श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
गीतावली · गोस्वामी तुलसीदास

किष्किन्धाकाण्ड

गीतावली · किष्किन्धाकाण्ड
पद १

ऋष्यमूकपर राम

किष्किन्धाकाण्ड आरंभ

ऋष्यमूकपर राम

भूषन बसन बिलोकत सियके।

प्रेम-बिबस मन,कंप पुलक तनु, नीरजनयन नीर भरे पियके।1।

स्कुचत कहत, सुमिरि उर उमगत, सील सनेह सुगुनगन तियके।

स्वामि दसा लखि लषन सखा कपि , पिघले हैं आँच माठ मानो घियके। 2

सोचत हानि मानि मन गुनि गुनि गये निघटि फल सकल सुकियके।

वरने जामवंत तेहि अवसर बचन बिबेक बीररस बियके।3।।

धीर बीर सुनि समुझि परसपर, बल-उपाय उघटत निज हियके।

तुलसिदास यह समउ कहेतें कबि लागत निपट निठुर जड़ जियके।4।

पद २

सीताजी के खोज का आदेश

किष्किन्धाकाण्ड

सीताजी के खोज का आदेश

(राग केदारा)

प्रभु कपि- नायक बोलि कह्यो है।

बरषा गई, सरद आई ,अब लगि नहि सिय-सोधु लह्यो है।1।

जा कारन तजि लोकलाज ,तनु राखि बियोग सह्यो है।

ताको तौ कपिराज आज लगि कछु न काज निबह्यो है।2।

सुनि सुग्रीव सभीत नमित-मुख, उतरू न देन चह्यो है।

आइ गए हरि जूथ देखि उर पूरि प्रमोद रह्यो है।3।

पठये बदि-बदि अवधि दसहु दिसि, चले बलु सबनि गह्यो है।

तुलसी सिय लगि भव-दधिनिधि मनु फिरि हरि चहत मह्यो है।4।

किष्किंधा काण्ड समाप्त