भाग 7
चरग चंगु गत चातकहि नेम प्रेम की पीर ।
तुलसी परबस हाड़ पर परिहैं पुहुमी नीर।
बध्यो बधिक पर्यो पुन्य जल उलटि उठाई चोंच।
तुलसी चातक प्रेमपट मरतहुँ लगी न खोंच।
अंड फोरि कियो चेटुवा तुष पर्यो नीर निहारि।
गहि चंगुल चातक चतुर डार्यो बाहिर बारि।।
तुलसी चातक देति सिख सुतहिं बारहीं बार।
तात न तर्पन कीजिऐ बिना बारिधर धार।
जिअत न नाई नारि चातक घन तजि दूसरहि।
सुरसरिहू को बारि मरत माँगेउ अरध जल।
सुनु रे तुलसीदस प्यास पपीहहि प्रेम की।
परिहरि चारिउ मास जो अँचवै जल स्वाति को।
जाचै बारह मास पिऐ पपीहा स्वाति जल ।
जान्यों तुलसीदास जोगवत नेही नेह मन।
तुलसीं के मत चातकहि केवल प्रेम पिआस ।
पिअत स्वाति जल जान जग जाँचत बारह मास।
आलबाल मुकुताहलनि हिय सनेह तरू मूल।
होइ हेतु चित चातकहि स्वाति सलिलु अनुकूल।
उष्न काल अरू देह खिन मग पंथी तन ऊख।
चातक बतियाँ न रूचीं अन जल सींचे रूख।
अन जल सींचे रूख की छाया तें बरू घाम।
तुलसी चातक बहुत हैं यह प्रबीन को काम।
एक अंग जो सनेहता निसि दिन चातक नेह।
तुलसी जासेंा हित जगै वहि अहार वहि देह।
बिबि रसना तनु स्याम है बंक चननि बिष खानि।
तुलसी जस श्रवननि सुन्यो समरप्यो आनि।
आपु ब्याध को रूप धरि कुहौ कुरंगहि राग।
तुलसी जो मृग मन मुरै परै प्रेम पट दाग।
तुलसी मनि निज दुति फनिहि ब्याधहि देउ दिखाइ।
बिछुरत होइ न आँधरो ताते प्रेम न जाइ।
जरत तुहिन लखि बनज बन रबि दै पीठि पराउ।
उदय बिकस अथवत सकुच मिटै न सहज सुभाउ।
देउ आपनें हाथ जल मीनहि माहुर घोरि।
तुलसी जिये जो बारि बिनु तौ तु देहि कबि खोरि।
मकर उरग दादुर कमठ जल जीवन जल गेह।
तुलसी एकै मीन को है साँचिलो सनेह।
तुलसी मिटे न मरि मिटेहुँ साँचो सहज सनेह।
मोरसिखा बिनु मूरिहूँ पलुहत गरजत मेह।
सुलभ प्रीति प्रीतम सबै कहत करत सब कोइ।
तुलसी मीन पुनीत ते त्रिभुवन बड़ो न कोइ।
तुलसी जप तप नेम ब्रत सब सबहीं तें होइ।
लहै बड़ाई देवता इष्टदेव जब होइ।
कुदिन हितू सो हित सुदिन हित अनहित किन होइ।
ससि छबि हर रबि सदन तउ मित्र कहत सब कोइ।
कै लघुकै बड़ मीत भल सम सनेह दुख सोइ।
तुलसी ज्यों घृत मधु सरिस मिलें महाबिष होइ।
मान्य मीन सो सुख चहैं सो न छुऐ छल छाहँ।
ससि त्रिसंकु कैकेइ गति लखि तुलसी मन माहँ।
कहिअ कठिन कृत कोमलहुँ हित हठि होइ सहाइ।
पलक पानि पर ओड़ियत समुझि कुघाइ सुघाइ।
तुलसी बैर सनेह दोउ रहित बिलोचन चारि।
सुरा सेवरा आदरहिं निंदहिं सुरसरि बारि।
रूचै मागनेहि मागिबो तुलसी दानिहि दानु।
आलस अनख न आचरज प्रेम पिहानी जानु।
अमिय गारि गारेउ गरल गारि कीन्ह करतार।
प्रेम बैर की जननि जुग जानहिं बुध न गवाँर।
सदा न जे सुमिरत रहहिं मिलि न कहरिं प्रिय बैन।
ते पै तिन्ह के जाहिं घर जिन्ह के हिएँ न नैन।
हित पुनीत सब स्वाथिहिं अरि असुद्ध बिनु चाड़।
निज मुख मानिक सम दसन भूमि परे ते हाड़।
माखी काक उलूक बक दारुर से भये लोग।
भले ते सुक कपक मोरसे कोउ न प्रेम पथ जोग।
हृदय कपट बर बेष धरि बचन कहहिं गढ़ि छोलि।
अब के लोग मयूर ज्यों क्यों मिलिए मन खोलि।
चरन चोंच लोचन रँगौ चलौ मराली चाल।
छीर नीर बिबरन समय बक उघरत तेहि काल।।
मिलै जो सरलहि सरल ह्वै कुटिल न सहज बिहाइ।
सो सहेतु ज्यों बक्र गति ब्याल न बिलहिं समाइ।।
कूसधन सखहि न देब दुख मुएहुँ न मागब नीच।
तुलसी सज्जन की रहनि पावकपानी बीच।।
संग सरल कुटिलहि भएँ हरि हर करहिं निबाहु ।
ग्रह गनती गनि चतुर बिधि कियो उदर बिनु राहु।।
नीच निखई रनहिं तजइ सज्जनहू कें संग।
तुलसी चंदन बिटप बसि बिनु बिष भए न भुअंग।
भलो भलाइहि पै लहै लहइ निचाइहि नीचु।
सुधा सराहिअ अमरताँ गरल सराहिअ मीचु।
मिथ्या माहुर सज्जनहि गरल सम साँच।
तुलसी छुअत पराइ ज्यों पारद पावक आँच।
संत संग अपबर्ग कर कामी भव कर पंथ।
कहहिं संत कबि कोबिद श्रुति पुरान कदग्रंथ।
सुकृत न सुकृती परिहरइ कपट न कपटी नीच।
मरत सिखावन देइ चले गीधराज मारीच।
सुजन सुतरू बन ऊख सम खल टंकिका रूखन।
परहित बनहित लागि सब साँसति सहज समान।
पिअहिं सुमन रस अलि बिटप काटि कोल फल खात।
तुलसी तरूजीवी जुगल सुमति कुमति की बात।
अवसर कौड़ी जो चुकै बहुरि दिएँ का लाख।
दुइज न चंदा दखिऐ उदौ कहा भरि पाख।
ग्यान अनभले को सबहि भले भलेहू काउ।
सींग सूँड़ रद लूम नख करत जीव जड़ घाउ।
तुलसी जग जीवन अहित कतहुँ कोउ हित जानि।
सोषक भानु कृसानु महि पवन एक घन दानि।
सुनिअ सुधा देखिअहिं गरल सब करतुति कराल।
जहँ तहँ काक उलूक बक मानस सकृत मराल।
जलचर थल चर गगनचर देव दनुज नर नाग।
उत्तम मध्यम अधम खल दस गुन बढ़त बिभाग।
बलि मिस देखे देवता कर क मिस मानव देव।
मुए मार सुबिचार हत स्वारथ साधन एव।
सुजन कहत भल पोच पथ पापि न परखइ भेद।
करमनास सुरसरित मिस बिधि निषेध बद बेद।
भाग-8 (दोहा संख्या 351 से 400)