भाग 5
हित उदास रघुबर बिरह बिकल सकल नर नारि।
भरत लखन सिय गति समुझि प्रभु चख सदा सुबारि।
सीय सुमित्रा सुवन गति भरत सनेह सुभाउ।
काहिबे को सारद सरस जनिबे को रघुराउ।
जानी राम न कहि सके भरत लखन सिय प्रीति।
सो सुनि गुनि तुलसी कहत हठ सठता की रीति।
सम बिधि समरथ सकल कह सहि साँसति दिन राति ।
भलो निबाहेउ सुनि समुझि स्वामिधर्म सब भाँति।
भरतहि होइ न राजमदु बिधि हरिहर पद पाइ।
कबहुँ कि काँजी सीकरनि छीरसिंधु बिनसाइ।
संपति चकई भरत चक मुनि आयस खेलवार।
तेहि निसि आश्रम पिंजाराँ राखे भा भिनुसार।
सघन चोर मग मुदित मन धनी गही ज्यों फेंट।
त्यों सुग्रीव बिभीषनहिं भई भरतकी भेंट।
राम सराहे भरत उठि मिले राम सम जानि।
तदपि बिभीषन कीसपति तुलसी गरत गलानि।।
भरत स्याम तन राम सम सब गुन रूप् निधान।
सेवक सुखदायक सुलभ सुमिरत सब कल्यान।
ललित लखन मुरति मधुर सुमिरहु सहित सनेह।
सुख संपति कीरति बिजय सगुन सुमंगल गेह।
नाम सत्रुसूदन सुभग सुषमा सील निकेत।
सेवत सुमिरत सुलभ सुख सकल सुमंगल देत।
कौसल्या कल्यानमइ मूरति करत प्रनाम ।
सगुन सुमंगल काज सुभ कृपा करहिं सियराम।
सुमिरि सुमित्रा नाम जग जे तिय लेहिं सनेम।
सुअन लखन रिपुदवन से पावहिं पति पद प्रेम।
सीताचरन प्रनाम करि सुमिरि सुनाम सुनेम।
होहिं तीय पतिदेवता प्राननाथ प्रिय प्रेम।
तुलसी केवल कामतरू राचरित आराम।
कलितरू कपि निसिचर कहत हमहिं किये बिधि बाम।
मातु सकल सानुज भरत गुरू पुर लोग सुभाउ।
देखत देख न कैकइहि लंकापति कपिराउ।
सहज सरल रघुबर बचन कुमति कुटिल करि जान।
चलइ जोंक जल बक्रगति जद्यपि सलिलु समान।
दसरथ नाम सुकामतरू फलइ सकल कल्यान।
धरनि धाम धन धरम सुत सदगुन रूप निधान।
तुलसी जान्यो दसरथहिं न सत्य समान।
रामु तजे जेहि लागि बिनु राम परिहरे प्रान।
राम बिरहँ दसरथ मरन मुनि मन अगम सुमीचु ।
तुलसी मंगल मरन तरू सुचि सनेह जल सींचु।
जीवन मरन सुनाम जैसें दसरथ राय को।
जियत खिलाए राम राम बिरहँ तनु परिहरेउ।
श्री प्रभुहिं बिलोकत गोद गत सिय हिय घायल नीचु।
तुलसी पाई गीधपति मुकुति मनोहर मीचु।
बिरत करम रत भगत मुनि सिद्ध ऊँच अरू नीचु।
तुलसी सकल सिहात सुनि गीधराज की मीचु।
मुए मरत मरिहैं सकल घरी पहरके बीचु।
लही न काहूँ आजु लौं गीधराज की मीचु।
मुएँ मुकुत जीवत मुकुत मुकुत मुकुत हुँ बीचु।
तुलसी सबहे तें अधिक गीधराज की मीचु।
रघुवर बिकल बिहंग सो बिलोकि दोउ बीर।
सिय सुधि कहि सिय राम कहि देह तजी मति धीर।
दसरथ तें दसगुन भगति सहित तासु करि काजु।
सोचत बंधु समेत प्रभु कृपासिंधु रघुराजु।
केवट निसिचर बिहग मृग किए साधु सनमानि।
तुलसी रघुबर की कृपा सकल सुमंगल खानि।
मंजुल मंगल मोदमय मूरति मारूत पूत।
सकल सिद्धि कर कमल तल सुमिरत रघुबर दूत।
धीर बीर रघुबीर प्रिय सुमिर समीर कुमारू।
अगम सुगम सब काज करू करतल सिद्धि बिचारू।
सुख मुद मंगल कुमुद बिधु सुगुन सरोरूह भानु।
करहु काज सब सिद्धि सुभ आनि हिएँ हनुमानु।
सकल काज सुभ समउ भल सगुन सुमंगल जानु।
कीरति बिजय बिभूति भलि हियँ हनुमानहि आनु।
सूर सिरोमनि साहसी सुमति समीर कुमार।
सुमिरत सब सुख संपदा मुद मंगल दातार।
तुलसी तनु सर सुख जलज भुज रूज गज बरजोर।
दलत दयानिधि देखिये कपि केसरी किसोर।
भुज तरू कोटर रोग अहि बरबस कियो प्रवेस।
बिहगराज बाहन तुरत काढ़िअ मिटै कलेस।
बाहु बिटप सुख बिहँग थलु लगी कुपीर कुआगि।
राम कृपा जल सींचिऐ बेगि दीन हित लागि।
मुक्ति जन्म महि जानि ग्यान खानि अघ हाति कर।
जहँ बस संभु भवानि सो कासी सेइअ कस न।
जरत सकल सुर बृंद सुर बृंद बिषम गरल जेहिं पान किय।
तेहि न भजसि मन मंद को कृपालु संकर सरिस।
बासर ढासनि के ढका रजनीं चहुँ दिसि चोर।
संकर निज पुर राखिऐ चितै सुलोचन कोर।
अपनी बीसीं आपुहीं पुरिहिं लगाए हाथ।
केहि बिधि बिनती बिस्व की करौं बिस्व के नाथ।
और करै अपरधु कोउ और पाव फल भोगु।
अति बिचित्र भगवंत गति को जग जानै जोगु।
प्रेम सरीर प्रपंच रूज उपजी अधिक उपाधि।
तुलसी भली सुबैदई बेगि बाँधिऐ ब्याधि।
हम हमार आचार बड़ भूरि भार धरि सीस।
हठि सठ परबस परत जिमि कीर कोस कृमि कीस।
केहिं मग प्रबिसति जाति केहिं कहु दरपनमें छाहँ।
तुलसी ज्यों जगज ीव गति करी जीव के नाहँ।
सुखसागर सुख नींद बस सपने सब करतार।
माया माया नाथ की को जग जाननिहार।
जीव सीव सम सुख सयन सपनें कछु करतूति।
जागत दीन मलीन सोइ बिकल बिषाद बिभूति।
सपनें होइ भिखारि नृपु रंकु नाकपति होइ।
जागें लाभु न हानि कछु तिमि प्रपंच जियँ जोइ।
तुलसी देखत अनुभवत सुनत न समुझत नीच।
चपरि चपेटे देत नित केस गहें कर मीच।
करम खरी कर मोह थल अंक चराचर जाल।
हनत गुनत गनि गुनि हनत जगत ज्यौतिषी काल।
कहिबे कहँ रसना रची सुनिबे कहँ किये कान ।
धरिबे कहँ चित हित सहित परमारथहि सुजान।
भाग-6 (दोहा संख्या 251 से 300)