु सुग्रीव की चितइ न कछू कुचालि।

दोहा १५८

बालि बली बलसालि दलि सखा कीन्ह कपिराज।

तुलसी राम कृपालु को बिरद गरीब निवाज।

दोहा १५९

कहा बिभीषन लै मिल्यो कहा बिगार्यो बालि।

तुलसी प्रभु सरनागतहि सब िदन आए पालि।

दोहा १६०

तुलसी कोसलपाल सो को सरनागत पाल।

भज्यो बिभीषन बंधु भय भ्ंाज्यो दारिद काल।

दोहा १६१

श्री कुलिसहु चाहि कठोर अति कोमल कुसुमहु चाहि।

चित्त खगेस राम कर समुझि परइ कहु काहि।

दोहा १६२

बालकन भूषन फल असन तृन सज्या द्रुम प्रीति।

तिन्ह समयन लंका दई यह रघुबर की रीति।

दोहा १६३

जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ।

सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्हि रघुनाथ।

दोहा १६४

अबिचल राज बिभीषनहि दीन्ह राम रघुराज।

अजहुँ बिराजत लंक पर तुलसी सहित समाज।

दोहा १६५

कहा विभीषन लै मिल्यो कहा दियो रघुनाथ।

तुलसी यह जाने बिना मूढ़ मीजिहैं हाथ।

दोहा १६६

बैरि बंधु निसिचर अधम तज्यो न भरें कलंक।

झूठें अघ सिय परिहरी तुलसी साइँ ससंक।

दोहा १६७

तेहि समाज कियो कठिन पन जेहिं तौल्यो कैलास।

तुलसी प्रभु महिमा कहैंा सेवक को बिस्वास।

दोहा १६८

सभा सभासद निरखि पट पकरि उठायों हाथ।

तुलसी कियो इगारहों बसन बेस जदुनाथ।

दोहा १६९

त्राहि तीनि कह्यो द्रोपदी तुलसी राज समाज।

प्रथम बढ़े पट बिय बिकल चहत चकित निज काज।

दोहा १७०

सुख जीवन सब कोउ चहत सुख जीवन हरि हाथ।

तुलसी दाता मागनेउ देखिअत अबुध अनाथ।

दोहा १७१

कृपिन देइ पाइअ परो बिनु साधें सिधि होइ।

सीतापति सनमुख समुझि जो कीजै सुभ सोइ।

दोहा १७२

दंडक बन पावन करन चरन सरोज प्रभाउ।

ऊसर जामहिं खल तरहिं होइ रंक ते राउ।

दोहा १७३

बिनहीं रितु तरूबर फलत सिला द्रवति जल जोर।

राम लखन सिय करि कृपा जब चितवत जेहि ओर।

दोहा १७४

सिला सुतिय भइ गिरि तरे मृतक जिए जग जान।

राम अनुग्रह सगुन सुभ सुलभ सकल कल्यान।

दोहा १७५

सिला साप मोचन चरन सुमिरहु तुलसीदास।

तजहु सोच संकट मिटहिं पूजहिं मनकी आस।

दोहा १७६

मुए जिआउ भालु कपि अवध बिप्रको पूत।

सुमिरहु तुलसी ताहि तू जाको मारूति दूत।

दोहा १७७

काल करम गुन दोष जगज ीव तिहारे हाथ ।

तुलसी रघुबर राबरो जानु जानकीनाथ।

दोहा १७८

रोग निकर तनु जरठपनु तुलसी संग कुलोग।

राम कृपा लै पालिए दीन पालिबे जोग।

दोहा १७९

मो सम दीन न दीन हित तुम्ह समान रघुबीर ।

अस बिचारि रघुबंस मनि हरहु बिषम भव भीर।

दोहा १८०

भव भुअंग तुलसी नकुल डसत ग्यान हरि लेत।

चित्रकूट एक औषधी चितवत होत सचेत।

दोहा १८१

श्री हौं हु कहावत सबु कहत राम सहत उपहास।

साहिब सीतानाथ सो सेवक तुलसीदास।

दोहा १८२

राम राज राजत सकल धरम निरत नर नारि।

राग न रोष न दोष दुख सुलभ पदारथ चारि।।
दोहा १८३

राम राज संतोष सुख घर बन सकल सुपास ।

तरू सुरतरू सुरधेनु महि अभिमत भोग बिलास।

दोहा १८४

खेती बानि बिद्या बनिज सेवा सिलिप सुकाज।

तुलसी सुरतरू सरिस सब सुफल राम के राज।

दोहा १८५

दंड जतिन्ह कर भेद जहँ नर्तक नृत्य समाज।

जीतहु मनहि सुनिअ अस रामचंद्र के राज।

दोहा १८६

कोंपें सोच न पोच कर करिअ निहोर न काज।

तुलसी परमिति प्रीति की रीति राम कें राज।

दोहा १८७

मुकर निरखि मुख रामभ्रू गनत गुनहि दै दोष।

तुलसी से सठ सेवकन्हि लखि जनि परहिं सरोष।

दोहा १८८

सहसनाम मुनि भनित सुनि तुलसी बल्लभ नाम।

सकुचित हियँ हँसि निरखि सिय धरम धुरंधर राम।

दोहा १८९

गौतम तिय गति सुरति करि नहिं परसकत पग पानि।

मन बिहँसे रघुबंसमनि प्रीति अलौकिक जानि।

दोहा १९०

तुलसी बिलसत नखत निसि सरद सुधाकर साथ।

मुकुता झालरि झलक जनु राम सुजसु सिसु हाथ।

दोहा १९१

रघुपति कीरति कामिनी क्यों कहै तुलसिदासु।

सरद अकास प्रकास ससि चारू चिबुक तिल जासु।

दोहा १९२

प्रभु गुन गन भूषन बसन बिसद बिसेष सुबेस।

राम सुकीरति कामिनी तुलसी करतब केस।

दोहा १९३

राम चरित राकेस कर सरिस सुखद सब काहु।

सज्जन कुमुद चकोर चित हित बिसेषि बड़ लाहु।

दोहा १९४

रघुबर कीरति सज्जननि सीतल खलनि सुताति।

ज्यों चकोर चय चक्कवनि तुलसी चाँदनि राति।

दोहा १९५

राम कथा मंदाकिनी चित्रकूट चित चारू।

तुलसी सुभग सनेह बन सिय रघुबीर बिहारू।

दोहा १९६

स्याम सुरभि प्य बिषद अति गुनद करहिं सब पान।

गिरा ग्राम्य सिय राम जस गावहिं सुनहिं सुजान।

दोहा १९७

हरि हर जस सुर तर गिरहुँ बरनहिं सुकबि समाज।

हाँडी हाटक घटित चरू राँधे स्वाद सुनाज।

दोहा १९८

तिल पर राखेउ सकल जग बिदित बिलोकत लोग।

तुलसी महिमा राम की कौन जानिबे जोग।

दोहा १९९

राम सरूप तुम्हार बचन अगोचर बुद्धिपर।

अबिगत अकथ अपार नेति नेति नित निगम कह।

दोहा २००

माया जीव सुभाव गुन काल करम महदादि।

ईस अंक तें बढ़त सब ईस अंक बिनु बादि।

भाग-5 (दोहा संख्या 201 से 250)