श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
दोहावली · गोस्वामी तुलसीदास

भाग 8

दोहावली · भाग 8
दोहा 351

मनि भाजन मधु पारई पूरन अमी निहारि।

का छाँड़िअ का संग्रहिअ कहहु बिबेक बिचारि।

दोहा 352

उत्तम मध्यम नीच गति पाहन सिकता पानि।

प्रीति परिच्छा तिहुन की बैर बितिक्रम जानि।

दोहा 353

पुन्य प्रीति पति प्रापतिउ परमारथ पथ पाँच।

लहहिं सुजन परिहरहिं खल सुनहु सिखवन साँच।

दोहा 354

नीच निरादरहीं सुखद आदर सुखद बिसाल।

करदी बदरी बिटप गति पेखहु पनस रसाल।

दोहा 355

तुलसी अपनो आचरन भलो न लागत कासु।

तेहि न बसात जो खात नित लहसुनहू को बासु।

दोहा 356

बुध से बिबेकी बिमलमति जिन्ह कें रोष न राग।

सुहृदय सराहत साधु जेहि तुलसी ताको भाग।

दोहा 357

आपु आपु कहँ सब भलो अपने कहँ कोइ कोइ।

तुलसी सब कहँ जो भलो सुजन सराहिअ सोइ।

दोहा 358

तुलसी भलो सुसंग तें पोच कुसंगति सोइ।

नाउ किंनरी तीर असि लोह बिलोकहु लोइ।

दोहा 359

गुरू संगति गुरू होइ सो लघु संगति लघुनाम ।

चार पदारथ में गनैं नकि द्वारहू काम।

दोहा 360

तुलसी गुरू लघुतालहत लघुसंगति परिनाम ं।

देवी देव पुकाअित नीच नारि नर नाम।

दोहा 361

तुलसी किएँ कुसंग थिति होहिं दाहिने बाम।

कहि सुनि सकुचिअ सूम खल गत हरि संकर नाम।

दोहा 362

बसि कुसंग वह सुजनता ताकी आस निरास।

तीरथहू को नाम भे गया मगह के पास।

दोहा 363

राम कृपाँ तुलसी सुलभ गंग सुसंग समान।

जो जल परै जो जन मिलै कीजै आपु समान।

दोहा 364

ग्रह भेषज जल पनन पट पाइ कुजोग सुजोग।

होहिं कुबस्तु सुबस्तु जग लखहिं सुलच्छन लोग।

दोहा 365

जनम जोग में जानियत जग बिचित्र गति देखि।

तुलसी आखर अंक रस रंग बिभेद बिसेषि।

दोहा 366

आखर जोरि बिचार करू सुमति अंक लिखि लिखि लेखु।

जोग कुजोग सुजोग मय जग गति समुझि बिसेषु।

दोहा 367

करू बिचार चलु सुपथ भल आदि मध्य परिनाम।

उलटि जपें ‘जारा मरा’ सूधें ‘राजा राम’।

दोहा 368

होइ भले कें अनभलो होइ दानि कें सूम।

होइ कपूत सपूत कें ज्यों पावक में धूम।

दोहा 369

जड़ चेतन गुन दोष मय बिस्व कीन्ह करतार।

संत हंस गुन गहहि पय परिहरि बारि बिकार।

दोहा 370

पाट कीट तें होइ तेहि तें पटंबर रूचिर।

कृमि पालइ सबु कोइ परम अपावन प्रान सम।

दोहा 371

जो जो जेहिं रस मगन तहँ सो मुदित मन मानि।

रसगुन दोष बिचारिबो रसिक रीति पहिचानि।

दोहा 372

सम प्रकास तम पाख दुहुँ नाम भेद बिधि कीन्ह।

ससि सोषक पोषक समुझि जगज स अपजस दीन्ह।

दोहा 373

लोक बेदहू लौं दगो नाम भले को पोच।

धर्मराज जम गाज पबि कहत सकोच न सोच।

दोहा 374

बिरूचि परखिऐ सुजन जन राखि परखिऐ मंद।

बड़वानल सोषत उदधि हरष बढ़ावत चंद।

दोहा 375

प्रभु सनमुख भएँ नीच नर होत निपट बिकराल।

रबिरूख लखि दरपन फटिक उगिलत ज्वालाजाल।

दोहा 376

प्रभु समीप गत सुजन जन होत सुखद सुबिचार।

लवन जलधि जीवन जलद बरषत सुधा सुबारि।

दोहा 377

नीच निरावहिं निरस तरू तुलसी सींचहिं ऊख।

पोषत पयद समान सब बिष पियूष के रूख।

दोहा 378

बरषि बिस्व हरषित कहत हरत ताप अघ प्यास।

तुलसी दोष न जलद को जो जल जरै जवास।

दोहा 379

अमर दानि जाचक मरहिं मरि मरि फिरि फिरि लेहिं।

तुलसी जाचक पातकी दातहि दूषन देहिं।

दोहा 380

लखि गयंद लै चलत भजि स्वान सुखानो हाड़।

गज गुन मोल अहार बल महिमा जान कि राड़।

दोहा 381

कै निदरहुँ कै आदरहुँ सिंघहि स्वान सिआर।

हरष बिषाद न केसरिहि कुंजर गंजनिहार।

दोहा 382

ठाढ़ो द्वार न दै सकैं तुलसी जे नर नीच।

निंदहिं बलि हरिचंद को का कियो करन दधीच।

दोहा 383

ईस सीस बिलसत बिमल तुलसी तरल तरंग।

स्वान सरावग के कहें लधुता लहै न गंग।

दोहा 384

तुलसी देवल देव को लागे लाख करोरि।

काक अभागें हगि भर्यो महिमा भई कि थोरि।

दोहा 385

निज गुन घटत नाग नग परखि परिहरत कोल।

तुलसी प्र्रभु भूषन किए गुंजा बढ़े न मोल।।

दोहा 386

राकापति षोड़स उअहिं तारा गन समुदाइ।

सकल गिरिन्ह दव लाइअ बिनु रबि राति न जाइ।

दोहा 387

भलो कहहिं बिनु जानेहूँ बिनु जानेहूँ बिनु जानें अपबाद।

ते नर गादुर जानि जियँ कहिय न हरष बिषाद।

दोहा 388

पर सुख संपति देखि सुनि जरहिं जे बड़ बिनु आगि।

तुलसी तिन के भागते चलै भलाई भागि।

दोहा 389

तुलसी जे कीरति चहहिं पर की कीरति खोइ।

तिनके मुँह मसि लागिहैं मिटहि न मरिहै धोइ।

दोहा 390

तनु गुन धन महिमा धरम तेहि बिनु जेहि अभिमान।

तुलसी जिअत बिडंबना परिनामहु गत जान।।

दोहा 391

सासु ससुर गुरू मातु पितु प्रभु भयो चहै सब कोइ।

होनी दुजी ओर को सुजन सराहिअ सोइ।

दोहा 392

सठ सहि साँसति पति लहत सुजन कलेस न कायँ।

गढ़ि गुढ़ि पाहन पूजिऐ गंडकि सिला सुभायँ।

दोहा 393

बड़े बिबुध दरबार तें भमि भूप दरबार।

जापक पूजत पेखिअत सहत निरादर भार।

दोहा 394

बिनु प्रपंच छल भीख भलि लहिअ न दिएँ कलेस।

बावन बलि सों छल कियो दियो उचित उपदेश।

दोहा 395

भलो भले सों छल किएँ जनम कनौड़ो होइ।

श्रीपति सिर तुलसी लसति बलि बावन गति सोइ।

दोहा 396

बिबुध काज बावन बलिहि छलो भलो जिय जानि।

प्रभुता तजि बस भे तदपि मन की गइ न गलानि।

दोहा 397

सरल बक्र गति पंच ग्रह चपरि न चितवत काहु।

तुलसी सूधे सूर ससि समय बिडंबित राहु।

दोहा 398

खल उपकार बिकार फल तुलसी जान जहान।

मेढुक मर्कट बनिक बक कथा सत्य उपखान।

दोहा 399

तुलसी खल बानी मधुर सुनि समुझिअ हियँ हेरि।

राम राज बाधक भई मूढ़ मंथरा चेरि।

दोहा 400

जोंक सूधि मन कुटिल गति खल बिपरीत बिचारू।

अनहित सोनित सोष सो सो हित सोषनहारू।

भाग-9 (दोहा संख्या 401 से 450)