श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
गीतावली · गोस्वामी तुलसीदास

अरण्यकाण्ड · भाग १

गीतावली · अरण्यकाण्ड · भाग १
पद १

गीतावली अरण्यकांड पद 1 से 5 तक/पृष्ठ 1

(1)

भगवान्का वन-विहार

रागमलार

देखे राम पथिक नाचत मुदित मोर |

मानत मनहु सतड़ित ललित घन, धनु सुरधनु, गरजनि टँकोर ||

कँपे कलाप बर बरहि फिरावत, गावत कल कोकिल-किसोर |

जहँ जहँ प्रभु बिचरत, तहँ तहँ सुख, दण्डकबन कौतुक न थोर ||

सघन छाँह-तम रुचिर रजनि भ्रम, बदन-चन्द चितवत चकोर |

तुलसी मुनि खग-मृगनि सराहत, भए हैं सुकृत सब इन्हकी ओर ||

पद २

गीतावली अरण्यकांड पद 1 से 5 तक/पृष्ठ 2

(2).

रागकल्याण

सुभग सरासन सायक जोरे |

खेलत राम फिरत मृगया बन, बसति सो मृदु मूरति मन मोरे ||

पीत बसन कटि, चारु चारि सर, चलत कोटि नट सो तृन तोरे |

स्यामल तनु स्रम-कन राजत, ज्यों नव घन सुधा-सरोवर खोरे ||

ललित कन्ध, बर भुज, बिसाल उर, लेहिं कण्ठ-रेखैं चित चोरे |

अवलोकत मुख देत परम सुख, लेत सरद-ससिकी छबि छोरे ||

जटा मुकुट सिर, सारस-नयननि गौहैं तकत सुभौंह सकोरे |

सोभा अमित समाति न कानन, उमगि चली चहुँ दिसि मिति फोरे ||

चितवत चकित कुरङ्ग-कुरङ्गिनि, सब भए मगन मदनके भोरे |

तुलसिदास प्रभु बान न मोचत, सहज सुभाय प्रेमबस थोरे ||

पद ३

गीतावली अरण्यकांड पद 1 से 5 तक/पृष्ठ 3

(3)

मारीच-वध

.रागसोरठ

बैठे हैं राम-लषन अरु सीता |

पञ्चबटी बर परनकुटी तर, कहैं कछु कथा पुनीता ||

कपट-कुरङ्ग कनकमनिमय लखि प्रियसों कहति हँसि बाला |

पाए पालिबे जोग मञ्जु मृग, मारेहु मञ्जुल छाला ||

प्रिया-बचन सुनि बिहँसि प्रेमबस गवहिं चाप-सर लीन्हें |

चल्यो भाजि, फिरि फिरि चितवत मुनिमख-रखवारे चीन्हें ||

सोहति मधुर मनोहर मूरति हेम-हरिनके पाछे |

धावनि, नवनि, बिलोकनि, बिथकनि बसै तुलसी उर आछे ||

पद ४

गीतावली अरण्यकांड पद 1 से 5 तक/पृष्ठ 4

(4).

रागकल्याण

कर सर-धनु, कटि रुचिर निषङ्ग |

प्रिया-प्रीति-प्रेरित बन-बीथिन्ह बिचरत कपट-कनक-मृग सङ्ग ||

भुज बिसाल, कमनीय कन्ध-उर, स्रम-सीकर सोहैं साँवरे अंग |

मनु मुकुता मनि मरकत गिरिपर लसत ललित रबि-किरनि प्रसङ्ग ||

नलिन नयन, सिर जटा-मुकुट, बिच सुमन-माल मनु सिव-सिर गङ्ग |

तुलसिदास ऐसी मूरति की बलि, छबि बिलोकि लाजैं अमित अनङ्ग ||

पद ५

गीतावली अरण्यकांड पद 1 से 5 तक/पृष्ठ 5

(5).

रागकेदारा

राघव, भावति मोहि बिपिनकी बीथिन्ह धावनि |

अरुन-कञ्ज-बरन-चरन सोकहरन, अंकुस-कुलिस-

केतु-अंकित अवनि ||

सुन्दर स्यामल अंग, बसन पीत सुरङ्ग, कटि निषङ्ग

परिकर मेरवनि |

कनक-कुरङ्ग सङ्ग, साजे कर सर-चाप, राजिवनयन

इत उत चितवनि ||

सोहत सिर मुकुट जटा-पटल-निकर, सुमन-लता

सहित रची बनवनि |

तैसेई स्रम-सीकर रुचिर राजत मुख, तैसिए ललित

भ्रकुटिन्हकी नवनि ||

देखत खग-निकर, मृग रवनिन्हजुत थकित बिसारि

जहाँ-तहाँकी भँवनि |

हरि-दरसन-फल पायो है ग्यान बिमल, जाँचत भगति,

मुनि चाहत जवनि ||

जिन्हके मन मगन भए हैं रस सगुन, तिन्हके लेखे

अगुन-मुकुति कवनि |

श्रवन-सुख करनि, भवसरिता-तरनि, गावत तुलसिदास

कीरति पवनि ||

पद ६

गीतावली अरण्यकांड पद 6 से 10 तक/पृष्ठ 1

(6).

रागसोरठ

रघुबर दूरि जाइ मृग मार्यो |

लषन पुकारि, राम हरुए कहि, मरतहु बैर सँभार्यो ||

सुनहु तात! कोउ तुम्हहि पुकारत प्राननाथकी नाईं |

कह्यो लषन, हत्यो हरिन, कोपि सिय हठि पठयो बरिआईं ||

बन्धु बिलोकि कहत तुलसी प्रभु भाई! भली न कीन्हीं |

मेरे जान जानकी काहू खल छल करि हरि लीन्हीं ||

पद ७

गीतावली अरण्यकांड पद 6 से 10तक/पृष्ठ 2

(7)

सीता-हरण

आरत बचन कहति बैदेही |

बिलपति भूरि बिसूरि दूरि गए मृग सँग परम सनेही ||

कहे कटु बचन, रेख नाँघी मैं, तात छमा सो कीजै |

देखि बधिक-बस राजमरालिनि, लषन लाल! छिनि लीजै ||

बनदेवनि सिय कहन कहति यों, छल करि नीच हरी हौं |

गोमर-कर सुरधेनु, नाथ! ज्यौं त्यौं परहाथ परी हौं ||

तुलसिदास रघुनाथ-नाम-धुनि अकनि गीध धुकि धायो |

पुत्रि पुत्रि! जनि डरहि, न जैहै नीचु, मीचु हौं आयो ||

पद ८

गीतावली अरण्यकांड पद 6 से 10 तक/पृष्ठ 3

(8)

जटायु-वध

फिरत न बारहि बार प्रचार्यो |

चपरि चोञ्च-चङ्गुल हय हति, रथ खण्ड खण्ड करि डार्यो ||

बिरथ-बिकल कियो, छीन लीन्हि सिय, घन घायनि अकुलान्यो |

तब असि काढ़ि, काटि पर, पाँवर लै प्रभु-प्रिया परान्यो ||

रामकाज खगराज आजु लर्यो, जियत न जानकि त्यागी |

तुलसिदास सुर-सिद्ध सराहत, धन्य बिहँद बड़भागी ||

पद ९

गीतावली अरण्यकांड पद 6 से 10 तक/पृष्ठ 4

(9)

रामकी वियोग-व्यथा

हेमको हरिन हनि फिरे रघुकुल-मनि,

लषन ललित कर लिये मृगछाल |

आश्रम आवत चले, सगुन न भए भले,

फरके बाम बाहु, लोचन बिसाल ||

सरित-जल मलिन, सरनि सूखे नलिन,

अलि न गुञ्जत, कल कूजैं न मराल |

कोलिनि-कोल-किरात जहाँ तहाँ बिखात,

बन न बिलोकि जात खग-मृग-माल ||

तरु जे जानकी लाए, ज्याये हरि-करि-कपि,

हेरैं न हुँकरि, झरैं फल न रसाल |

जे सुक-सारिका पाले, मातु ज्यों ललकि लाले,

तेऊ न पढ़त न पढ़ावैं मुनिबाल ||

समुझि सहमे सुठि, प्रिया तौ न आई उठि,

तुलसी बिबरन परन-तृन-साल |

औरे सो सब समाजु, कुसल न देखौं आजु,

गहबर हिय कहैं कोसलपाल ||

पद १०

गीतावली अरण्यकांड पद 6 से 10 तक/पृष्ठ 5

(10)

आश्रम निरखि भूले, द्रुम न फले न फूले,

अलि-खग-मृग मानो कबहुँ न हे |

मुनि न मुनिबधूटी, उजरी परनकुटी,

पञ्चबटी पहिचानि ठाढ़ेइ रहे ||

उठी न सलिल लिए, प्रेम प्रमुदित हिए,

प्रिया न पुलकि प्रिय बचन कहे |

पल्लव-सालन हेरी, प्रानबल्लभा न टेरी,

बिरह बिथकि लखि लषन गहे ||

देखे रघुपति-गति बिबुध बिकल अति,

तुलसी गहन बिनु दहन दहे |

अनुज दियो भरोसो, तौलों है सोचु खरो सो,

सिय-समाचार प्रभु जौलों न लहे ||

पद ११

अरण्यकांड पद 11 से 15 तक/पृष्ठ 1

(11).

रागसोरठ

जबहि सिय-सुधि सब सुरनि सुनाई |

भए सुनि सजग, बिरहसरि पैरत थके थाह-सी पाई ||

कसि तूनीर-तीर धनु-धर-धुर धीर बीर दोउ भाई |

पञ्चबटी-गोदहि प्रनाम करि, कुटी दाहिनी लाई ||

चले बूझत बन-बेलि-बिटप, खग-मृग, अलि-अवलि सुहाई |

प्रभुकी दसा सो समौ कहिबेको कबि उर आह न आई ||

रटनि अकनि पहिचानि गीध फिरे करुनामय रघुराई |

तुलसी रामहि प्रिया बिसरि गई, सुमिरि सनेह-सगाई ||

पद १२

अरण्यकांड पद 11 से 15 तक/पृष्ठ 2

(12)

जटायुसे भेण्ट

मेरे एकौ हाथ न लागी |

गयो बपु बीति बादि कानन ज्यों कलपलता दव दागी ||

दसरथसों न प्रेम प्रतिपाल्यौ, हुतो जो सकल जग साखी |

बरबस हरत निसाचर पतिसों हठि न जानकी राखी ||

मरत न मैं रघुबीर बिलोके तापस बेष बनाए |

चाहत चलन प्रान पाँवर बिनु सिय-सुधि प्रभुहि सुनाए ||

बार-बार कर मीञ्जि, सीस धुनि गीधराज पछिताई |

तुलसी प्रभु कृपालु तेहि औसर आइ गए दोउ भाई ||

पद १३

अरण्यकांड पद 11 से 15 तक/पृष्ठ 3

(13)

राघौ गीध गोद करि लीन्हों |

नयन-सरोज सनेह-सलिल सुचि मनहु अरघजल दीन्हों ||

सुनहु लषन! खगपतिहि मिले बन मैं पितु-मरन न जान्यौ |

सहि न सक्यौ सो कठिन बिधाता, बड़ो पछु आजुहि भान्यौ ||

बहु बिधि राम कह्यो तनु राखन, परम धीर नहि डोल्यौ |

रोकि, प्रेम, अवलोकि बदन-बिधु, बचन मनोहर बोल्यौ ||

तुलसी प्रभु झूठे जीवन लगि समय न धोखो लैहौं |

जाको नाम मरत मुनिदुरलभ तुमहि कहाँ पुनि पैहौं ?||