श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
गीतावली · गोस्वामी तुलसीदास

सुन्दरकाण्ड · भाग २

गीतावली · सुन्दरकाण्ड · भाग २
पद १४

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 11 से 20 तक/पृष्ठ 4

(14)

सीताजीसे विदाई

तौलौं, मातु! आपु नीके रहिबो |

जौलौं हौं ल्यावौं रघुबीरहि, दिन दस और दुसह दुख सहिबो ||

सोखिकै, खेतकै, बाँधि सेतु करि उतरिबो उदधि, न बोहित चहिबो |

प्रबल दनुज-दल दलि पल आधमें, जीवत दुरित दसानन गहिबो ||

बैरिबृन्द-बिधवा-बनितनिको देखिबो बारि-बिलोचन बहिबो |

सानुज सेनसमेत स्वामिपद निरखि परम मुद मङ्गल लहिबो ||

लङ्क-दाह उर आनि मानिबो साँचु राम सेवकको कहिबो |

तुलसी प्रभु सुर सुजस गाइहैं, मिटि जैहै सबको सोचु दव दहिबो ||

पद १५

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 11 से 20 तक/पृष्ठ 5

(15)

कपिके चलत सियको मनु गहबरि आयो |

पुलक सिथिल भयो सरीर, नीर नयनन्हि छायो ||

कहन चह्यो सँदेस, नहि कह्यो, पियके जिय की जानि

हृदय दुसह दुख दुरायो |

देखि दसा ब्याकुल हरीस, ग्रीषमके पथिक ज्यों धरनि तरनि-तायो ||

मीचतें नीच लगी अमरता, छलको न बलको निरखि थल

परुष प्रेम पायो|

कै प्रबोध मातु-प्रीतिसों असीस दीन्हीं ह्वैहै तिहारोई मनभायो ||

करुना-कोप-लाज-भय-भरो कियो गौन, मौन ही चरन कमल

सीस नायो |

यह सनेह-सरबस समौ, तुलसी रसना रुखी, ताही तें परत गायो ||

पद १६

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 11 से 10 तक/पृष्ठ 6

(16)

हनुमान्जीका भगवान् रामके पास पहुँचना

राग बसन्त

रघुपति देखो आयो हनूमन्त | लङ्केस-नगर खेल्यो बसन्त ||

श्रीराम-काजहित सुदिन सोधि | साथी प्रबोधि लाँघ्यो पयोधि ||

सिय-पाँय पूजि, आसिषा पाइ | फल अमिय सरिस खायो अघाइ ||

कानन दलि, होरी रचि बनाइ | हठि तेल-बसन बालधि बँधाइ ||

लिए ढोल चले सँग लोग लागि | बरजोर दई चहुँ ओर आगि ||

आखत आहुति किये जातुधान | लखि लपट भभरि भागे बिमान ||

नभतल कौतुक, लङ्का बिलाप | परिनाम पचहिं पातकी पाप ||

हनुमान-हाँक सुनि बरषि फूल | सुर बार बार बरनहिं लँगूर ||

भरि भुवन सकल कल्यान-धूम | पुर जारि बारिनिधि बोरि लूम ||

जानकी तोषि पोषेउ प्रताप | जय पवन-सुवन दलि दुअन-दाप ||

नाचहिं-कूदहिं कपि करि बिनोद | पीवत मधु मधुबन मगन मोद ||

यों कहत लषन गहे पाँय आइ | मनि सहित मुदित भेण्ट्यो उठाइ ||

लगे सजन सेन, भयो हिय हुलास | जय जय जस गावत तुलसिदास ||

पद १७

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 11 से 20 तक/पृष्ठ 7

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(17)'''

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राग जैतश्री'''

सुनहु राम बिश्रामधाम हरि! जनकसुता अति बिपति जैसे सहति |

"हे सौमित्रि-बन्धु करुनानिधि!मन महँ रटति, प्रगट नहिं कहति ||

निजपद-जलज बिलोकि सोकरत नयननि बारि रहत न एक छन |

मनहु नील नीरजससि-सम्भव रबि-बियोग दोउ स्रवत सुधाकन ||

बहु राच्छसी सहित तरुके तर तुम्हरे बिरह निज जनम बिगोवति |

मनहु दुष्ट इंद्रिय सङ्कट महँ बुद्धि बिबेक उदय मगु जोवति ||

सुनि कपि बचन बिचारि हृदय हरि अनपायनी सदा सो एक मन |

तुलसिदास दुख-सुखातीत हरि सोच करत मानहु प्राकृत जन ||

पद १८

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 11 से 20 तक/पृष्ठ 8

(18)

राग केदारा

रघुकुलतिलक! बियोग तिहारे |

मैं देखी जब जाइ जानकी, मनहु बिरह-मूरति मन मारे ||

चित्र-से नयन अरु गढ़ेसे चरन-कर, मढ़े-से स्रवन, नहि सुनति पुकारे |

रसना रटति नाम, कर सिर चिर रहै, नित निजपद-कमल निहारे ||

दरसन-आस-लालसा मन महँ राखे प्रभु-ध्यान प्रान-रखवारे |

तुलसिदास पूजति त्रिजटा नीके रावरे गुन-गन-सुमन सँवारे ||

पद १९

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 11 से 20 तक/पृष्ठ 9

(19)

अतिहि अधिक दरसनकी आरति |

राम-बियोग असोक-बिटपतर सीय निमेष कलपसम टारति ||

बार-बार बर बारिजलोचन भरि भरि बरत बारि उर ढारति |

मनहु बिरहके सद्य घाय हिये लखि तकि-तकि धरि धीरज तारति ||

तुलसिदास जद्यपि निसिबासर छिन-छिन प्रभुमूरतिहि निहारति |

मिटति न दुसह ताप तौ तनकी, यह बिचारि अंतर गति हारति ||

पद २०

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 11 से 20 तक/पृष्ठ 10

(20)

तुम्हरे बिरह भई गति जौन |

चित दै सुनहु, राम करुनानिधि! जानौं कछु, पै सकौं कहि हौं न ||

लोचन-नीर कृपिनके धन ज्यों रहत निरन्तर लोचनन कोन |

"हा धुनि-खगी लाज-पिञ्जरी महँ राखि हिये बड़े बधिक हठि मौन ||

जेहि बाटिका बसति, तहँ खग-मृग तजि-तजि भजे पुरातन भौन |

स्वास-समीर भेण्ट भै बोरेहु, तेहि मग पगु न धर्यो तिहुँ पौन ||

तुलसिदास प्रभु! दसा सीयकी मुख करि कहत होति अति गौन |

दीजै दरस, दूरि कीजै दुख, हौ तुम्ह आरत-आरति दौन ||

पद २१

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 21 से 30 तक/पृष्ठ 1

(21)

कपिके सुनि कल कोमल बैन |

प्रेमपुलकि सब गात सिथिल भए, भरे सलिल सरसीरुह-नैन ||

सिय-बियोग-सागर नागर-मनु बूड़न लग्यो सहित चित-चैन |

लही नाव पवनज-प्रसन्नता, बरबस तहाँ गह्यो गुन-मैन ||

सकत न बूझि कुसल, बूझे बिन गिरा बिपुल ब्याकुल उर-ऐन |

ज्यों कुलीन सुचि सुमति बियोगिनि सनमुख सहै बिरह-सर पैन ||

धरि-धरि धीर बीर कोसलपति किए जतन, सके उत्तरु दै न |

तुलसिदास प्रभु सखा अनुजसों सैनहिं कह्यौ चलहु सजन सैन ||

पद २२

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 21 से 30 तक/पृष्ठ 2

(22)

वानरसेना की लङ्का यात्रा

राग मारु

जब रघुबीर पयानो कीन्हों |

छुभित सिन्धु, डगमगत महीधर, सजि सारँग कर लीन्हों ||

सुनि कठोर टङ्कोर घोर अति चौङ्के बिधि-त्रिपुरारि |

जटापटल ते चली सुरसरी सकत न सम्भु सँभारि ||

भए बिकल दिगपाल सकल, भय भरे भुवन दस चारि |

खरभर लङ्क, ससङ्क दसानन, गरभ स्रबहिं अरि-नारि ||

कटकटात भट भालु, बिकट मरकट करि केहरि-नाद |

कूदत करि रघुनाथ-सपथ उपरी-उपरा बदि बाद ||

गिरि-तरुधर, नख मुख कराल, रद कालहु करत बिषाद |

चले दस दिसि रिस भरि धरु "धरु कहि,"को बराक मनुजाद ?||

पवन पङ्गु पावक-पतङ्ग-ससि दुरि गए, थके बिमान |

जाचत सुर निमेष, सुरनायक नयन-भार अकुलान ||

गए पूरि सर धूरि, भूरि भय अग थल जलधि समान |

नभ-निसान, हनुमान-हाँक सुनि समुझत कोउ न अपान ||

दिग्गज-कमठ-कोल-सहसानन धरत धरनि धरि धीर |

बारहि बारि अमरषत, करषत, करकैं परीं सरीर ||

चली चमू, चहु ओर सोर, कछु बनै न बरने भीर |

किलकिलात, कसमसत, कोलाहल होत नीरनिधि-तीर ||

जातुधानपति जानि कालबस मिले बिभीषन आइ |

सरनागत-पालक कृपालु कियो तिलक लियो अपनाइ ||

कौतुकही बारिधि बँधाइ उतरे सुबेल-तट जाइ |

तुलसिदास गढ़ देखि फिरे कपि,प्रभु-आगमन सुनाइ ||

पद २३

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 21 से 30 तक/पृष्ठ 3

(23)

रावणकी मन्त्रणा

राग आसावरी

आए देखि दूत, सुनि सोच सठ-मनमैं |

बाहर बजावै गाल, भालु कपि कालबस|

मोसे बीरसों चहत जीत्यो रारि रनमैं ||

राम छाम, लरिका लषन, बालि-बालकहि,

घालिको गनत? रीछ जल ज्यों न घनमैं |

काजको न कपिराज, कायर कपिसमाज,

मेरे अनुमान हनुमान हरिगनमैं ||

समय सयानी मृदु बानी रानी कहै पिय !

पावक न होइ जातुधान बेनु-बनमैं |

तुलसी जानकी दिए, स्वामीसों, सनेह किये

कुसल, नतरु सब ह्वैहैं छार छनमैं ||

पद २४

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 21 से 30 तक/पृष्ठ 4

(24)

आपनी आपनी भाँति सब काहू कही है|

मन्दोदरी, महोदर, मालवान महामति,

राजनीति पहुँच जहाँलौं जाकी रही है ||

महामद-अंध दसकन्ध न करत कान,

मीचु-बस नीच हठि कुगहनि गही है |

हँसि कहै, सचिव सयाने मोसों यों कहत,

चहै मेरु उड़न, बड़ी बयारि बही है ||

भालु, नर, बानर अहार निसिचरनिको,

सोऊ नृप-बालकनि माँगी धारि लही है |

देखो मालकौतुक, फिपीलिकनि पङ्ख लागो,

भाग मेरे लोगनिके भई चित-चही है ||

"तोसो न तिलोक आजु साहस, समाज-साजु,

महाराज-आयसु भो जोई, सोई सही है |

तुलसी प्रनामकै बिभीषन बिनती करै,

"ख्याल बेधे ताल, कपि केलि लङ्का दही है ||

पद २५

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 21 से 30 तक/पृष्ठ 5

(25)

दूसरो न देखतु साहिब सम रामै |

बेदौउ पुरान, कबि-कोबिद बिरद-रत,

जाको जसि सुनत गावत गुन-ग्रामै ||

माया-जीव, जग-जाल, सुभाउ, करम-काल,

सबको सासकु, सब मैं, सब जामैं |

बिधि-से करनिहार, हरि-से पालनिहार,

हर-से हरनिहार जपैं जाके नामैं ||

सोइ नरबेष जानि, जनकी बिनती मानि,

मतो नाथ सोई, जातें भलो परिनामैं |

सुभट-सिरोमनि कुठारपानि सारिखेहू

लखी औ लखाई, इहाँ किए सुभ सामैं ||

बचन-बिभूषन बिभिषन-बचन सुनि

लागे दुख दूषन-से दाहिनेउ बामैं |

तुलसी हुमकि हिये हन्यो लात, "भले तात,

चल्यो सुरतरु ताकि तजि घोर घामैं ||

पद २६

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 21 से 30 तक/पृष्ठ 6

(26)

विभीषण-शरणागति

जाय माय पायँ परि कथा सो सुनाई है |

समाधान करति बिभीषनको बार बार,

"कहा भयो तात! लात मारे, बड़ो भाई है ||

साहिब, पितु समान, जातुधानको तिलक,

ताके अपमान तेरी बड़िए बड़ाई है |

गरत गलानि जानि, सनमानि सिख देति,

"रोष किये तोष, सहें समुझें भलाई है ||

इहाँतें बिमुख भयें, रामकी सरन गए

भलो नेकु, लोक राखे निपट निकाई है |

मातु-पग सीस नाइ, तुलसी असीस पाइ

चले भले सगुन, कहत "मन भाइ है ||