अरण्यकाण्ड · भाग २
अरण्यकांड पद 11 से 15 तक/पृष्ठ 4
(14)
नीके कै जानत राम हियो हौं |
प्रनतपाल, सेवक-कृपालु-चित, पितु पटतरहि दियो हौं ||
त्रिजगजोनि-गत गीध, जनम भरि खाइ कुजन्तु जियो हौं |
महाराज सुकृती-समाज सब-ऊपर आजु कियो हौं ||
श्रवन बचन, मुख नाम, रुप चख, राम उछङ्ग लियो हौं |
तुलसी मो समान बड़भागी को कहि सकै बियो हौं ||
अरण्यकांड पद 11 से 15 तक/पृष्ठ 5
(15)
मेरे जान तात कछू दिन जीजै |
देखिअ आपु सुवन-सेवासुख, मोहि पितुको सुख दीजै ||
दिब्य-देह, इच्छा-जीवन जग बिधि मनाइ मँगि लीजै |
हरि-हर-सुजस सुनाइ, दरस दै, लोग कृतारथ कीजै ||
देखि बदन, सुनि बचन-अमिय, तन रामनयन-जल भीजै |
बोल्यो बिहग बिहँसि रघुबर बलि, कहौं सुभाय, पतीजै ||
मेरे मरिबे सम न चारि फल, होंहि तौ, क्यों न कहीजै
तुलसी प्रभु दियो उतरु मौन हीं, परी मानो प्रेम सहीजै ||
गीतावली अरण्यकांड पद 16 से 20 तक/पृष्ठ 1
(16)
मेरो सुनियो, तात सँदेसो |
सीय-हरन जनि कहेहु पितासों, ह्वैहै अधिक अँदेसो ||
रावरे पुन्यप्रताप-अनल महँ अलप दिननि रिपु दहिहैं |
कुलसमेत सुरसभा दसानन समाचार सब कहिहैं ||
सुनि प्रभु-बचन, राखि उर मुरति, चरन-कमल सिर नाई |
चल्यो नभ सुनत राम-कल-कीरति, अरु निज भाग बड़ाई ||
पितु-ज्यों गीध-क्रिया करि रघुपति अपने धाम पठायो |
ऐसो प्रभु बिसारि ,तुलसी सठ तू चाहत सुख पायो ||
गीतावली अरण्यकांड पद 16 से 20 तक/पृष्ठ 2
शबरीसे भेण्ट
.रागसूहो
सबरी सोइ उठी, फरकत बाम बिलोचन-बाहु |
सगुन सुहावने सूचत मुनि-मन-अगम उछाहु ||
मुनि-अगम उर आनन्द, लोचन सजल, तनु पुलकावली |
तृन-पर्नसाल बनाइ, जल भरि कलस, फल चाहन चली ||
मञ्जुल मनोरथ करति, सुमिरति बिप्र-बरबानी भली |
ज्यों कलप-बेलि सकेलि सुकृत सुफूल-फूली सुख-फली ||
गीतावली अरण्यकांड पद 16 से 20 तक/पृष्ठ 3
(17) (1)
प्रानप्रिय पाहुने ऐहैं राम-लषन मेरे आजु |
जानत जन-जियकी मृदु चित राम गरीबनिवाज ||
मृदु चित गरीबनिवाज आजु बिराजिहैं गृह आइकै |
ब्रह्मादि सङ्कर-गौरि पूजित पूजिहौं अब जाइकै ||
लहि नाथ हौं रघुनाथ-बानो पतितपावन पाइकै |
दुहु ओर लाहु अघाइ तुलसी तीसरेहु गुन गाइकै ||
गीतावली अरण्यकांड पद 16 से 20 तक/पृष्ठ 4
(17) (2)
दोना रुचिर रचे पूरन कन्द-मूल, फल-फूल |
अनुपम अमियहुतें अंबक अवलोकत अनुकूल ||
अनुकूल अंबक अंब ज्यों निज डिम्ब हित सब आनिकै |
सुन्दर सनेहसुधा सहस जनु सरस राखे सानिकै ||
छन भवन, छन बाहर, बिलोकति पन्थ भूपर पानिकै |
दोउ भाइ आये सबरिकाके प्रेम-पन पहिचानिकै ||
गीतावली अरण्यकांड पद 16 से 20 तक/पृष्ठ 5
(17) (3)
स्रवन सुनत चली, आवत देखि लषन-रघुराउ |
सिथिल सनेह कहै,
"है सुपना बिधि, कैधौं सति भाउ ||
सति भाउ कै सपनो? निहारि कुमार कोसलरायके |
गहै चरन, जे अघहरन नत-जन-बचन-मानस-कायके ||
लघु-भाग-भाजन उदधि उमग्यो लाभ-सुख चित चाय कै |
सो जननि ज्यों आदरी सानुज, राम भूखे भायकै ||
गीतावली अरण्यकांड पद 21 से 25 तक/पृष्ठ 1
(17) (4)
प्रेम-पट पाँवड़े देत, सुअरघ बिलोचन-बारि |
आस्रम लै दिए आसन पङ्कज-पाँय पखारि ||
पद-पङ्कजात पखारि पूजे, पन्थ-श्रम-बिरति भये |
फल-फूल अंकुर-मूल धरे सुधारि भरि दोना नये ||
प्रभु खात पुलकित गात, स्वाद सराहि आदर जनु जये |
फल चारिहू फल चारि दहि, परचारि-फल सबरी दये ||
गीतावली अरण्यकांड पद 21 से 25 तक/पृष्ठ 2
(17) (5)
सुमन बरषि, हरषे सुर, मुनि मुदित सराहि सिहात |
"केहि रुचि केहि छुधा सानुज माँगि माँगि प्रभु खात ||
प्रभु खात माँगत देति सबरी, राम भोगी जागके |
पुलकत प्रसंसत सिद्ध-सिव-सनकादि भाजन भागके ||
बालक सुमित्रा कौसिलाके पाहुने फल-सागके |
सुनि समुझि तुलसी जानु रामहि बस अमल अनुरागके ||
गीतावली अरण्यकांड पद 21 से 25 तक/पृष्ठ 3
(17) (6)
रघुबर अँचै उठे, सबरी करि प्रनाम कर जोरि |
हौं बलि बलि गई, पुरई मञ्जु मनोरथ मोरि ||
पुरई मनोरथ, स्वारथहु परमारथहु पूरन करी |
अघ-अवगुनन्हिकी कोठरी करि कृपा मुद मङ्गल भरी ||
तापस-किरातिनि-कोल मृदु मूरति मनोहर मन धरी |
सिर नाइ, आयसु पाइ गवने, परमनिधि पाले परी ||
सिय-सुधि सब कही नख-सिख निरखि-निरखि दोउ भाइ |
दै दै प्रदच्छिना करति प्रनाम, न प्रेम अघाइ ||
अति प्रीति मानस राखि रामहि, राम-धामहि सो गई |
तेहि मातु-ज्यों रघुनाथ अपने हाथ जल-अंजलि दई ||
तुलसी-भनित, सबरी-प्रनति, रघुबर-प्रकृति करुनामई |
गावत, सुनत, समुझत भगति हिय होय प्रभु पद नित नई ||
गीतावली अरण्यकांड पद 21 से 25 तक/पृष्ठ 4
(17) (5)
सुमन बरषि, हरषे सुर, मुनि मुदित सराहि सिहात |
"केहि रुचि केहि छुधा सानुज माँगि माँगि प्रभु खात ||
प्रभु खात माँगत देति सबरी, राम भोगी जागके |
पुलकत प्रसंसत सिद्ध-सिव-सनकादि भाजन भागके ||
बालक सुमित्रा कौसिलाके पाहुने फल-सागके |
सुनि समुझि तुलसी जानु रामहि बस अमल अनुरागके ||
गीतावली अरण्यकांड पद 21 से 25 तक/पृष्ठ 5
(17)
पुरई मनोरथ, स्वारथहु परमारथहु पूरन करी |
अघ-अवगुनन्हिकी कोठरी करि कृपा मुद मङ्गल भरी ||
तापस-किरातिनि-कोल मृदु मूरति मनोहर मन धरी |
सिर नाइ, आयसु पाइ गवने, परमनिधि पाले परी ||
सिय-सुधि सब कही नख-सिख निरखि-निरखि दोउ भाइ |
दै दै प्रदच्छिना करति प्रनाम, न प्रेम अघाइ ||
अति प्रीति मानस राखि रामहि, राम-धामहि सो गई |
तेहि मातु-ज्यों रघुनाथ अपने हाथ जल-अंजलि दई ||
तुलसी-भनित, सबरी-प्रनति, रघुबर-प्रकृति करुनामई |
गावत, सुनत, समुझत भगति हिय होय प्रभु पद नित नई ||