भाग 8
मनि भाजन मधु पारई पूरन अमी निहारि।
का छाँड़िअ का संग्रहिअ कहहु बिबेक बिचारि।
उत्तम मध्यम नीच गति पाहन सिकता पानि।
प्रीति परिच्छा तिहुन की बैर बितिक्रम जानि।
पुन्य प्रीति पति प्रापतिउ परमारथ पथ पाँच।
लहहिं सुजन परिहरहिं खल सुनहु सिखवन साँच।
नीच निरादरहीं सुखद आदर सुखद बिसाल।
करदी बदरी बिटप गति पेखहु पनस रसाल।
तुलसी अपनो आचरन भलो न लागत कासु।
तेहि न बसात जो खात नित लहसुनहू को बासु।
बुध से बिबेकी बिमलमति जिन्ह कें रोष न राग।
सुहृदय सराहत साधु जेहि तुलसी ताको भाग।
आपु आपु कहँ सब भलो अपने कहँ कोइ कोइ।
तुलसी सब कहँ जो भलो सुजन सराहिअ सोइ।
तुलसी भलो सुसंग तें पोच कुसंगति सोइ।
नाउ किंनरी तीर असि लोह बिलोकहु लोइ।
गुरू संगति गुरू होइ सो लघु संगति लघुनाम ।
चार पदारथ में गनैं नकि द्वारहू काम।
तुलसी गुरू लघुतालहत लघुसंगति परिनाम ं।
देवी देव पुकाअित नीच नारि नर नाम।
तुलसी किएँ कुसंग थिति होहिं दाहिने बाम।
कहि सुनि सकुचिअ सूम खल गत हरि संकर नाम।
बसि कुसंग वह सुजनता ताकी आस निरास।
तीरथहू को नाम भे गया मगह के पास।
राम कृपाँ तुलसी सुलभ गंग सुसंग समान।
जो जल परै जो जन मिलै कीजै आपु समान।
ग्रह भेषज जल पनन पट पाइ कुजोग सुजोग।
होहिं कुबस्तु सुबस्तु जग लखहिं सुलच्छन लोग।
जनम जोग में जानियत जग बिचित्र गति देखि।
तुलसी आखर अंक रस रंग बिभेद बिसेषि।
आखर जोरि बिचार करू सुमति अंक लिखि लिखि लेखु।
जोग कुजोग सुजोग मय जग गति समुझि बिसेषु।
करू बिचार चलु सुपथ भल आदि मध्य परिनाम।
उलटि जपें ‘जारा मरा’ सूधें ‘राजा राम’।
होइ भले कें अनभलो होइ दानि कें सूम।
होइ कपूत सपूत कें ज्यों पावक में धूम।
जड़ चेतन गुन दोष मय बिस्व कीन्ह करतार।
संत हंस गुन गहहि पय परिहरि बारि बिकार।
पाट कीट तें होइ तेहि तें पटंबर रूचिर।
कृमि पालइ सबु कोइ परम अपावन प्रान सम।
जो जो जेहिं रस मगन तहँ सो मुदित मन मानि।
रसगुन दोष बिचारिबो रसिक रीति पहिचानि।
सम प्रकास तम पाख दुहुँ नाम भेद बिधि कीन्ह।
ससि सोषक पोषक समुझि जगज स अपजस दीन्ह।
लोक बेदहू लौं दगो नाम भले को पोच।
धर्मराज जम गाज पबि कहत सकोच न सोच।
बिरूचि परखिऐ सुजन जन राखि परखिऐ मंद।
बड़वानल सोषत उदधि हरष बढ़ावत चंद।
प्रभु सनमुख भएँ नीच नर होत निपट बिकराल।
रबिरूख लखि दरपन फटिक उगिलत ज्वालाजाल।
प्रभु समीप गत सुजन जन होत सुखद सुबिचार।
लवन जलधि जीवन जलद बरषत सुधा सुबारि।
नीच निरावहिं निरस तरू तुलसी सींचहिं ऊख।
पोषत पयद समान सब बिष पियूष के रूख।
बरषि बिस्व हरषित कहत हरत ताप अघ प्यास।
तुलसी दोष न जलद को जो जल जरै जवास।
अमर दानि जाचक मरहिं मरि मरि फिरि फिरि लेहिं।
तुलसी जाचक पातकी दातहि दूषन देहिं।
लखि गयंद लै चलत भजि स्वान सुखानो हाड़।
गज गुन मोल अहार बल महिमा जान कि राड़।
कै निदरहुँ कै आदरहुँ सिंघहि स्वान सिआर।
हरष बिषाद न केसरिहि कुंजर गंजनिहार।
ठाढ़ो द्वार न दै सकैं तुलसी जे नर नीच।
निंदहिं बलि हरिचंद को का कियो करन दधीच।
ईस सीस बिलसत बिमल तुलसी तरल तरंग।
स्वान सरावग के कहें लधुता लहै न गंग।
तुलसी देवल देव को लागे लाख करोरि।
काक अभागें हगि भर्यो महिमा भई कि थोरि।
निज गुन घटत नाग नग परखि परिहरत कोल।
तुलसी प्र्रभु भूषन किए गुंजा बढ़े न मोल।।
राकापति षोड़स उअहिं तारा गन समुदाइ।
सकल गिरिन्ह दव लाइअ बिनु रबि राति न जाइ।
भलो कहहिं बिनु जानेहूँ बिनु जानेहूँ बिनु जानें अपबाद।
ते नर गादुर जानि जियँ कहिय न हरष बिषाद।
पर सुख संपति देखि सुनि जरहिं जे बड़ बिनु आगि।
तुलसी तिन के भागते चलै भलाई भागि।
तुलसी जे कीरति चहहिं पर की कीरति खोइ।
तिनके मुँह मसि लागिहैं मिटहि न मरिहै धोइ।
तनु गुन धन महिमा धरम तेहि बिनु जेहि अभिमान।
तुलसी जिअत बिडंबना परिनामहु गत जान।।
सासु ससुर गुरू मातु पितु प्रभु भयो चहै सब कोइ।
होनी दुजी ओर को सुजन सराहिअ सोइ।
सठ सहि साँसति पति लहत सुजन कलेस न कायँ।
गढ़ि गुढ़ि पाहन पूजिऐ गंडकि सिला सुभायँ।
बड़े बिबुध दरबार तें भमि भूप दरबार।
जापक पूजत पेखिअत सहत निरादर भार।
बिनु प्रपंच छल भीख भलि लहिअ न दिएँ कलेस।
बावन बलि सों छल कियो दियो उचित उपदेश।
भलो भले सों छल किएँ जनम कनौड़ो होइ।
श्रीपति सिर तुलसी लसति बलि बावन गति सोइ।
बिबुध काज बावन बलिहि छलो भलो जिय जानि।
प्रभुता तजि बस भे तदपि मन की गइ न गलानि।
सरल बक्र गति पंच ग्रह चपरि न चितवत काहु।
तुलसी सूधे सूर ससि समय बिडंबित राहु।
खल उपकार बिकार फल तुलसी जान जहान।
मेढुक मर्कट बनिक बक कथा सत्य उपखान।
तुलसी खल बानी मधुर सुनि समुझिअ हियँ हेरि।
राम राज बाधक भई मूढ़ मंथरा चेरि।
जोंक सूधि मन कुटिल गति खल बिपरीत बिचारू।
अनहित सोनित सोष सो सो हित सोषनहारू।
भाग-9 (दोहा संख्या 401 से 450)