अयोध्याकाण्ड · भाग ५
गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 61 से 70/पृष्ठ 2
(62)
जो पै हौं मातु मते महँ ह्वैहौं |
तौ जननी !जगमें या मुखकी कहाँ कालिमा ध्वैहौं ?||
क्यों हौं आजु हौत सुचि सपथनि ?कौन मानिहै साँची? |
महिमा-मृगी कौन सुकृतीकी खल-बच-बिसिषन बाँची ?||
गहि न जाति रसना काहूकी, कहौ जाही जोइ सूझै |
दीनबन्धु कारुण्य-सिन्धु बिनु कौन हियेकी बूझै ?||
तुलसी रामबियोग बिषम-बिष-बिकल नारि-नर भारी |
भरत-सनेह-सुधा सीञ्चे सब भए तेहि समय सुखारी ||
गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 61 से 70/पृष्ठ 3
(63)
काहेको खोरि कैकयिहि लावौं?
धरहु धीर, बलि जाउँ तात! मोको आज विधाता बावौं ||
सुनिबे जोग बियोग रामको हौं न होउँ मेरे प्यारे |
सो मेरे नयननि आगेतें रघुपति बनहि सिधारे ||
तुलसिदास समुझाइ भरत कहँ, आँसू पोञ्छि उर लाए |
उपजी प्रीति जानि प्रभुके हित, मनहु राम फिरि आए ||
गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 61 से 70/पृष्ठ 4
(64)
भरतजी का चित्रकूटको प्रस्थान
मेरो अवध धौं कहहु, कहा है |
करहु राज रघुराज-चरन तजि, लै लटि लोगु रहा है ||
धन्य मातु, हौं धन्य, लागि जेहि राज-समाज ढहा है |
तापर मोको प्रभु करि चाहत सब बिनु दहन दहा है ||
राम-सपथ, कोउ कछू कहै जनि, मैं दुख दुसह सहा है |
चित्रकूट चलिए सब मिलि, बलि, छमिए मोहि हहा है ||
यों कहि भोर भरत गिरिवरको मारग बूझि गहा है |
सकल सराहत, एक भरत जग जनमि सुलाहु लहा है ||
जानहिं सिय-रघुनाथ भरतको सील सनेह महा है |
कै तुलसी जाको राम-नामसों प्रेम-नेम निबहा है ||
गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 61 से 70/पृष्ठ 5
(65)
भाई! हौं अवध कहा रहि लैहौं |
राम-लषन-सिय-चरन बिलोकन काल्हि काननहि जैहौं ||
जद्यपि मोतें, कै सुमाततें ह्वै आई अति पोची |
सनमुख गए सरन राखहिङ्गे रघुपति परम सँकोची ||
तुलसी यों कहि चले भोरही, लोग बिकल सँग लागे |
जनु बन जरत देखि दारुन दव निकसि बिहँग-मृग भागे ||
गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 61 से 70/पृष्ठ 6
(66)
सुकसों गहवर हिये कहै सारो |
बीर कीर! सिय-राम-लषन बिनु लागत जग अँधियारो ||
पापिनि चेरि, अयानि रानि, नृप हित-अनहित न बिचारो |
कुलगुर-सचिव-साधु सोचतु, बिधि को न बसाइ उजारो ?||
अवलोके न चलत भरि लोचन, नगर कोलाहल भारो |
सुने न बचन करुनाकरके, जब पुर-परिवार सँभारो ||
भैया भरत भावतेके, सँग बन सब लोग सिधारो |
हम पँख पाइ पीञ्जरनि तरसत अधिक अभाग हमारो ||
सुनि खग कहत अंब! मौङ्गी रहि समुझि प्रेमपथ न्यारो |
गए ते प्रभुहि पहुँचाइ फिरे पुनि करत करम-गुन गारो ||
जीवन जग जानकी-लषनको, मरन महीप सँवारो |
तुलसी और प्रीतिकी चरचा करत, कहा कछु चारो ||
गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 61 से 70/पृष्ठ 7
(67)
कहै सुक, सुनहि सिखावन, सारो !
बिधि-करतब बिपरीत बाम गति, राम-प्रेम-पथ न्यारो ||
को नर-नारि अवध खग-मृग, जेहि जीवन रामतें प्यारो |
बिद्यमान सबके गवने बन, बदन करमको कारो ||
अंब, अनुज, प्रिय सखा, सुसेवक देखि बिषाद बिसारो |
पञ्छी परबस परे पीञ्जरनि, लेखो कौन हमारो ||
रही नृपकी, बिगरी है सबकी, अब एक सँवारनिहारो |
तुलसी प्रभु निज चरन-पीठ मिस भरत-प्रान रखवारो ||
गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 61 से 70/पृष्ठ 8
(68)
ता दिन सृङ्गबेरपुर आए |
राम-सखा ते समाचार सुनि बारि बिलोचन छाए ||
कुस-साथरी देखि रघुपतिकी हेतु अपनपौ जानी |
कहत कथा सिय-राम-लषनकी बैठेहि रैनि बिहानी ||
भोरहिं भरद्वाज आश्रम ह्वै, करि निषादपति आगे |
चले जनु तक्यो तड़ाग तृषित गज घोर घामके लागे ||
बूझत चित्रकूट कहँ जेहि तेहि, मुनि बालकनि बतायो |
तुलसी मनहु फनिक मनि ढूँढ़त, निरखि हरषि हिय धायो ||
गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 61 से 70/पृष्ठ 9
(69)
राम-भरत-मिलन
बिलोके दूरितें दोउ बीर |
उर आयत, आजानु सुभग भुज, स्यामल-गौर सरीर ||
सीस जटा, सरसीरुह लोचन, बने परिधन मुनिचीर |
निकट निषङ्ग, सङ्ग सिय सोभित, करनि धुनत धनु-तीर ||
मन अगहुँड़, तनु पुलक सिथिल भयो, नलिन नयन भरे नीर |
गड़त गोड़ मानो सकुच-पङ्क महँ, कढ़त प्रेम-बल धीर ||
तुलसिदास दसा देखि भरतकी उठि धाए अतिहि अधीर |
लिये उठाइ उर लाइ कृपानिधि बिरह-जनित हरि पीर ||
गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 61 से 70/पृष्ठ 10
(70)
भरत भए ठाढ़े कर जोरि |
ह्वै न सकत सामुहें सकुचबस समुझि मातुकृत खोरि ||
फिरिहैं किधौं फिरन कहिहैं प्रभु कलपि कुटिलता मोरि |
हृदय सोच, जलभरे बिलोचन, नेह देह भै भोरि ||
बनबासी, पुरलोग, महामुनि किए हैं काठके-से कोरि |
दै दै श्रवन सुनिबेको जहँ तहँ रहे प्रेम मन बोरि ||
तुलसी राम-सुभाव सुमिरि, उर धरि धीरजहि बहोरि |
बोले बचन बिनीत उचित हित करुना-रसहि निचोरि ||
गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 71 से 80/पृष्ठ 1
(71)
जानत हौ सबहीके मनकी |
तदपि,कृपालु करौं! बिनती सोइ सादर सुनहु दीन-हित जनकी ||
ये सेवक सन्तत अनन्य अति, ज्यों चातकहि एक गति घनकी |
यह बिचारि गवनहु पुनीत पुर, हरहु दुसह आरति परिजनकी ||
मेरो जीवन जानिय ऐसोइ, जियै जैसो अहि, जासु गई मनि फनकी |
मेटहु कुलकलङ्क कोसलपति, आग्या देहु नाथ मोहि बनकी ||
मोको जोइ लाइय लागै सोइ उतपति है कुमातुतें तनकी |
तुलसिदास सब दोष दूरि करि प्रभु अब लाज करहु निज पनकी ||
गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 71 से 80/पृष्ठ 2
(72)
तात! बिचारो धौं, हौं क्यों आवौं |
तुम्ह सुचि, सुहृद, सुजान सकल बिधि, बहुत कहा
कहि कहि समुझावौं ||
निज कर खाल खैञ्चि या तनुतें जौ पितु पग पानही करावौं |
होउँ न उरिन पिता दसरथतें, कैसे ताके बचन मेटि पति पावौं ||
तुलसिदास जाको सुजस तिहूँ पुर, क्यों तेहि
कुलहि कालिमा लावौं |
प्रभु-रुख निरखि निरास भरत भए, जान्यो है सबहि
भाँति बिधि बावौं ||
गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 71 से 80/पृष्ठ 3
(73)
बहुरो भरत कह्यो कछु चाहैं |
सकुच-सिन्धु बोहित बिबेक करि बुधि-बल बचन निबाहैं ||
छोटेहुतें छोह करि आए, मैं सामुहैं न हेरो |
एकहि बार आजु बिधि मेरो सील-सनेह निबेरो ||
तुलसी जो फिरिबो न बनै, प्रभु तौ हौं आयसु पावौं |
घर फेरिए लषन, लरिका हैं, नाथ साथ हौं आवौं ||
गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 71 से 80/पृष्ठ 4
(74)
रघुपति मोहि सङ्ग किन लीजै
बार बार पुर जाहु, नाथ केहि कारन आयसु दीजै ||
जद्यपि हौं अति अधम, कुटिलमति, अपराधिनिको जायो |
प्रनतपाल कोमल-सुभाव जिय जानि, सरन तकि आयो ||
जो मेरे तजि चरन आन गति, कहौं हृदय कछु राखी |
तौ परिहरहु दयालु, दीनहित, प्रभु, अभिअंतर-साखी ||
ताते नाथ कहौं मैं पुनि-पुनि, प्रभु पितु, मातु, गोसाईं |
भजनहीन नरदेह बृथा, खर-स्वान-फेरुकी नाईँ ||
बन्धु-बचन सुनि श्रवन नयन-राजीव नीर भरि आए |
तुलसिदास प्रभु परम कृपा गहि बाँह भरत उर लाए ||
गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 71 से 80/पृष्ठ 5
(75)
काहेको मानत हानि हिये हौ?
प्रीति-नीति-गुन-सील-धरम कहँ तुम अवलम्ब दिये हौ ||
तात! जात जानिबे न ए दिन, करि प्रमान पितु-बानी |
ऐहौं बेगि, धरहु धीरज उर कठिन कालगति जानी ||
तुलसिदास अनुजहि प्रबोधि प्रभु चरनपीठ निज दीन्हें |
मनहु सबनिके प्रान-पाहरु भरत सीस धरि लीन्हें ||