श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
गीतावली · गोस्वामी तुलसीदास

अयोध्याकाण्ड · भाग ६

गीतावली · अयोध्याकाण्ड · भाग ६
पद ७५

गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 71 से 80/पृष्ठ 6

(76)

बिनती भरत करत कर जोरे |

दीनबन्धु! दीनता दीनकी कबहुँ परै जनि भोरे ||

तुम्हसे तुम्हहि नाथ मोको, मोसे जन तुमको बहुतेरे |

इहै जानि, पहिचानि प्रीति, छमिए अघ-औगुन मेरे ||

यों कहि सीय-राम-पाँयनि परि लषन लाइ उर लीन्हें |

पुलक सरीर, नीर भरि लोचन, कहत प्रेम-पन-कीन्हें ||

तुलसी बीते अवधि प्रथम दिन जो रघुबीर न ऐहौ |

तौ प्रभु-चरन-सरोज-सपथ जीवत परिजनहि न पैहौ ||

पद ७६

गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 71 से 80/पृष्ठ 7

(77)

अवसि हौं आयसु पाइ रहौङ्गो |

जनमि कैकयी-कोखि कृपानिधि! क्यों कछु चपरि कहौङ्गो ||

भरत भूप, सिय-राम-लषन बन, सुनि सानन्द सहौङ्गो |

पुर-परिजन अवलोकि मातु सब सुख-सन्तोष लहौङ्गो ||

प्रभु जानत, जेहि भाँति अवधिलौं बचन पालि निबहौङ्गो |

आगेकी बिनती तुलसी तब, जब फिरि चरन गहौङ्गो ||

पद ७७

गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 71 से 80/पृष्ठ 8

(78)

प्रभुसों मैं ढीठो बहुत दई है |

कीबी छमा, नाथ! आरतितें कही कुजुगुति नई है ||

यों कहि, बार बार पाँयनि परि, पाँवरि पुलकि लई है |

अपनो अदिन देखि हौं डरपत, जेहि बिष बेलि बई है ||

आए सदा सुधारि गोसाईँ, जनतें बिगरि गई है |

थके बचन पैरत सनेह-सरि, पर्यो मानो घोर घई है ||

चित्रकूट तेहि समय सबनिकी बुद्धि बिषाद हई है |

तुलसी राम-भरतके बिछुरत सिला सप्रेम भई है ||

पद ७८

गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 71 से 80/पृष्ठ 9

(79)

जबतें चित्रकूटतें आए |

नन्दिग्राम खनि अवनि, डासि कुस, परनकुटी करि छाए ||

अजिन बसन, फल असन, जटा धरे रहत अवधि चित दीन्हें |

प्रभु-पद-प्रेम-नेम-ब्रत निरखत मुनिन्ह नमित मुख कीन्हें ||

सिंहासनपर पूजि पादुका बारहि बार जोहारे |

प्रभु-अनुराग माँगि आयसु पुरजन सब काज सँवारे ||

तुलसी ज्यों-ज्यों घटत तेज तनु, त्यों-त्यों प्रीति अधिकाई |

भए, न हैं, न होहिङ्गे कबहूँ भुवन भरत-से भाई ||

पद ७९

गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 71 से 80/पृष्ठ 10

(80)

रागरामकली

राखी भगति-भलाई भली भाँति भरत |

स्वारथ-परमारथ-पथी जय जय जग करत ||

जो ब्रत मुनिवरनि कठिन मानस आचरत |

सो ब्रत लिए चातक-ज्यों सुनत पाप हरत ||

सिंहासन सुभग राम-चरन-पीठ धरत |

चालत सब राजकाज आयसु अनुसरत ||

आपु अवध, बिपिन बन्धु, सोच-जरनि जरत |

तुलसी सम-बिषम, सुगम-अगम लखि न परत ||

पद ८०

गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 81 से 89/पृष्ठ 1

(81)

मोहि भावति, कहि आवति नहि भरतजूकी रहनि |

सजल नयन सिथिल बयन प्रभु-गुन-गन कहनि ||

असन-बसन-अयन-सयन धरम गरुअ गहनि |

दिन दिन पन-प्रेम-नेम निरुपधि निरबहनि ||

सीता-रघुनाथ-लषन-बिरह-पीर सहनि |

तुलसी तजि उभय लोक रामचरन-चहनि ||

पद ८१

गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 81 से 89/पृष्ठ 2

(82)

जानी है सङ्कर-हनुमान-लषन-भरत राम भगति |

कहत सुगम, करत अगम, सुनत मीठी लगति ||

लहत सकृत, चहत सकल, जुग जुग जगमगति |

राम-प्रेम-पथतें कबहुँ डोलति नहिं, डगति ||

रिधि-सिधि, बिधि चारि सुगति जा बिनु गति अगति |

तुलसी तेहि सनमुख बिनु बिषय-ठगिनि ठगति ||

पद ८२

गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 81 से 89/पृष्ठ 3

(83)

रागगौरी

कैकयी करी धौं चतुराई कौन?

राम-लषन-सिय बनहि पठाए, पति पठए सुरभौन ||

कहा भलो धौं भयो भरतको, लगे तरुन-तन दौन |

पुरबासिन्हके नयन नीर बिनु कबहुँ तो देखति हौं न ||

कौसल्या दिन राति बिसूरति, बैठि मनहिं मन मौन |

तुलसी उचित न होइ रोइबो, प्रान गए सँग जौ न ||

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पद ८३

गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 81 से 89/पृष्ठ 4

(84)

हाथ मीञ्जिबो हाथ रह्यो |

लगी न सङ्ग चित्रकूटहुतें, ह्याँ कहा जात बह्यो ||

पति सुरपुर, सिय-राम-लषन बन, मुनिब्रत भरत गह्यो |

हौं रहि घर मसान-पावक ज्यों मरिबोइ मृतक दह्यो ||

मेरोइ हिय कठोर करिबे कहँ बिधि कहुँ कुलिस लह्यो |

तुलसी बन पहुँचाइ फिरी सुत, क्यों कछु परत कह्यो ?||

पद ८४

गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 81 से 89/पृष्ठ 5

(85)

हौं तो समुझि रही अपनो सो |

राम-लषन-सियको सुख मोकहँ भयो, सखी! सपनो सो ||

जिनके बिरह-बिषाद बँटावन खग-मृग जीव दुखारी |

मोहि कहा सजनी समुझावति, हौं तिन्हकी महतारी ||

भरत-दसा सुनि, सुमिरि भूपगति, देखि दीन पुरबासी |

तुलसी राम कहति हौं सकुचति, ह्वैहै जग उपहाँसी ||

पद ८५

गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 81 से 89/पृष्ठ 6

(86)

आली! हौं इन्हहिं बुझावौं कैसे ?

लेत हिये भरि भरि पतिको हित, मातुहेतु सुत जैसे ||

बार-बार हिहिनात हेरि उत, जो बोलै कोउ द्वारे |

अंग लगाइ लिए बारेतें करुनामय सुत प्यारे ||

लोचन सजल, सदा सोवत-से, खान-पान बिसराए |

चितवत चौङ्कि नाम सुनि, सोचत राम-सुरति उर आए ||

तुलसी प्रभुके बिरह-बधिक हठि राजहंस-से जोरे |

ऐसेहु दुखित देखि हौं जीवति राम-लखनके घोरे ||

पद ८६

गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 81 से 89/पृष्ठ 7

(87)

राघौ! एक बार फिरि आवौ |

ए बर बाजि बिलोकि आपने, बहुरो बनहि सिधावौ ||

जे पय प्याइ, पोखि कर-पङ्कज, बार-बार चुचुकारे |

क्यों जीवहिं, मेरे राम लाड़िले! ते अब निपट बिसारे ||

भरत सौगुनी सार करत हैं, अति प्रिय जानि तिहारे |

तदपि दिनहिं दिन होत झाँवरे, मनहु कमल हिम-मारे ||

सुनहु पथिक! जो राम मिलहिं बन, कहियो मातु-सँदेसो |

तुलसी मोहि और सबहिनतें इन्हको बड़ो अँदेसो ||

पद ८७

गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 81 से 89/पृष्ठ 8

(88)

काहूसों काहू समाचार ऐसे पाए |

चित्रकूटतें राम-लषन-सिय सुनियत अनत सिधाए ||

सैल, सरित, निरझर, बन, मुनि-थल देखि-देखि सब आए |

कहत सुनत सुमिरत सुखदायक, मानस-सुगम सुहाए ||

बड़ि अवलम्ब बाम-बिधि-बिघटित बिषम बिषाद बढ़ाए |

सिरिस-सुमन-सुकुमार मनोहर बालक बिन्ध्य चढ़ाए ||

अवध सकल नर-नारि बिकल अति, अँकनि बचन अनभाए |

तुलसी राम-बियोग-सोग-बस, समुझत नहिं समुझाए ||

पद ८८

गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 81 से 89/पृष्ठ 9

(89)

सुनी मैं सखि! मङ्गल चाह सुहाई |

सुभ पत्रिका निषातराजकी आजु भरत पहँ आई ||

कुँवर सो कुसल-छेम अलि! तेहि पल कुलगुर कहँ पहुँचाई |

गुर कृपालु सम्भ्रम पुर घर घर सादर सबहि सुनाई ||

बधि बिराध, सुर-साधु सुखी करि, ऋषि-सिख-आसिष पाई |

कुम्भजु-सिष्य समेत सङ्ग सिय, मुदित चले दोउ भाई ||

बीच बिन्ध्य रेवा सुपास थल बसे हैं परन-गृह छाई |

पन्थ-कथा रघुनाथ पथिककी तुलसिदास सुनि गाई ||