श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
दोहावली · गोस्वामी तुलसीदास

भाग 6

दोहावली · भाग 6
दोहा 251

ग्यान कहै अग्यान बिनु तम बिनु कहै प्रकास।

निरगुन कहै जो सगुन बिनु सो गुरू तुलसीदास।

दोहा 252

अंक अखुन आखर सगुन समुझिअ उभय प्रकार।

खोएँ राखें आपु भल तुलसी चारू बिचार।

दोहा 253

परमारथ पहिचानि मति लसति बिषयँ लपटानि।

निकसि चिता तें अधजरित मानहुँ सती परानि।

दोहा 254

सीस उघारन किन कहेउ बरजि रहे प्रिय लोग।

घरहीं सती कहावती जरती नाह बियोग।।

दोहा 255

खरिया खरी कपूर सब उचित न पिय तिय त्याग।

कै खरिया मोहि मेलि कै बिमल बिबेक बिराग।

दोहा 256

घर कीन्हें घर जात है घर छाँडे़ घर जाइ।

तुलसी घर बन बीचहीं राम प्रेम पुर छाइ।

दोहा 257

दिएँ पीठि पाछें लगै सनमुख होत पराइ।

तुलसी संपति छाँह ज्यों लखि दिन बैठि गँवाइ।

दोहा 258

तुलसी अद्भुत देवता आसा देवी नाम।

सेएँ सोक समर्पई बिमुख भएँ अभिराम।

दोहा 259

सोई सेंवर तेइ सुवा सेवत सदा बसंत ।

तुलसी महिमा मोह की सुनत सराहत संत।

दोहा 260

करत न समुझत झूठ गुन सुन होत मति रंक।

पारद प्रकट प्रपंचमय सिद्धिउ नाउँ कलंक।

दोहा 261

ग्यानी तापस सूर कबि कोबिद मुन आगार।

केहि कै लोभ बिडंबना कीन्हि न एहिं संसार।

दोहा 262

श्री मद बक्र न कीन्ह केहि प्रभुता बधिर न काहि।

मृगलोचनि के नेन सर को अस लाग न जाहि।

दोहा 263

ब्यापि रहेउ संसार महुँ माया कटक प्रचंड।

सेनापति कामादि भट दंभ कपट पाषंड।

दोहा 264

तात तीनि अति प्रबल खल काम क्रोध अरू लोभ।

मुनि बिग्यान धम मन करहिं निमिष महुँ छोभ।

दोहा 265

लोभ के इच्छा दंभ बल काम के केवल नारि।

क्रोध कें परूष बचन बल मुनिबर कहहिं बिचारि।

दोहा 266

काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह कै धारि।

तिन्ह महँ अति दाश्न दुखद मायारूपी नारि।

दोहा 267

काह न पावक जारि सक का न समुद्र समाइ।

का न करै अबला केहि जग कालु न खाइ।

दोहा 268

जनमपत्रिका बरति कै देखहु मनहिं बिचारि।

दारून बैरी मीचु के बिच बिराजति नारि।

दोहा 269

दीपसिखा सम जुबति तनम न जनि होसि पतंग।

भजहि राम तजि काम मद करहि सदा सतसंग।

दोहा 270

काम क्रोध मद लोभ रत गृहासत्त दुखरूप।

ते किमि जानहिं रघपवतिह मूढ़ परे भवकूप।

दोहा 271

ग्रह ग्रहीत पुनि बात बस तेहि पुनि बीछी मार।

तेहि पिआइअ बारूनी कहहु काह उपचार।

दोहा 272

ताहि के संपति सगुन सुभ सपनेहुँ मन बिश्राम।

भूत द्रोह रत माहबस राम बिमुख रति काम।

दोहा 273

कहत कठिन समुझत कठिन साधक कठिन बिबेक।

होइ घुनाच्छर न्याय जौं पुनि प्रत्यूह अनेक।

दोहा 274

खल प्रबोध जग सोधमन को निरोध कुलनसोध करह।

ते फोकट पचि मरहिं सपनेहुँ सुख न सुबोध।

दोहा 275

कोउ बिश्राम कि पव तात सहज संतोष बिनु।

चलै कि जल बिनु नाव कोटि जतन पचि पचि मरिअ।

दोहा 276

सुर नर मुनि कोउ नाहिं जेहि न मोह माया प्रबल।

अस बिचारि मन माहिं भजिअ महामाया पतिहि।

दोहा 277

एक भरोसो एक बल एक आस बिस्वास।

एक राम घन स्याम हित चातक तुलसीदास।

दोहा 278

जौं घन बरषै समय सिर जौं भरि जनम उदास।

तुलसी या चित चातकहि तऊ तिहारी आस।

दोहा 279

चातक तुलसी के मतें स्वातिहुँ पिऐ न पानि।

प्रेम तृषा बाढ़ति भली घटें घटैगी आनि।

दोहा 280

रटत रटत रसना लटी तृषा सूखि गे अंग ।

तुलसी चातक प्रेम को नित नूतन रूचि रंग।

दोहा 281

चढ़त न चातक चित कबहुँ प्रिय पयोद के दोष ।

तुलसी प्रेम प्योधि की ताते नाम न जोख।

दोहा 282

बरसि परूष पाहन पयद पंख करौ टुक टूक।

तुलसी परी न चाहिऐ चतुर चातकहि चूक।।

दोहा 283

उपल बरसि गरजत तरजि डारत कुलिस कठोर।

चितव कि चातक मेघ तजि कबहुँ दूसरी ओर।

दोहा 284

पबि पाहन दामिनी गरज झरि झकोर खरि खीझि।

रोष न प्रीतम दोष लखि तुलसी रागहि रीझि।

दोहा 285

मान राखिबो माँगिबो पिय सों नित नव नेहु।

तुलसी तीनिउ तब फबैं जौं चातक मन लेहु।

दोहा 286

तुलसी चातक की फबै मान राखिबो प्रेम।

बक्र बुंद लखि स्वातिहू निदरि निबाहत नेम।

दोहा 287

तुलसी चातक माँगनो एक उक घन दानि।

देत जो भू भाजन भरत लेत जतो घँूटक पानि।

दोहा 288

तीनि लोक तिहुँ काल जस चातक ही के माथ।

तुसी जासु न दीनता सुनी दूसरे नाथ।

दोहा 289

प्रीति पपीहा पयद की प्रगट नई पहिचानि।

जाचक जगत कनाउड़ो कियो कनौड़ा दानि।

दोहा 290

नहिं जाचक नहिं सेग्रही सीस नाइ नहिं लेइ।

ऐसे मानी मागनेहि को बारिद बिन देइ।

दोहा 291

को को न ज्यायो जगत में जीवन दायक दानि।

भयो कनोड़ो जाचकहि पयद प्रेम पहिचानि।

दोहा 292

साधन साँसति सब सहत सबहि सुखद फल लाहु।

तुलसी चातक जलद की रिझि बूझि बुध काहु।

दोहा 293

चातक जीवल दायकहि जीवन समयँ सुरीति।

तुलसी अलख न लखि परै चातक प्रीति प्रतीति।

दोहा 294

जीव चराचर जहँ लगे हैं सब को हित मेह ।

तुलसी चातक मन बस्यो घन सों सहत सनेह।

दोहा 295

डोलत बिपुल बिहंग बन पिअत पोखरिन बारि।

सुजस धवल चातक नवल तुही भुवन दस चारि।

दोहा 296

मुख मीठे मानस मलिन कोकिल मोर चकोर।

सुजस धवल चातक नवल रह्यो भुवन भति तोर।

दोहा 297

बास बेसि बोलनि चलनि मानस मंजु मराल।

तुलसी चातक प्रेम की कीरति बिसद बिसाल।

दोहा 298

प्रेम न परखिअ परूष्पन प्यद सिखावन एह।

जग कह चातक पातकी ऊसर बरसै मेह।

दोहा 299

होइ न चातक पातकी जीवन दानि न मूढ़।

तुलसी गति प्रहलाद की समुझि प्रेम पथ गूढ़।

दोहा 300

गरज आपनी सबन को गरज करत उर आनि।

तुलसी चातक चतुर भो जाचक जानि सुदानि।

भाग-7 (दोहा संख्या 301 से 350)