श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
दोहावली · गोस्वामी तुलसीदास

भाग 5

दोहावली · भाग 5
दोहा 201

हित उदास रघुबर बिरह बिकल सकल नर नारि।

भरत लखन सिय गति समुझि प्रभु चख सदा सुबारि।

दोहा 202

सीय सुमित्रा सुवन गति भरत सनेह सुभाउ।

काहिबे को सारद सरस जनिबे को रघुराउ।

दोहा 203

जानी राम न कहि सके भरत लखन सिय प्रीति।

सो सुनि गुनि तुलसी कहत हठ सठता की रीति।

दोहा 204

सम बिधि समरथ सकल कह सहि साँसति दिन राति ।

भलो निबाहेउ सुनि समुझि स्वामिधर्म सब भाँति।

दोहा 205

भरतहि होइ न राजमदु बिधि हरिहर पद पाइ।

कबहुँ कि काँजी सीकरनि छीरसिंधु बिनसाइ।

दोहा 206

संपति चकई भरत चक मुनि आयस खेलवार।

तेहि निसि आश्रम पिंजाराँ राखे भा भिनुसार।

दोहा 207

सघन चोर मग मुदित मन धनी गही ज्यों फेंट।

त्यों सुग्रीव बिभीषनहिं भई भरतकी भेंट।

दोहा 208

राम सराहे भरत उठि मिले राम सम जानि।

तदपि बिभीषन कीसपति तुलसी गरत गलानि।।

दोहा 209

भरत स्याम तन राम सम सब गुन रूप् निधान।

सेवक सुखदायक सुलभ सुमिरत सब कल्यान।

दोहा 210

ललित लखन मुरति मधुर सुमिरहु सहित सनेह।

सुख संपति कीरति बिजय सगुन सुमंगल गेह।

दोहा 211

नाम सत्रुसूदन सुभग सुषमा सील निकेत।

सेवत सुमिरत सुलभ सुख सकल सुमंगल देत।

दोहा 212

कौसल्या कल्यानमइ मूरति करत प्रनाम ।

सगुन सुमंगल काज सुभ कृपा करहिं सियराम।

दोहा 213

सुमिरि सुमित्रा नाम जग जे तिय लेहिं सनेम।

सुअन लखन रिपुदवन से पावहिं पति पद प्रेम।

दोहा 214

सीताचरन प्रनाम करि सुमिरि सुनाम सुनेम।

होहिं तीय पतिदेवता प्राननाथ प्रिय प्रेम।

दोहा 215

तुलसी केवल कामतरू राचरित आराम।

कलितरू कपि निसिचर कहत हमहिं किये बिधि बाम।

दोहा 216

मातु सकल सानुज भरत गुरू पुर लोग सुभाउ।

देखत देख न कैकइहि लंकापति कपिराउ।

दोहा 217

सहज सरल रघुबर बचन कुमति कुटिल करि जान।

चलइ जोंक जल बक्रगति जद्यपि सलिलु समान।

दोहा 218

दसरथ नाम सुकामतरू फलइ सकल कल्यान।

धरनि धाम धन धरम सुत सदगुन रूप निधान।

दोहा 219

तुलसी जान्यो दसरथहिं न सत्य समान।

रामु तजे जेहि लागि बिनु राम परिहरे प्रान।

दोहा 220

राम बिरहँ दसरथ मरन मुनि मन अगम सुमीचु ।

तुलसी मंगल मरन तरू सुचि सनेह जल सींचु।

दोहा 221

जीवन मरन सुनाम जैसें दसरथ राय को।

जियत खिलाए राम राम बिरहँ तनु परिहरेउ।

दोहा 222

श्री प्रभुहिं बिलोकत गोद गत सिय हिय घायल नीचु।

तुलसी पाई गीधपति मुकुति मनोहर मीचु।

दोहा 223

बिरत करम रत भगत मुनि सिद्ध ऊँच अरू नीचु।

तुलसी सकल सिहात सुनि गीधराज की मीचु।

दोहा 224

मुए मरत मरिहैं सकल घरी पहरके बीचु।

लही न काहूँ आजु लौं गीधराज की मीचु।

दोहा 225

मुएँ मुकुत जीवत मुकुत मुकुत मुकुत हुँ बीचु।

तुलसी सबहे तें अधिक गीधराज की मीचु।

दोहा 226

रघुवर बिकल बिहंग सो बिलोकि दोउ बीर।

सिय सुधि कहि सिय राम कहि देह तजी मति धीर।

दोहा 227

दसरथ तें दसगुन भगति सहित तासु करि काजु।

सोचत बंधु समेत प्रभु कृपासिंधु रघुराजु।

दोहा 228

केवट निसिचर बिहग मृग किए साधु सनमानि।

तुलसी रघुबर की कृपा सकल सुमंगल खानि।

दोहा 229

मंजुल मंगल मोदमय मूरति मारूत पूत।

सकल सिद्धि कर कमल तल सुमिरत रघुबर दूत।

दोहा 230

धीर बीर रघुबीर प्रिय सुमिर समीर कुमारू।

अगम सुगम सब काज करू करतल सिद्धि बिचारू।

दोहा 231

सुख मुद मंगल कुमुद बिधु सुगुन सरोरूह भानु।

करहु काज सब सिद्धि सुभ आनि हिएँ हनुमानु।

दोहा 232

सकल काज सुभ समउ भल सगुन सुमंगल जानु।

कीरति बिजय बिभूति भलि हियँ हनुमानहि आनु।

दोहा 233

सूर सिरोमनि साहसी सुमति समीर कुमार।

सुमिरत सब सुख संपदा मुद मंगल दातार।

दोहा 234

तुलसी तनु सर सुख जलज भुज रूज गज बरजोर।

दलत दयानिधि देखिये कपि केसरी किसोर।

दोहा 235

भुज तरू कोटर रोग अहि बरबस कियो प्रवेस।

बिहगराज बाहन तुरत काढ़िअ मिटै कलेस।

दोहा 236

बाहु बिटप सुख बिहँग थलु लगी कुपीर कुआगि।

राम कृपा जल सींचिऐ बेगि दीन हित लागि।

दोहा 237

मुक्ति जन्म महि जानि ग्यान खानि अघ हाति कर।

जहँ बस संभु भवानि सो कासी सेइअ कस न।

दोहा 238

जरत सकल सुर बृंद सुर बृंद बिषम गरल जेहिं पान किय।

तेहि न भजसि मन मंद को कृपालु संकर सरिस।

दोहा 239

बासर ढासनि के ढका रजनीं चहुँ दिसि चोर।

संकर निज पुर राखिऐ चितै सुलोचन कोर।

दोहा 240

अपनी बीसीं आपुहीं पुरिहिं लगाए हाथ।

केहि बिधि बिनती बिस्व की करौं बिस्व के नाथ।

दोहा 241

और करै अपरधु कोउ और पाव फल भोगु।

अति बिचित्र भगवंत गति को जग जानै जोगु।

दोहा 242

प्रेम सरीर प्रपंच रूज उपजी अधिक उपाधि।

तुलसी भली सुबैदई बेगि बाँधिऐ ब्याधि।

दोहा 243

हम हमार आचार बड़ भूरि भार धरि सीस।

हठि सठ परबस परत जिमि कीर कोस कृमि कीस।

दोहा 244

केहिं मग प्रबिसति जाति केहिं कहु दरपनमें छाहँ।

तुलसी ज्यों जगजीव गति करी जीव के नाहँ।

दोहा 245

सुखसागर सुख नींद बस सपने सब करतार।

माया माया नाथ की को जग जाननिहार।

दोहा 246

जीव सीव सम सुख सयन सपनें कछु करतूति।

जागत दीन मलीन सोइ बिकल बिषाद बिभूति।

दोहा 247

सपनें होइ भिखारि नृपु रंकु नाकपति होइ।

जागें लाभु न हानि कछु तिमि प्रपंच जियँ जोइ।

दोहा 248

तुलसी देखत अनुभवत सुनत न समुझत नीच।

चपरि चपेटे देत नित केस गहें कर मीच।

दोहा 249

करम खरी कर मोह थल अंक चराचर जाल।

हनत गुनत गनि गुनि हनत जगत ज्यौतिषी काल।

दोहा 250

कहिबे कहँ रसना रची सुनिबे कहँ किये कान ।

धरिबे कहँ चित हित सहित परमारथहि सुजान।

भाग-6 (दोहा संख्या 251 से 300)