श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
गीतावली · गोस्वामी तुलसीदास

सुन्दरकाण्ड · भाग १

गीतावली · सुन्दरकाण्ड · भाग १
पद १

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 1 से 10 तक/पृष्ठ 1

अशोक वन में हनूमान्

राग केदारा

रजायसु रामको जब पायो |

गाल मेलि मुद्रिका, मुदित मन पवनपूत सिर नायो ||

भालुनाथ नल-नील साथ चले, बली बालिको जायो |

फरकि सुअँग भए सगुन, कहत मानो मग मुद-मङ्गल छायो ||

देखि बिवर, सुधि पाइ गीधसों सबनि अपनो बलु मायो |

सुमिरि राम, तकि तरकि तोयनिधि, लङ्क लूक-सो आयो ||

खोजत घर घर, जनु दरिद्र-मनु फिरत लागि धन धायो |

तुलसी सिय बिलोकि पुलक्यो तनु, भूरिभाग भयो भायो ||

पद २

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 1 से 10 तक/पृष्ठ 2

2

देखी जानकी जब जाइ |

परम धीर समीरसुतके प्रेम उर न समाइ ||

कृस सरीर सुभाय सोभित, लगी उड़ि उड़ि धूलि |

मनहु मनसिज मोहनी-मनि गयो भोरे भूलि ||

रटति निसिबासर निरन्तर राम राजिवनैन |

जात निकट न बिरहिनी-अरि अकनि ताते बैन ||

नाथके गुनगाथ कहि कपि दई मुँदरी डारि |

कथा सुनि उठि लई कर बर, रुचिर नाम निहारि ||

हृदय हरष-बिषाद अति पति-मुद्रिका पहिचानि |

दास तुलसी दसा सो कहि भाँति कहै बखानि ?||

पद ३

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 1 से 10 तक/पृष्ठ 3

(3)

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राग सोरठ'''

बोलि, बलि, मूँदरी सानुज कुसल कोसलपालु |

अमिय-बचन सुनाइ मेटहि बिरह-ज्वाला-जालु ||

कहत हित अपमान मैं कियो, होत हिय सोइ सालु |

रोष छमि सुधि करत कबहू ललित लछिमन लालु ||

परसपर पति-देवरहि का होति चरचा चालु |

देवि कहु केहि हेत बोले बिपुल बानर-भालु ||

सीलनिधि समरथ सुसाहिब दीनबन्धु दयालु |

दास तुलसी प्रभुहि काहु न कह्यो मेरो हालु ||

पद ४

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 1 से 10 तक/पृष्ठ 4

(4)

सदल सलषन हैं कुसल कृपालु कोसल राउ!

सील-सदन सनेह-सागर सहज सरल सुभाउ ||

नीन्द-भूख न देवरहि, परिहरेको पछिताउ |

धीरधुर रघुबीरको नहि सपनेहू चित चाउ ||

सोधु बिनु, अनुरोध रितुके, बोध बिहित उपाउ |

करत हैं सोइ समय साधन, फलति बनत बनाउ ||

पठए कपि दिसि दसहु, जे प्रभुकाज कुटिल न काउ |

बोलि लियो हनुमान करि सनमान, जानि समाउ ||

दई हौं सङ्केत कहि, कुसलात सियहि सुनाउ |

देखि दुर्ग, बिसेषि जानकि, जानि रिपु-गति आउ ||

कियो सीय-प्रबोध मुँदरी, दियो कपिहि लखाउ |

पाइ अवसर, नाइ सिर तुलसीस-गुनगन गाउ ||

पद ५

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 1 से 10 तक/पृष्ठ 5

(5)

सुवन समीरको धीरधुरीन, बीर-बड़ोइ |

देखि गति सिय-मुद्रिकाकी बाल ज्यों दियो रोइ ||

अकनि कटु बानी कुटिलकी क्रोध-बिन्ध्य बढ़ोइ |

सकुचि सम भयो ईस-आयसु-कलसभव जिय जोइ ||

बद्धि-बल, साहस-पराक्रम अछत राखे गोइ |

सकल साज-समाज साधक समौ, कहै सब कोइ ||

उतरि तरुतें नमत पद, सकुचात सोचत सोइ |

चुके अवसर मनहु सुजनहि सुजन सनमुख होइ ||

कहे बचन बिनीत प्रीति-प्रतीति-नीति निचोइ |

सीय सुनि हनुमान जान्यौ भली भाँति भलोइ ||

देबि! बिनु करतूति कहिबो जानिहैं लघु लोइ |

कहौङ्गो मुखकी समरसरि कालि कारिख धोइ ||

करत कछू न बनत, हरिहिय हरष-सोक समोइ |

कहत मन तुलसीस लङ्का करहुँ सघन घमोइ ||

पद ६

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 1 से 10 तक/पृष्ठ 6

(6)

हौं रघुबंसमनि को दूत |

मातु मानु प्रतीति जानकि! जानि मारुतपूत ||

मैं सुनी बातैं असैली, जे कही निसिचर नीच |

क्यों न मारै गाल, बैठो काल-डाढ़नि बीच ||

निदरि अरि, रघुबीर-बल लै जाउँ जौ हठि आज |

डरौं आयसु-भङ्गतें, अरु बिगरिहै सुरकाज ||

बाँधि बारिधि, साधि रिपु, दिन चारिमें दोउ बीर |

मिलहिङ्गे कपि-भालु-दल सँग, जननि! उर धरु धीर ||

चित्रकूट-कथा, कुसल कहि सीस नायो कीस |

सुहृद-सेवक नाथको लखि दई अचल असीस ||

भये सीतल स्रवन-तन-मन सुने बचन-पियूष |

दास तुलसी रही नयननि दरसहीकी भूख ||

पद ७

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 1 से 10 तक/पृष्ठ 7

(7)

तात! तोहूसों कहत होति हिये गलानि |

मनको प्रथम पन समुझि अछत तनु,

लखि नै गति भै मति मलानि ||

पियको बचन परहर्यो जियके भरोसे ,

सङ्ग चली बन बड़ो लाभ जानि |

पीतम-बिरह तौ सनेह सरबसु, सुत

औसरको चूकिबो सरिस न हानि ||

आरज-सुवनके तो दया दुवनहुपर,

मोहि सोच, मोतें सब बिधि नसानि |

आपनी भलाई भलो कियो नाथ सबहीको,

मेरे ही दिन सब बिसरी बानि ||

नेम तौ पपीहाहीके, प्रेम प्यारो मीनहीके,

तुलसी कही है नीके हृदय आनि |

इतनी कही सो कही सीय, ज्योंही त्योंही

रही, प्रीति परी सही, बिधिसों न बसानि ||

पद ८

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 1 से 10 तक/पृष्ठ 8

(8)

मातु !काहेको कहति अति बचन दीन ?

तबकी तुही जानति, अबकी हौं ही कहत,

सबके जियकी जानत प्रभु प्रबीन ||

ऐसे तो सोचहि न्याय निठुर-नायक-रत

सलभ, खग, कुरङ्ग, कमल, मीन |

करुनानिधानको तो ज्यों ज्यों तनु छीन भयो,

त्यों त्यों मनु भयो तेरे प्रेम पीन ||

सियको सनेह, रघुबरकी दसा सुमिरि

पवनपूत देखि भयो प्रीति-लीन |

तुलसी जनको जननी प्रबोध कियो,

"समुझि तात! जग बिधि-अधीन ||

पद ९

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 1 से 10 तक/पृष्ठ 9

(9)

राग जैतश्री

कहु कपि! कब रघुनाथ कृपा करि, हरिहैं निज बियोग

सम्भव दुख|

राजिवनयन, मयन-अनेक-छबि, रबिकुल-कुमुद-सुखद,

मयङ्क-मुख ||

बिरह-अनल-स्वासा-समीर निज तनु जरिबे कहँ रही न

कछु सक |

अति बल जल बरषत दोउ लोचन, दिन अरु रैन रहत

एकहि तक ||

सुदृढ़ ग्यान अवलम्बि, सुनहु सुत! राखति प्रान बिचारि

दहन मत |

सगुन रुप, लीला-बिलास-सुख सुमिरति करति रहति

अंतरगत ||

सुनु हनुमन्त! अनन्त-बन्धु करुनासुभाव सीतल कोमल अति |

तुलसिदास यहि त्रास जानि जिय, बरु दुख सहौं, प्रगट

कहि न सकति ||

पद १०

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 1 से 10 तक/पृष्ठ 10

(10)

कबहूँ, कपि! राघव आवहिङ्गे ?

मेरे नयनचकोर प्रीतिबस राकाससि मुख दिखरावहिङ्गे ||

मधुप, मराल, मोर, चातक ह्वै लोचन बहु प्रकार धावहिङ्गे |

अंग-अंग छबि भिन्न-भिन्न सुख निरखि-निरखि तहँ-तहँ छावहिङ्गे ||

बिरह-अगिनि जरि रही लता ज्यों कृपादृष्टि-जल पलुहावहिङ्गे |

निज बियोग-दुख जानि दयानिधि मधुर बचन कहि समुझावहिङ्गे ||

लोकपाल, सुर, नाग, मनुज सब परे बन्दि कब मुकतावहिङ्गे ?

रावनबध रघुनाथ-बिमल-जस जारदादि मुनिजन गावहिङ्गे ||

यह अभिलाष रैन-दिन मेरे, राज बिभीषन कब पावहिङ्गे |

तुलसिदास प्रभु मोहजनित भ्रम, भेदबुद्धि कब बिसरावहिङ्गे ||

पद ११

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 11 से 20 तक/पृष्ठ 1

(11)

हनूमान् और रावणकी भेण्ट

राग कान्हरा

सत्य बचन सुनु मातु जानकी !

जनके दुख रघुनाथ दुखित अति, सहज प्रकृति करुनानिधानकी ||

तुव बियोग-सम्भव दारुन दुख बिसरि गई महिमा सुबानकी |

नतु कहु, कहँ रघुपति-सायक-रबि, तम-अनीक कहँ जातुधानकी ||

कहँ हम पशु साखामृग चञ्चल, बात कहौं मैं बिद्यमानकी!

कहँ हरि-सिव-अज-पूज्य-ग्यान-घन, नहि बिसरति वह लगनि कानकी ||

तुव दरसन-सन्देस सुनि हरिको बहुत भई अवलम्ब प्रानकी |

तुलसिदास गुन सुमिरि रामके प्रेम-मगन नहि सुधि अपानकी ||

पद १२

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 11 से 20 तक/पृष्ठ 2

(12)

रावन! जू पै राम रन रोषे |

को सहि सकै सुरासुर समरथ, बिसिष काल-दसननितें चोषे ||

तपबल, भुजबल, कै सनेह-बल सिव-बिरञ्चि नीकी बिधि तोषे |

सो फल राजसमाज-सुवन-जन आपु न नास आपने पोषे ||

तुला पिनाक, साहु नृप, त्रिभुवन भट-बटोरि सबके बल जोषे |

परसुराम-से सूरसिरोमनि पलमें भए खेतके धोषे ||

कालिकी बात बालिकी सुधि करि समुझि हिताहित खोलि झरोखे |

कह्यो कुमन्त्रिनको न मानिये, बड़ी हानि, जिय जानि त्रिदोषे ||

जासु प्रसाद जनमि जग पुरषनि सागर सृजे, खने अरु सोखे |

तुलसिदास सो स्वामि न सूइयो, नयन बीस मन्दिर के-से मोखे ||

पद १३

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 11 से 20 तक/पृष्ठ 3

(13)

राग मारु

जो हौं प्रभु-आयसु लै चलतो |

तौ यहि रिस तोहि सहित दसानन! जातुधान दल दलतो ||

रावन सो रसराज सुभट-रस सहित लङ्क-खल खलतो |

करि पुटपाक नाक-नायकहित घने घने घर घलतो ||

बड़े ,समाज लाज-भाजन भयो, बड़ो काज बिनु छलतो |

लङ्कनाथ! रघुनाथ-बैरु-तरु आजु फैलि फूलि फलतो ||

काल-करम, दिगपाल, सकल जग-जाल जासु करतल तो |

ता रिपुसों पर भूमि रारि रन जीवन-मरन सुफल तो ||

देखी मैं दसकण्ठ! सभा सब, मोन्तें कोउ न सबल तो |

तुलसी अरि उर आनि एक अब एती गलानि न गलतो ||