श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
दोहावली · गोस्वामी तुलसीदास

भाग 7

दोहावली · भाग 7
दोहा 301

चरग चंगु गत चातकहि नेम प्रेम की पीर ।

तुलसी परबस हाड़ पर परिहैं पुहुमी नीर।

दोहा 302

बध्यो बधिक पर्यो पुन्य जल उलटि उठाई चोंच।

तुलसी चातक प्रेमपट मरतहुँ लगी न खोंच।

दोहा 303

अंड फोरि कियो चेटुवा तुष पर्यो नीर निहारि।

गहि चंगुल चातक चतुर डार्यो बाहिर बारि।।

दोहा 304

तुलसी चातक देति सिख सुतहिं बारहीं बार।

तात न तर्पन कीजिऐ बिना बारिधर धार।

दोहा 305

जिअत न नाई नारि चातक घन तजि दूसरहि।

सुरसरिहू को बारि मरत माँगेउ अरध जल।

दोहा 306

सुनु रे तुलसीदस प्यास पपीहहि प्रेम की।

परिहरि चारिउ मास जो अँचवै जल स्वाति को।

दोहा 307

जाचै बारह मास पिऐ पपीहा स्वाति जल ।

जान्यों तुलसीदास जोगवत नेही नेह मन।

दोहा 308

तुलसीं के मत चातकहि केवल प्रेम पिआस ।

पिअत स्वाति जल जान जग जाँचत बारह मास।

दोहा 309

आलबाल मुकुताहलनि हिय सनेह तरू मूल।

होइ हेतु चित चातकहि स्वाति सलिलु अनुकूल।

दोहा 310

उष्न काल अरू देह खिन मग पंथी तन ऊख।

चातक बतियाँ न रूचीं अन जल सींचे रूख।

दोहा 311

अन जल सींचे रूख की छाया तें बरू घाम।

तुलसी चातक बहुत हैं यह प्रबीन को काम।

दोहा 312

एक अंग जो सनेहता निसि दिन चातक नेह।

तुलसी जासेंा हित जगै वहि अहार वहि देह।

दोहा 313

बिबि रसना तनु स्याम है बंक चननि बिष खानि।

तुलसी जस श्रवननि सुन्यो समरप्यो आनि।

दोहा 314

आपु ब्याध को रूप धरि कुहौ कुरंगहि राग।

तुलसी जो मृग मन मुरै परै प्रेम पट दाग।

दोहा 315

तुलसी मनि निज दुति फनिहि ब्याधहि देउ दिखाइ।

बिछुरत होइ न आँधरो ताते प्रेम न जाइ।

दोहा 316

जरत तुहिन लखि बनज बन रबि दै पीठि पराउ।

उदय बिकस अथवत सकुच मिटै न सहज सुभाउ।

दोहा 317

देउ आपनें हाथ जल मीनहि माहुर घोरि।

तुलसी जिये जो बारि बिनु तौ तु देहि कबि खोरि।

दोहा 318

मकर उरग दादुर कमठ जल जीवन जल गेह।

तुलसी एकै मीन को है साँचिलो सनेह।

दोहा 319

तुलसी मिटे न मरि मिटेहुँ साँचो सहज सनेह।

मोरसिखा बिनु मूरिहूँ पलुहत गरजत मेह।

दोहा 320

सुलभ प्रीति प्रीतम सबै कहत करत सब कोइ।

तुलसी मीन पुनीत ते त्रिभुवन बड़ो न कोइ।

दोहा 321

तुलसी जप तप नेम ब्रत सब सबहीं तें होइ।

लहै बड़ाई देवता इष्टदेव जब होइ।

दोहा 322

कुदिन हितू सो हित सुदिन हित अनहित किन होइ।

ससि छबि हर रबि सदन तउ मित्र कहत सब कोइ।

दोहा 323

कै लघुकै बड़ मीत भल सम सनेह दुख सोइ।

तुलसी ज्यों घृत मधु सरिस मिलें महाबिष होइ।

दोहा 324

मान्य मीन सो सुख चहैं सो न छुऐ छल छाहँ।

ससि त्रिसंकु कैकेइ गति लखि तुलसी मन माहँ।

दोहा 325

कहिअ कठिन कृत कोमलहुँ हित हठि होइ सहाइ।

पलक पानि पर ओड़ियत समुझि कुघाइ सुघाइ।

दोहा 326

तुलसी बैर सनेह दोउ रहित बिलोचन चारि।

सुरा सेवरा आदरहिं निंदहिं सुरसरि बारि।

दोहा 327

रूचै मागनेहि मागिबो तुलसी दानिहि दानु।

आलस अनख न आचरज प्रेम पिहानी जानु।

दोहा 328

अमिय गारि गारेउ गरल गारि कीन्ह करतार।

प्रेम बैर की जननि जुग जानहिं बुध न गवाँर।

दोहा 329

सदा न जे सुमिरत रहहिं मिलि न कहरिं प्रिय बैन।

ते पै तिन्ह के जाहिं घर जिन्ह के हिएँ न नैन।

दोहा 330

हित पुनीत सब स्वाथिहिं अरि असुद्ध बिनु चाड़।

निज मुख मानिक सम दसन भूमि परे ते हाड़।

दोहा 331

माखी काक उलूक बक दारुर से भये लोग।

भले ते सुक कपक मोरसे कोउ न प्रेम पथ जोग।

दोहा 332

हृदय कपट बर बेष धरि बचन कहहिं गढ़ि छोलि।

अब के लोग मयूर ज्यों क्यों मिलिए मन खोलि।

दोहा 333

चरन चोंच लोचन रँगौ चलौ मराली चाल।

छीर नीर बिबरन समय बक उघरत तेहि काल।।

दोहा 334

मिलै जो सरलहि सरल ह्वै कुटिल न सहज बिहाइ।

सो सहेतु ज्यों बक्र गति ब्याल न बिलहिं समाइ।।

दोहा 335

कूसधन सखहि न देब दुख मुएहुँ न मागब नीच।

तुलसी सज्जन की रहनि पावकपानी बीच।।

दोहा 336

संग सरल कुटिलहि भएँ हरि हर करहिं निबाहु ।

ग्रह गनती गनि चतुर बिधि कियो उदर बिनु राहु।।

दोहा 337

नीच निखई रनहिं तजइ सज्जनहू कें संग।

तुलसी चंदन बिटप बसि बिनु बिष भए न भुअंग।

दोहा 338

भलो भलाइहि पै लहै लहइ निचाइहि नीचु।

सुधा सराहिअ अमरताँ गरल सराहिअ मीचु।

दोहा 339

मिथ्या माहुर सज्जनहि गरल सम साँच।

तुलसी छुअत पराइ ज्यों पारद पावक आँच।

दोहा 340

संत संग अपबर्ग कर कामी भव कर पंथ।

कहहिं संत कबि कोबिद श्रुति पुरान कदग्रंथ।

दोहा 341

सुकृत न सुकृती परिहरइ कपट न कपटी नीच।

मरत सिखावन देइ चले गीधराज मारीच।

दोहा 342

सुजन सुतरू बन ऊख सम खल टंकिका रूखन।

परहित बनहित लागि सब साँसति सहज समान।

दोहा 343

पिअहिं सुमन रस अलि बिटप काटि कोल फल खात।

तुलसी तरूजीवी जुगल सुमति कुमति की बात।

दोहा 344

अवसर कौड़ी जो चुकै बहुरि दिएँ का लाख।

दुइज न चंदा दखिऐ उदौ कहा भरि पाख।

दोहा 345

ग्यान अनभले को सबहि भले भलेहू काउ।

सींग सूँड़ रद लूम नख करत जीव जड़ घाउ।

दोहा 346

तुलसी जग जीवन अहित कतहुँ कोउ हित जानि।

सोषक भानु कृसानु महि पवन एक घन दानि।

दोहा 347

सुनिअ सुधा देखिअहिं गरल सब करतुति कराल।

जहँ तहँ काक उलूक बक मानस सकृत मराल।

दोहा 348

जलचर थल चर गगनचर देव दनुज नर नाग।

उत्तम मध्यम अधम खल दस गुन बढ़त बिभाग।

दोहा 349

बलि मिस देखे देवता कर क मिस मानव देव।

मुए मार सुबिचार हत स्वारथ साधन एव।

दोहा 350

सुजन कहत भल पोच पथ पापि न परखइ भेद।

करमनास सुरसरित मिस बिधि निषेध बद बेद।

भाग-8 (दोहा संख्या 351 से 400)