भाग 6
ग्यान कहै अग्यान बिनु तम बिनु कहै प्रकास।
निरगुन कहै जो सगुन बिनु सो गुरू तुलसीदास।
अंक अखुन आखर सगुन समुझिअ उभय प्रकार।
खोएँ राखें आपु भल तुलसी चारू बिचार।
परमारथ पहिचानि मति लसति बिषयँ लपटानि।
निकसि चिता तें अधजरित मानहुँ सती परानि।
सीस उघारन किन कहेउ बरजि रहे प्रिय लोग।
घरहीं सती कहावती जरती नाह बियोग।।
खरिया खरी कपूर सब उचित न पिय तिय त्याग।
कै खरिया मोहि मेलि कै बिमल बिबेक बिराग।
घर कीन्हें घर जात है घर छाँडे़ घर जाइ।
तुलसी घर बन बीचहीं राम प्रेम पुर छाइ।
दिएँ पीठि पाछें लगै सनमुख होत पराइ।
तुलसी संपति छाँह ज्यों लखि दिन बैठि गँवाइ।
तुलसी अद्भुत देवता आसा देवी नाम।
सेएँ सोक समर्पई बिमुख भएँ अभिराम।
सोई सेंवर तेइ सुवा सेवत सदा बसंत ।
तुलसी महिमा मोह की सुनत सराहत संत।
करत न समुझत झूठ गुन सुन होत मति रंक।
पारद प्रकट प्रपंचमय सिद्धिउ नाउँ कलंक।
ग्यानी तापस सूर कबि कोबिद मुन आगार।
केहि कै लोभ बिडंबना कीन्हि न एहिं संसार।
श्री मद बक्र न कीन्ह केहि प्रभुता बधिर न काहि।
मृगलोचनि के नेन सर को अस लाग न जाहि।
ब्यापि रहेउ संसार महुँ माया कटक प्रचंड।
सेनापति कामादि भट दंभ कपट पाषंड।
तात तीनि अति प्रबल खल काम क्रोध अरू लोभ।
मुनि बिग्यान धम मन करहिं निमिष महुँ छोभ।
लोभ के इच्छा दंभ बल काम के केवल नारि।
क्रोध कें परूष बचन बल मुनिबर कहहिं बिचारि।
काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह कै धारि।
तिन्ह महँ अति दाश्न दुखद मायारूपी नारि।
काह न पावक जारि सक का न समुद्र समाइ।
का न करै अबला केहि जग कालु न खाइ।
जनमपत्रिका बरति कै देखहु मनहिं बिचारि।
दारून बैरी मीचु के बिच बिराजति नारि।
दीपसिखा सम जुबति तनम न जनि होसि पतंग।
भजहि राम तजि काम मद करहि सदा सतसंग।
काम क्रोध मद लोभ रत गृहासत्त दुखरूप।
ते किमि जानहिं रघपवतिह मूढ़ परे भवकूप।
ग्रह ग्रहीत पुनि बात बस तेहि पुनि बीछी मार।
तेहि पिआइअ बारूनी कहहु काह उपचार।
ताहि के संपति सगुन सुभ सपनेहुँ मन बिश्राम।
भूत द्रोह रत माहबस राम बिमुख रति काम।
कहत कठिन समुझत कठिन साधक कठिन बिबेक।
होइ घुनाच्छर न्याय जौं पुनि प्रत्यूह अनेक।
खल प्रबोध जग सोधमन को निरोध कुलनसोध करह।
ते फोकट पचि मरहिं सपनेहुँ सुख न सुबोध।
कोउ बिश्राम कि पव तात सहज संतोष बिनु।
चलै कि जल बिनु नाव कोटि जतन पचि पचि मरिअ।
सुर नर मुनि कोउ नाहिं जेहि न मोह माया प्रबल।
अस बिचारि मन माहिं भजिअ महामाया पतिहि।
एक भरोसो एक बल एक आस बिस्वास।
एक राम घन स्याम हित चातक तुलसीदास।
जौं घन बरषै समय सिर जौं भरि जनम उदास।
तुलसी या चित चातकहि तऊ तिहारी आस।
चातक तुलसी के मतें स्वातिहुँ पिऐ न पानि।
प्रेम तृषा बाढ़ति भली घटें घटैगी आनि।
रटत रटत रसना लटी तृषा सूखि गे अंग ।
तुलसी चातक प्रेम को नित नूतन रूचि रंग।
चढ़त न चातक चित कबहुँ प्रिय पयोद के दोष ।
तुलसी प्रेम प्योधि की ताते नाम न जोख।
बरसि परूष पाहन पयद पंख करौ टुक टूक।
तुलसी परी न चाहिऐ चतुर चातकहि चूक।।
उपल बरसि गरजत तरजि डारत कुलिस कठोर।
चितव कि चातक मेघ तजि कबहुँ दूसरी ओर।
पबि पाहन दामिनी गरज झरि झकोर खरि खीझि।
रोष न प्रीतम दोष लखि तुलसी रागहि रीझि।
मान राखिबो माँगिबो पिय सों नित नव नेहु।
तुलसी तीनिउ तब फबैं जौं चातक मन लेहु।
तुलसी चातक की फबै मान राखिबो प्रेम।
बक्र बुंद लखि स्वातिहू निदरि निबाहत नेम।
तुलसी चातक माँगनो एक उक घन दानि।
देत जो भू भाजन भरत लेत जतो घँूटक पानि।
तीनि लोक तिहुँ काल जस चातक ही के माथ।
तुसी जासु न दीनता सुनी दूसरे नाथ।
प्रीति पपीहा पयद की प्रगट नई पहिचानि।
जाचक जगत कनाउड़ो कियो कनौड़ा दानि।
नहिं जाचक नहिं सेग्रही सीस नाइ नहिं लेइ।
ऐसे मानी मागनेहि को बारिद बिन देइ।
को को न ज्यायो जगत में जीवन दायक दानि।
भयो कनोड़ो जाचकहि पयद प्रेम पहिचानि।
साधन साँसति सब सहत सबहि सुखद फल लाहु।
तुलसी चातक जलद की रिझि बूझि बुध काहु।
चातक जीवल दायकहि जीवन समयँ सुरीति।
तुलसी अलख न लखि परै चातक प्रीति प्रतीति।
जीव चराचर जहँ लगे हैं सब को हित मेह ।
तुलसी चातक मन बस्यो घन सों सहत सनेह।
डोलत बिपुल बिहंग बन पिअत पोखरिन बारि।
सुजस धवल चातक नवल तुही भुवन दस चारि।
मुख मीठे मानस मलिन कोकिल मोर चकोर।
सुजस धवल चातक नवल रह्यो भुवन भति तोर।
बास बेसि बोलनि चलनि मानस मंजु मराल।
तुलसी चातक प्रेम की कीरति बिसद बिसाल।
प्रेम न परखिअ परूष्पन प्यद सिखावन एह।
जग कह चातक पातकी ऊसर बरसै मेह।
होइ न चातक पातकी जीवन दानि न मूढ़।
तुलसी गति प्रहलाद की समुझि प्रेम पथ गूढ़।
गरज आपनी सबन को गरज करत उर आनि।
तुलसी चातक चतुर भो जाचक जानि सुदानि।
भाग-7 (दोहा संख्या 301 से 350)